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महिलाओं के लट्ठ, पुरुषों की ढाल... झांसी में बरसाने की तर्ज पर होती है अनोखी होली, लोग बोले- 600 साल पुरानी है परंपरा

होली के रंग पूरे देश में अलग-अलग अंदाज में बिखरते हैं, लेकिन बुंदेलखंड के झांसी के पास बसे डगरवाहा गांव में होली का रंग कुछ खास ही होता है. यहां होली सिर्फ गुलाल तक सीमित नहीं रहती, बल्कि महिलाओं के लट्ठ और पुरुषों की ढाल के बीच सदियों पुरानी परंपरा जीवंत हो उठती है. खाती बाबा के स्थान पर होने वाली इस लट्ठमार होली को देखने के लिए हर साल दूर-दूर से हजारों लोग पहुंचते हैं.

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झांसी में खेली जाती है लट्ठमार होली. (Photo: ITG)
झांसी में खेली जाती है लट्ठमार होली. (Photo: ITG)

झांसी के आसपास के गांवों में होली सिर्फ रंग और गुलाल का त्योहार नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा और आस्था का प्रतीक है. डगरवाहा गांव में मनाई जाने वाली लट्ठमार होली आज भी उसी उत्साह के साथ मनाई जाती है, जैसी वर्षों पहले होती थी. खाती बाबा के स्थान पर होने वाली इस अनोखी होली में महिलाएं लट्ठ लेकर खड़ी होती हैं. पुरुष हुरियारे बनकर ढाल के सहारे उनसे बचते हुए गुड़ की पोटली तोड़ने की कोशिश करते हैं. इस अनोखे आयोजन को देखने के लिए हर साल बुंदेलखंड के सैकड़ों गांवों से हजारों लोग यहां पहुंचते हैं.

झांसी के पास स्थित डगरवाहा गांव में लट्ठमार होली की अनोखी परंपरा वर्षों से चली आ रही है, जो आज भी पूरे उत्साह के साथ निभाई जाती है. यह परंपरा बुंदेलखंड की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है और हर साल होली पर दौज के दिन इसका भव्य आयोजन होता है.

unique lathmar holi of jhansi barsana pattern centuries old tradition

डगरवाहा गांव के प्रधान प्रतिनिधि रईस यादव ने बताया कि यह परंपरा लगभग छह सौ वर्ष पुरानी है. इस आयोजन में खाती बाबा के स्थान पर महिलाएं लट्ठ लेकर खड़ी होती हैं, जबकि पुरुष हुरियारे बनकर खेलते हैं.

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ऐसा माना जाता है कि यदि गांव की महिलाएं इस लट्ठमार होली में हिस्सा नहीं लेतीं तो खाती बाबा नाराज होकर उनके घरों में बिच्छू या ततैया भेज देते हैं. इसी कारण गांव की महिलाएं इस परंपरा में अवश्य भाग लेती हैं.

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इस आयोजन के दौरान करीब 51 फीट की ऊंचाई पर गुड़ और ईनाम की पोटली बांधी जाती है. हुरियारे उसे तोड़ने की कोशिश करते हैं, जबकि महिलाएं लट्ठ से उन्हें रोकती हैं, परंपरा के अनुसार, गुड़ की पोटली यादव समाज द्वारा बांधी जाती है, वहीं परिहार समाज के लोग उसे तोड़ते हैं. इस अनोखी होली को देखने के लिए बुंदेलखंड के करीब 100 से 150 गांवों से हजारों लोग हर साल टकरवाह पहुंचते हैं.

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डगरवाहा गांव के मनीष यादव ने बताया कि यहां बरसाने की तर्ज पर लट्ठमार होली खेली जाती है, जिसकी परंपरा लगभग 600 से 700 साल पुरानी मानी जाती है. यह आयोजन गढ़ी में स्थित खाती बाबा के स्थान से जुड़ा हुआ है. 

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यह कार्यक्रम शाम करीब साढ़े चार बजे शुरू होकर साढ़े छह बजे तक चलता है. इस दौरान महिलाएं लट्ठ से प्रहार करती हैं, जबकि पुरुष ढाल लेकर अपना बचाव करते हैं. हर साल इस आयोजन में करीब 50-60 महिलाएं और 100-150 पुरुष हिस्सा लेते हैं.

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लट्ठमार होली में शामिल महिला देववती ने कहा कि यह डगरवाहा क्षेत्र की पारंपरिक बुंदेलखंडी लट्ठमार होली है, जो कई बरसों से यहां खेली जाती रही है. उन्होंने कहा कि पूरे गांव की महिलाएं इसमें भाग लेती हैं और लाठियों से खेलते हुए इस परंपरा को निभाती हैं. 

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वहीं डगरवाहा गांव की ममता ने बताया कि उनके गांव में खाती बाबा के स्थान पर फाग की दूज के दिन अनोखी होली खेली जाती है. इस दौरान महिलाएं फाग गाती हैं और पुरुष गुड़ वाली पोटली तोड़ने की कोशिश करते हैं. महिलाएं बांस की लाठियां चलाकर उन्हें रोकती हैं, जिससे पुरुष आसानी से गुड़ नहीं तोड़ पाते. यह लट्ठमार होली बुंदेलखंड की लोक संस्कृति, आस्था और परंपरा का अनोखा संगम है.

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