उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से सामने आई हरीश राणा की कहानी इन दिनों पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई है. यह मामला सिर्फ निष्क्रिय इच्छामृत्यु तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस गहरे भावनात्मक संघर्ष को भी उजागर करता है, जिससे एक परिवार वर्षों तक गुजरता है. करीब 13 साल पहले एक हादसे ने हंसते-खेलते युवक की जिंदगी को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया, जहां से वापसी की कोई उम्मीद नहीं बची थी.
2013 में हुए एक दुर्घटना के बाद हरीश राणा कोमा में चले गए थे. तब से लेकर अब तक उनका जीवन कृत्रिम साधनों के सहारे ही चल रहा था. वक्त बीतता गया, लेकिन हालत में कोई सुधार नहीं हुआ. परिवार उम्मीद और हकीकत के बीच झूलता रहा. आखिरकार मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और एक ऐतिहासिक फैसले में हरीश को निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति मिल गई.
एम्स में चल रही अंतिम प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हरीश को गाजियाबाद स्थित उनके घर से दिल्ली के एम्स में शिफ्ट किया गया, जहां उन्हें पेलिएटिव केयर यूनिट में रखा गया है. यह वह जगह होती है, जहां उन मरीजों का इलाज किया जाता है जिनके ठीक होने की संभावना लगभग समाप्त हो चुकी होती है. यहां इलाज का मकसद जीवन को बढ़ाना नहीं, बल्कि मरीज को बिना दर्द और पूरी गरिमा के साथ अंतिम समय तक आराम देना होता है. एम्स में डॉक्टरों की एक विशेष टीम हरीश की निगरानी कर रही है. इसमें एनेस्थीसिया, न्यूरोसर्जरी, मनोचिकित्सा और पेलिएटिव केयर के विशेषज्ञ शामिल हैं. डॉक्टरों का कहना है कि यह प्रक्रिया अचानक नहीं होगी, बल्कि चरणबद्ध तरीके से पूरी की जाएगी. जीवन रक्षक उपकरणों और दवाओं को धीरे-धीरे कम किया जाएगा, ताकि मरीज को किसी तरह की तकलीफ न हो. विशेषज्ञों के मुताबिक, यह प्रक्रिया कई दिनों तक चल सकती है. इसका उद्देश्य किसी की मृत्यु को तेज करना नहीं, बल्कि प्रकृति के अनुसार जीवन को समाप्त होने देना है वह भी सम्मान और शांति के साथ.
पहले बहन सिर्फ निहारती रही
कुछ आंकड़ें कहते हैं कि करीब 8 अरब वाली इस दुनिया में हर रोज लगभग डेढ़ लाख से ज्यादा मौतें होती हैं. दुनिया की सबसे लाइलाज बीमारियों को भी शामिल कर लें तो भी शर्तिया किसी मरने वाले इंसान को अपनी मौत की तारीख और वक्त पता नहीं होगा. सिवाए उनके जिन्हें किसी जुर्म के लिए सजा-ए-मौत दी गई हो. इस बीच, हरीश के घर से एक भावुक वीडियो भी सामने आया, जिसमें ब्रह्माकुमारी संस्था की सदस्य उन्हें आध्यात्मिक तरीके से विदा देने की तैयारी करती नजर आती हैं. ये ब्रह्मकुमारी की बहनें हैं. हरीश के मां-बाप ब्रह्मकुमारी के अनुयायी हैं. वीडियो में देखा गया कि लवली के एक हाथ में चंदन की छोटी सी डिबिया है जबकि दूसरा हाथ हरीश के सर पर है. हरीश के सिरहाने दाईं तरफ ब्रह्मकुमारी की एक और बहन खड़ी हैं. हरीश के माथे पर चंदन का टीका लग चुका है. पहले सात सेकंड तक बहन लवली अपना एक हाथ हरीश के सर पर रखकर मुस्कुराते हुए बस उसे निहारे जाती हैं.
हरीश सुन और समझ रहा था तो वो जान रहा था सच
हरीश की दोनों आंखें खुली हैं. लगातार पलकें भी झपक रही हैं. मुंह खुला हुआ है. बीच में एक बार वो इस तरह गले से सांस ऊपर नीचे करता है मानो उसे प्यास लगी है. अभी तक उसकी पलके बस उठ और गिर रहीं हैं. पर जैसे ही बहन लवली पहला शब्द बोलती हैं अचानक हरीश की आंखें हरकत करती हैं और वो आंखें घुमाकर अब सीधे बहन लवली को देखने लगता है. जिस तरह 7 सेकेंड की खामोशी के बाद पहली बार बहन लवली ने पहला शब्द बोला और उस शब्द को सुनते ही जिस तरह हरीश ने अपनी आंखें घुमाईं उससे इतना तो साफ है कि वो सुन सकता था. शायद सुन रहा था. क्या पता बहन लवली जो कह रही थी उसे समझ भी रहा हो. अगर सचमुच हरीश सुन और समझ रहा था तो वो यकीनन ये जान भी गया होगा कि बस अब वो मरने वाला है.
परिवार लंबे समय से इस कठिन स्थिति से गुजर रहा था और उन्होंने इस फैसले से पहले आध्यात्मिक मार्गदर्शन भी लिया. हरीश के पिता ने पहले कहा था कि यह फैसला उनके लिए बेहद पीड़ादायक है, लेकिन बेटे की हालत को देखते हुए यह जरूरी था. उनका मानना है कि इस फैसले से उन परिवारों को भी रास्ता मिलेगा, जो लंबे समय से इसी तरह की स्थिति से जूझ रहे हैं. डॉक्टरों के मुताबिक, हरीश की हालत को देखते हुए यह कहना मुश्किल है कि उनकी सांसें कब तक चलेंगी, लेकिन यह तय है कि अब उनकी जिंदगी का अंतिम चरण है.
परिवार का सबसे कठिन फैसला
हरीश का परिवार पिछले 13 सालों से इस कठिन दौर से गुजर रहा था. हर दिन एक उम्मीद के साथ शुरू होता और निराशा के साथ खत्म होता. ऐसे में निष्क्रिय इच्छामृत्यु का फैसला लेना उनके लिए आसान नहीं था. हरीश के पिता पहले ही कह चुके हैं कि यह निर्णय उनके लिए बेहद पीड़ादायक था, लेकिन बेटे की हालत को देखते हुए यही एक रास्ता बचा था. उन्होंने यह भी माना कि इस फैसले से उन परिवारों को भी राह मिलेगी, जो इसी तरह की परिस्थितियों में फंसे हुए हैं. परिवार ने इस फैसले से पहले आध्यात्मिक मार्गदर्शन भी लिया. ब्रह्माकुमारी संस्था से जुड़े होने के कारण उन्होंने इस प्रक्रिया को एक आध्यात्मिक विदाई के रूप में भी देखा.
अब बस इंतजार
डॉक्टरों के अनुसार, हरीश की स्थिति को देखते हुए यह कहना मुश्किल है कि उनकी सांसें कब तक चलेंगी. लेकिन इतना तय है कि अब उनकी जिंदगी अपने अंतिम चरण में है. हर गुजरता दिन उनके परिवार के लिए भावनात्मक रूप से भारी होता जा रहा है.