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कानपुर: PM मोदी को खून से लिखा लेटर, UGC कानून वापस लेने की मांग

कानपुर में यूजीसी के नए नियमों के विरोध की शुरुआत हो गई है. सनातन मंदिर रक्षा समिति के सदस्य आकाश ठाकुर ने अस्पताल में अपना खून निकालकर प्रधानमंत्री को पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने नियम से समाज में भेदभाव और सामान्य वर्ग को नुकसान पहुंचने की चिंता जताई. उन्होंने पत्र में कहा कि नियम सवर्णों के अधिकारों के खिलाफ है और इसे तुरंत वापस लिया जाए या संशोधन किया जाए. UGC का नया Equity Rule जातिगत भेदभाव रोकने के लिए बनाया गया है, लेकिन सेक्शन 3(C) को PIL में असंवैधानिक बताया गया है.

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आकाश ठाकुर ने खून से लेटर लिखा. (Photo: ITG)
आकाश ठाकुर ने खून से लेटर लिखा. (Photo: ITG)

कानपुर में यूजीसी के नए नियमों के विरोध का सिलसिला शुरू हो गया है. सनातन मंदिर रक्षा समिति के सदस्य आकाश ठाकुर ने एक अनोखा विरोध प्रदर्शन किया. उन्होंने आज सुबह स्थानीय अस्पताल में वार्ड बॉय की मदद से अपना खून निकालवाया और उसी खून से प्रधानमंत्री को पत्र लिखा.

पत्र में आकाश ठाकुर ने पीएम से अनुरोध किया है कि यह कानून समाज में भेदभाव बढ़ाएगा और सामान्य वर्ग के लोगों को नुकसान पहुंचाएगा. उन्होंने कहा कि नियम सवर्णों के अधिकारों के खिलाफ हैं और इसे तुरंत वापस लिया जाना चाहिए या इसमें संशोधन किया जाए.

आकाश ठाकुर का कहना है कि उनका यह कदम जनता और समाज के प्रति जिम्मेदारी के भाव से उठाया गया है. उन्होंने बताया कि यह पत्र पीएम तक भेजा जाएगा, ताकि उनके माध्यम से कानून में आवश्यक बदलाव किया जा सके.

साथ ही उन्होंने लोगों से अपील की कि वे भी कानून के इस पक्षपातपूर्ण पहलू को समझें और इसके विरोध में आवाज उठाएं. यह विरोध कानपुर में यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ एक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है, जो प्रशासन और नीति निर्माताओं को सामाजिक न्याय और समानता पर ध्यान देने की याद दिलाता है.

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UGC का नया नियम और विवाद
यूनिवर्सिटी अनुदान आयोग (UGC) ने उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव को रोकने और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग के छात्रों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक नया नियम लागू किया है. इस नए Equity Rule के तहत सभी विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और उच्च शिक्षण संस्थानों को अपने परिसर में 24x7 हेल्पलाइन, Equal Opportunity Centre, Equity Squads और Equity Committee स्थापित करना अनिवार्य होगा. यदि कोई संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता है, तो UGC उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर सकता है, जिसमें मान्यता रद्द करना या फंड रोकना शामिल है.

क्या कहते हैं याचिकाकर्ता? 
नए नियम के सेक्शन 3(C) को लेकर विवाद खड़ा हो गया है. इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है. याचिकाकर्ता का कहना है कि यह नियम भेदभावपूर्ण और मनमाना है, और यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और व्यक्तिगत आजादी जैसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है. याचिका में इस नियम को असंवैधानिक घोषित करने और इसे हटाने की मांग की गई है.

UGC का तर्क है कि इस नियम की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि 2020 से 2025 के बीच उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतों में 100% से अधिक बढ़ोतरी देखी गई. इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे मामलों में दिए गए निर्देशों को ध्यान में रखते हुए भी इस नियम को तैयार किया गया.

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