24 साल पहले दिनदहाड़े वाराणसी के कैंट थाना क्षेत्र के टकसाल सिनेमा में फायरिंग हुई और फायरिंग हुई उस समय के निर्दलीय विधायक धनंजय सिंह पर. घटना के आरोपी बने बाहुबली मौजूदा विधायक अभय सिंह. अब इस केस में फैसला आया है. वाराणसी में यजुवेंद्र विक्रम सिंह की एमपी-एमएलए कोर्ट ने विधायक अभय सिंह, संदीप सिंह उर्फ पप्पू सिंह और संजय रघुवंशी को बरी कर दिया है.
यह केस अपने आप में काफी रोचक है. रोचक इसलिए क्योंकि इस केस की सुनवाई के दौरान एक घायल ने अपनी पत्थर की आंख निकाल कर गोली लगने की गवाही दी तो वहीं दूसरी तरफ एक गाड़ी के नंबर से गायब हुए एक अक्षर से पूरी घटना संदिग्ध और पुलिस की विवेचना में लापरवाही का लाभ आरोपियों को देते हुए बरी किया गया. क्या कुछ हुआ वाराणसी के टकसाल शूटआउट में कहां पुलिस की चूक हुई? कैसे गवाह पलटे? किस एक अक्षर के नहीं लिखने से जेसीबी और सफारी में मामला फंसा? आइये जानते हैं केस से जुड़े हर पहलू की कहानी...
तारीख 4 अक्टूबर 2002. जगह वाराणसी के कैंट थाना क्षेत्र का टकसाल सिनेमा. वक्त शाम 6:00 बजे. कैंट थाने के क्राइम नंबर 546/ 2002 पर शाम 6:10 को हुई घटना में एफआईआर लिखी गई. एफआईआर जौनपुर की रारी सीट से तत्कालीन निर्दलीय विधायक बने धनंजय सिंह ने लिखवाई. दर्ज कराई गई एफआईआर में लिखा गया कि धनंजय सिंह अपने परिचित रामजी सिंह की पत्नी को कबीर नगर अस्पताल से देखकर वापस जौनपुर जा रहे थे कि तभी सामने से आ रही एक मेरून कलर की सफारी जिसका नंबर MH 04 B 5817 था उसमें से अभय सिंह व चार पांच अज्ञात लोग उतरे और अंधाधुंध फायरिंग कर दी.
इसमें धनंजय सिंह के साथ मौजूद उनके सरकारी जनर वासुदेव पांडे के साथ-साथ उनके परिचित संतोष सिंह बाबा गोली लगने से घायल हो गए. सफारी के बीच सीट पर बैठे संतोष सिंह को गोली लगने से उनके दाहिनी आंख तक निकल गई, जिसका मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में इलाज हुआ. आंख पत्थर की लगवानी पड़ी.
4 अक्टूबर को निर्दलीय विधायक पर हुए इस जानलेवा हमले में अकेले नामजद आरोपी रहे अभय सिंह को 13 अक्टूबर 2002 को पुलिस ने कानपुर से गिरफ्तार कर लिया. अभय 2 अन्य साथियों के साथ गिरफ्तार किए गए. पुलिस ने जांच की तो अभय सिंह के साथ-साथ पांच अन्य नाम- मौजूदा भाजपा एमएलसी विनीत सिंह, संदीप सिंह उर्फ पप्पू सिंह, संजय रघुवंशी, विनोद सिंह और सतेंद्र सिंह बबलू का भी जुड़ गया. जिसपर पुलिस ने सभी 6 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट लगाई.
धनंजय सिंह की सफारी के नंबर के H से कैसे फंसा मामला
इस केस में एफआईआर लिखाने वाले तत्कालीन विधायक धनंजय सिंह ने कहा कि वह अपनी सफारी गाड़ी MH 04 B 5817 से जा रहे थे और इसी गाड़ी पर हमला हुआ. ऑटोमेटिक असलहो से फायरिंग की गई. एफआईआर लिखाने से लेकर पुलिस को दिए गए बयान हो, 7 पेज के कोर्ट में बयान हो, 50 पेज की मुख्य गवाही में तक धनंजय सिंह जिस गाड़ी से चल रहे थे उसका नंबर यही MH 04 B 5817 बताते रहे.
इस मामले में बचाव पक्ष ने दलील दी गई कि यह गाड़ी नंबर तो महाराष्ट्र में जेसीबी के नंबर पर रजिस्टर्ड है तो तर्क दिया गया कि महाराष्ट्र में जेसीबी का यह नंबर घटना के 2 साल बाद 2004 में अलॉट हुआ, जबकि घटना पहले की है. लेकिन फिर धनंजय सिंह की तरफ से कोर्ट को बताया गया कि उनकी गाड़ी का नंबर MH 04 BH 5817 है. वह हड़बड़ी में गाड़ी के नंबर में एक अक्षर H लिखना भूल गए थे. साथ ही कहा गया कि चूंकि गाड़ी उनके मित्र संतोष सिंह के बड़े भाई योगेश सिंह के नाम पर है और यह उनको संतोष ने गिफ्ट की है इसलिए उनको गाड़ी का नंबर याद नहीं था. लेकिन धनंजय सिंह ने कोर्ट में इस गाड़ी के गिफ्ट किए जाने से संबंधित कोई भी पेपर नहीं लगाए. इस गाड़ी नंबर के जो कागजात लगे वह अमृतलाल पांचाल के थे यानी बयान में गाड़ी योगेश सिंह की बताई गई मगर कागजात अमृतलाल पांचाल के नाम पर थे.
इस गाड़ी के संबंध में पुलिस की तरफ से भी सबसे बड़ी लापरवाही बरती गई. केस की सबसे बड़ी गवाही केस प्रॉपर्टी सफारी गाड़ी को पुलिस ने कभी अपने कब्जे में लिया ही नहीं, ना ही इसका कभी टेक्निकल मुआयना हुआ, ना ही कभी किसी फॉरेंसिक की टीम ने जांच की. आखिर गाड़ी पर फायरिंग किस एंगल से और कहां-कहां की गई. यानी जिस गाड़ी से धनंजय सिंह चल रहे थे उस गाड़ी का पहले नंबर गलत बताया गया और फिर वह गाड़ी कभी पुलिस के पास मुआयने के लिए गई ही नहीं. जांच अधिकारी ने अपनी केस डायरी में यह जरुर लिखा की सफारी के शीशे पर 3 गोली थी, बोनट पर 4 गोली लगी, बाईं तरफ 2 गोली लगी और एक गोली कोने के ऊपर लगी. लेकिन पुलिस ने मौके से इस ताबड़तोड़ फायरिंग में शीशा टूटने का ना तो जिक्र किया और ना ही मौके से कोई शीशा बरामदगी की बात लिखी, ना ही कोई टूटे शीशे का नमूना कोर्ट में पेश किया गया.
एफआईआर लिखने और घटना की टाइमिंग में 1 घंटा 45 मिनट का अंतर
दर्ज कराई गई एफआईआर के अनुसार, घटना 6:00 बजे के लगभग की है. 6:20 पर निजी अस्पताल सिंह मेडिकल सेंटर का मेमो बना. एफआईआर 7.45 PM पर दर्ज करवाई, लेकिन 10:15 PM पर कबीर चौरा सरकारी अस्पताल का पर्चा बना तो सरकारी अस्पताल के इस पर्चे में एफआईआर नंबर और चोटों का जिक्र नहीं था.
कोर्ट में नकली आंख निकालकर दिलवाई गवाही
अभय सिंह के वकील प्रभात सिंह मानु के मुताबिक, इस केस में सर्वाधिक जिस शख्स को घायल बताया गया वह सफारी में बीच की सीट पर बैठा संतोष सिंह था. बताया गया संतोष को एक गोली उसके दाहिने कान से घुसकर दाहिनी आंख से निकल गई थी, जिसकी वजह से उसने मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में इलाज करवाया और उसे पत्थर की आंख लगवानी पड़ी. कोर्ट में जिरह के दौरान घटना को साबित करने के लिए अपनी पत्थर की आंख भी निकालकर दी लेकिन संतोष सिंह की आंख 4 अक्टूबर 2002 को टकसाल सिनेमा के सामने हुई धनंजय सिंह के काफिले पर फायरिंग में चोटिल हुई निकल गई और फिर ऑपरेट होकर पत्थर की आंख लगाई गई इस संबंध में कोई मेडिकल दस्तावेज कोर्ट में पेश नहीं किया जा सका.
कोर्ट ने भी कहा कि माना कि संतोष सिंह की आंख नकली है, चोट लगने से आंख निकल भी गई होगी, लेकिन यह आंख चोटिल टकसाल सिनेमा के शूटआउट में हुई इस संबंध कोई भी मेडिकल रिपोर्ट पेश नहीं की जा सकी. संतोष के बयान में भी मामला फंस गया. संतोष ने कहा 4 अक्टूबर को गोली लगने पर उसने प्राथमिक उपचार सिंह रिसर्च मेडिकल सेंटर में करवाने के बाद 5 अक्टूबर को वह मुंबई के ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल चला गया. जबकि इस केस के विवेचना अधिकारी ने लिखा कि उसने संतोष सिंह को 6 अक्टूबर को वाराणसी के नदेसर तिराहे पर रोककर उस समय बयान लिया था. यानी संतोष के अनुसार वह इलाज के लिए 5 अक्टूबर को मुंबई चला गया था और पुलिस कह रही है कि उसने 6 अक्टूबर को संतोष सिंह का बयान नदेश्वर तिराहे पर लिया.
फायरिंग बांए से तो दाहिने भाग में गोली कैसे लगी
अपने बयान में धनंजय सिंह ने ही कहा कि उनकी गाड़ी पर बाएं से और सामने से हमला हुआ. चारों तरफ से, पीछे से, या दाहिने से कोई फायर या हमला नहीं हुआ. लेकिन सफारी गाड़ी के बीच में बैठे संतोष सिंह को दाहिनी कान से होते हुए दाहिनी आंख में गोली लगी.
फर्द बरामदगी वाले गवाह पलट गए
4 अक्टूबर 2002 को शाम 6:00 बजे ताबड़तोड़ फायरिंग की घटना के बाद पुलिस के अनुसार उसे मौके से 12 बोर के 2 खोखे, 315 बोर का एक खोखा और 9mm के 16 खोखे बरामद हुए. पुलिस ने इस मामले में मोहम्मद इदरीश और मोहम्मद सिराज को फर्द बरामदगी का गवाह बनाया. लेकिन इन दोनों ही गवाहों को चार्जशीट का गवाह नहीं बनाया. मगर कोर्ट में जब बचाव पक्ष से एक गवाह मोहम्मद इदरीश को खड़ा किया तो उसने कहा- मैं पढ़ा लिखा नहीं हूं, अंगूठा लगाता हूं, इसलिए मेरे बयान लिखने का सवाल ही नहीं है. वहीं, दूसरे गवाह मोहम्मद सिराज ने कहा कि वह कक्षा 2 तक पढ़ा है लेकिन यह मेरे साइन नहीं है. साथ ही कहा कि ना तो मेरी दुकान के सामने घटना हुई और ना ही फर्द बरामदगी में यह मेरे दस्ताखत है.
धनंजय सिंह ने बयान दिया कि फायरिंग के बाद उनका एक्सरे कबीर चौराहा सरकारी अस्पताल में हुआ, सिंह मेडिकल सेंटर में नहीं हुआ. लेकिन कोर्ट में एक्सरे की जो प्लेट लगाई गई वह सिंह मेडिकल सेंटर की लगाई गई थी. धनंजय की चोटों के मेडिकल में भी कहा गया कि चोट की गहराई इतनी कम है कि उसे नापा नहीं जा सकता, जबकि गोली की चोट गहराई तक होती है और उसका घाव गहराई लेता है. ऐसे में धनंजय को लगी चोट जिसे गोली का बताया गया उस पर भी मेडिकल रिपोर्ट में सवाल खड़े हो गए थे.
धनंजय सिंह ने एफआईआर में अपना नंबर 9415 905703 दर्ज कराया था. कहा कि विधायक बनने पर उत्तर प्रदेश शासन ने उन्हें दिया था. इस पर जब उत्तर प्रदेश सरकार के समीक्षा अधिकारी की गवाही करवाई और जिसके अनुसार यह नंबर मई 2006 यानी टकसाल सिनेमा शूटआउट के 4 साल बाद 17 मई 2006 को 14वें विधानसभा में विधायकों के लिए उपलब्ध कराया गया था. उससे पहले किसी को यह नंबर नहीं दिया गया था. इस पर कोर्ट ने अपने आदेश में लिखा कि इससे वादी के कोर्ट में तथ्य छुपाने की प्रवृत्ति स्पष्ट होती है.
इसके अलावा पुलिस की जांच भी बेहद सतही रही. पुलिस ने इस मामले में उस सफारी गाड़ी को जब्त नहीं किया जिस पर फायरिंग हुई. पुलिस ने किसी भी घायल के शरीर से मिली एक भी गोली को जब्त नहीं किया जिससे पता लगाया जा सके कि गोली किसके शरीर में कहां लगी और किस हथियार से चली थी.
बचाव पक्ष की तरफ से कहा गया कि घटना के लगभग 11 घंटे पहले ही नामजद आरोपी- अभय सिंह 4 अक्टूबर 2002 को सुबह 7:30 घटनास्थल से करीब 200 किलोमीटर दूर फैजाबाद के पूरा बाजार प्राथमिक चिकित्सालय में भर्ती थे. उनका मोटरसाइकिल से एक्सीडेंट हो गया था जिसकी वजह से वह और संदीप सिंह 4 अक्टूबर 2002 को सुबह 7:30 से 5 अक्टूबर 2002 को शाम 4:00 बजे तक पूरा बाजार के प्राथमिक चिकित्सालय में ही भर्ती रहे और इलाज करवाते रहे.
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए वाराणसी की एमपी-एमएलए कोर्ट ने 24 साल पुराने चर्चित टकसाल सिनेमा शूटआउट केस में विधायक अभय सिंह समेत सभी आरोपियों को बरी कर दिया. कोर्ट ने 79 पन्नों के आदेश में पुलिस विवेचना की गंभीर लापरवाहियों, एफआईआर की तकनीकी खामियों और घायलों की विरोधाभासी गवाहियों को आधार बनाया. मामले में बचाव पक्ष के वकीलों ने पुलिस द्वारा घटनास्थल से साक्ष्य न जुटाने और मेडिकल रिपोर्ट में विसंगतियों पर प्रभावी तर्क दिए. अभियोजन पक्ष सुबूतों के अभाव में दोष सिद्ध करने में विफल रहा, जिसके परिणामस्वरूप अदालत ने संदीप सिंह और संजय रघुवंशी सहित सभी को दोषमुक्त कर दिया.