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सहारा शहर मामले में नगर निगम लखनऊ को मिली कानूनी जीत, हाईकोर्ट ने सुनाया फैसला

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने सहारा कमर्शियल की याचिका खारिज करते हुए नगर निगम लखनऊ की कार्रवाई को वैध ठहराया है. नगर निगम ने सहारा शहर को लीज शर्तों के उल्लंघन के आरोप में अपने कब्जे में लिया था. सहारा समूह ने इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.

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निगम ने बताया, साल 2020 और 2025 में कई बार नोटिस जारी कर कंपनी को सुधार करने का मौका दिया था.  (Photo: ITG)
निगम ने बताया, साल 2020 और 2025 में कई बार नोटिस जारी कर कंपनी को सुधार करने का मौका दिया था. (Photo: ITG)

करीब 170 एकड़ में फैले सहारा शहर प्रकरण में नगर निगम लखनऊ को बड़ी राहत मिली है. लंबे समय से चल रहे इस विवाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने सहारा कमर्शियल की ओर से दायर रिट याचिका को खारिज कर दिया है.अदालत के इस फैसले ने नगर निगम की कार्रवाई को वैध ठहराते हुए उसके पक्ष को मजबूत किया है और शहर प्रशासन की साख को मजबूती दी.

बता दें कि गोमतीनगर स्थित सहारा शहर को नगर निगम ने लीज शर्तों के उल्लंघन के आरोप में अपने कब्जे में लिया था. नगर निगम का कहना था कि साल 1994 में हुई लीज के तहत निर्धारित शर्तों का पालन नहीं किया गया, साथ ही कई निर्माण और उपयोग नियमों का उल्लंघन पाया गया. जांच के बाद नगर निगम ने कार्रवाई करते हुए पूरे परिसर के 6 गेट सील कर दिए और प्रशासनिक नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया.

सहारा समूह ने इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और इसे मनमाना और प्रक्रिया के विपरीत बताया था. हालांकि, नगर निगम ने अदालत में स्पष्ट किया कि कार्रवाई पूरी तरह नियमानुसार की गई. निगम ने यह भी बताया कि साल 2020 और 2025 में कई बार नोटिस जारी कर कंपनी को सुधार का अवसर दिया गया, लेकिन नियमों का पालन नहीं होने पर ही अंतिम कार्रवाई की गई.

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सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों पक्षों के तर्कों पर विचार किया और पाया कि नगर निगम की ओर से की गई कार्रवाई नियमों के तहत की गई है. इसी आधार पर अदालत ने सहारा की याचिका को खारिज कर दिया. इस फैसले को नगर निगम के लिए बड़ी कानूनी जीत माना जा रहा है, क्योंकि इससे स्पष्ट हो गया है कि सार्वजनिक भूमि और संसाधनों के संरक्षण के लिए की गई कार्रवाई न्यायिक कसौटी पर खरी उतरी है.

इस पूरे मामले में यह भी सामने आया कि संबंधित भूमि पर लीज की अवधि समाप्त होने और शर्तों के उल्लंघन के चलते नगर निगम को हस्तक्षेप करना पड़ा. 30 साल की लीज अवधि समाप्त होने के बाद भी निर्धारित विकास कार्य नहीं किए गए थे, जिससे प्रशासन को सख्त कदम उठाने पड़े.

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