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5 साल के बेटे का एक 'झूठ', 23 साल जेल में रहा पिता...पत्नी और 3 बच्चों की हत्या का लगा था आरोप

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी और तीन बच्चों की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे रईस को करीब 23 साल बाद बरी कर दिया. अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप संदेह से परे साबित नहीं कर सका. एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी की गवाही और मेडिकल साक्ष्यों में विरोधाभास पाए गए. अदालत ने न्याय व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता पर भी गंभीर टिप्पणी की.

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5 साल के बेटे का एक 'झूठ', 23 साल तक जेल में रहा पिता (Photo: representational image )
5 साल के बेटे का एक 'झूठ', 23 साल तक जेल में रहा पिता (Photo: representational image )

करीब तेईस साल सलाखों के पीछे गुजारने के बाद जब रईस जेल से बाहर आएगा, तो उसके सामने आजादी से ज्यादा सवाल खड़े होंगे. जिन रिश्तों के बीच वह कभी लौटा करता था, वे अब शायद वैसी स्थिति में नहीं हैं. पत्नी और तीन बच्चों की मौत के आरोप में बीते दो दशक और उससे ज्यादा का समय उसके जीवन से कट चुका है. ऐसे भावुक कर देने वाला कमेंट के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उसे संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है.

एजेंसी के अनुसार न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की सदस्यता वाली इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 16 फरवरी को सुनाए अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी का अपराध साबित करने में विफल रहा. अदालत ने इस प्रकरण को देश की आपराधिक न्याय प्रणाली पर 'दुखद टिप्पणी' बताते हुए कहा कि न्यायिक ढांचे में बुनियादी सुधार समय की मांग है.

क्या हुआ था 2003 की उस रात को?

आरोप के अनुसार 29-30 अगस्त 2003 की दरम्यानी रात घरेलू विवाद के बाद रईस ने कथित तौर पर चाकू से अपनी पत्नी और तीन बच्चों की हत्या कर दी थी. मृतका के चाचा की ओर से प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी. ऐसे में निचली अदालत ने चार हत्याओं के आरोप में रईस को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुना दी थी.

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'मैं 5 साल का था, दबाव में बयान दिया- बोला 28 साल का बेटा'

हाईकोर्ट में अपील की सुनवाई के दौरान अदालत ने पूरे साक्ष्य की विस्तार से समीक्षा की. मामले का एकमात्र गवाक दंपति का पांच साल का बेटा अजीम था, जो घटना के समय घर में मौजूद बताया गया. जिरह के दौरान आज 28 साल के हो चुके उस बेटे ने स्वीकार किया कि उसने शिकायतकर्ता और सरकारी वकील के कहने पर बयान दिया था. उसने यह भी कहा कि यदि वह उनकी बात नहीं मानता तो उसे घर से निकालने की धमकी दी गई थी. अदालत ने युवक के इस बयान को गंभीर तथ्य माना.

शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच जमीन विवाद

पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच जमीन को लेकर विवाद चल रहा था, जिससे शिकायतकर्ता की मंशा पर संदेह उत्पन्न होता है. मेडिकल साक्ष्यों की जांच में भी महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने आया. 

मेडिकल साक्ष्यों में भी विरोधाभास

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दर्ज चोटों के आधार पर अदालत ने पाया कि घातक वार किसी भारी धारदार हथियार से किए गए प्रतीत होते हैं, जबकि अभियोजन ने सामान्य चाकू से हमला किए जाने की बात कही थी. अदालत ने कहा कि यह अंतर अभियोजन की कहानी को कमजोर करता है.

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शिकायतकर्ता के खिलाफ भी सबूत काफी नहीं 

पीठ ने टिप्पणी की कि घटना निस्संदेह अत्यंत जघन्य थी, लेकिन उपलब्ध साक्ष्य इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए पर्याप्त नहीं थे कि अपराध शिकायतकर्ता ने ही किया है. ऐसे में संदेह का लाभ देते हुए रईस को बरी किया जाता है और यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो तो तत्काल रिहा किया जाए.

23 साल जेल में, अब असली परीक्षा शुरू

अदालत ने यह भी कहा कि रिहाई के बाद उसकी असली परीक्षा शुरू होगी, क्योंकि परिवार का बड़ा हिस्सा अब इस दुनिया में नहीं है और यह भी निश्चित नहीं कि उसका जीवित पुत्र उसे स्वीकार करेगा या नहीं. करीब ढाई दशक की कैद के बाद यह फैसला न केवल एक व्यक्ति की किस्मत बदलता है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया और साक्ष्यों की गुणवत्ता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है.
 

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