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यहां का ये अनोखा रिवाज... शादी के बाद दूल्हे का घर छोड़ पड़ोसी के यहां चली जाती है दुल्हन

चीन में कुछ जगहों पर एक रिवाज प्रचलित है. वहां शादी के बाद नई-नवेली दुल्हन को पति का घर छोड़कर किसी और के घर में रहना पड़ता है. जानते हैं ऐसे रस्म के पीछे आखिर कहानी क्या है?

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यहां शादी के बाद दुल्हन को ससुराल भी छोड़ना पड़ता है (Photo - Pixabay)
यहां शादी के बाद दुल्हन को ससुराल भी छोड़ना पड़ता है (Photo - Pixabay)

चीन सांस्कृतिक रूप से काफी विविधताओं वाला देश है. वहां ढेर सारी संस्कृतियों के लोग देश के अलग-अलग हिस्सों में रहते हैं. ऐसे में इनके परंपराएं, रस्म और रिवाज भी अलग-अलग होती हैं. कुछ तो इतनी अनूठी है, जिसके बारे में काफी कम लोग जानते हैं. ऐसा ही एक रिवाज है - लालटेन से छिपने का रिवाज. जानते हैं ये रस्म क्या है. 

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तरी चीन में शादी के बाद "लालटेन से छिपने" की एक रस्म निभाई जाती है. इस पारंपरिक प्रथा के अनुसार, नवविवाहित महिलाओं को शादी के बाद अपने पहले लालटेन उत्सव पर अपने पति का घर छोड़कर किसी दूसरे के घर में जाकर रहना होता है. 

चीन में लालटेन को आमतौर पर प्रकाश और आशा के प्रतीक के रूप में देखा जाता है. हालांकि, चंद्र कैलेंडर के पहले महीने के पंद्रहवें दिन मनाए जाने वाले लालटेन महोत्सव के दौरान, कुछ क्षेत्रों में नवविवाहित महिलाओं के लिए ये एक वर्जित उत्सव होता है. 

लालटेन की रोशनी से बचने के लिए क्यों छोड़ देती हैं ससुराल 
इस परंपरा को  डुओडेंग के नाम से जाना जाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ है "लालटेन से छिपना". शादी के बाद घर आई नवविवाहित बहू को त्योहार की रात अपने पति का घर छोड़कर पड़ोसी के घर शरण लेनी पड़ती है. क्योंकि दूल्हे के घर पर जलाई गई लालटेन देखने की उसे अनुमति नहीं होती है.

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सुसराल में रहकर उत्सव के दौरान लालटेन देखने के बजाय दुल्हन को अपने माता-पिता के घर जाना होता है या वह किसी पड़ोसी के घर में रहने चली जाती है.  यह प्रथा मुख्य रूप से पूर्वोत्तर चीन के शानक्सी प्रांत और उत्तरी चीन के अन्य हिस्सों में प्रचलित है. कुछ क्षेत्रों में तो विवाह के बाद लगातार तीन वर्षों तक इस रस्म को निभाया जाता है. 

इस रिवाज की शुरुआत को लेकर अलग-अलग कहानियां हैं. एक व्याख्या के अनुसार, इसका संबंध प्रारंभिक मांचू लोगों की विवाह संबंधी रीति-रिवाजों से हैं, जिसके अनुसार दुल्हन को शादी के बाद पहले वर्ष अपने मायके वालों के साथ रहना पड़ता था. समय के साथ, यह "लालटेन से छिपने" की रस्म में बदल गया है.

एक अन्य व्याख्या यह बताती है कि मध्य मैदानी संस्कृति में, लालटेन पूर्वजों के प्रतीक थे. लालटेन से परहेज करके, नई दुल्हन प्रतीकात्मक रूप से परिवार की वंश परंपरा में अगली पीढ़ी के लिए जगह बनाती थी. लोक परंपरा के अनुसार, यदि कोई नवविवाहित महिला लालटेन उत्सव के दौरान अपने पति के घर पर रहती है, तो इससे आने वाले वर्ष में उसके ससुराल वालों के स्वास्थ्य पर दुर्भाग्य आ सकता है.

मायके भी नहीं जा सकती दुल्हन
इस रस्म से जुड़ी एक पुरानी कहानी में ये चेतावनी दी जाती है कि यदि आप पंद्रहवें दिन लालटेन से परहेज नहीं करते हैं, तो आपकी सास अंधी हो जाएंगी. हालांकि, कुछ क्षेत्रों में, दुल्हनों को अपने मायके लौटने के लिए भी प्रोत्साहित नहीं किया जाता है. इसके बजाय, उनसे उम्मीद की जाती है कि वे किसी पड़ोसी के घर में छिप जाएं, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि घर लौटने से उनके मायके में गरीबी या दुर्भाग्य आ सकता है.

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इससे जुड़े एक अन्य किस्से के मुताबिक, यदि एक विवाहित बेटी अपने माता-पिता के घर पर लालटेन देखती है, तो उसके माता-पिता गरीब हो जाएंगे, या उसके पिता की मृत्यु हो सकती है. इसलिए वो न ससुराल में रहती है और न अपने मायके में. वो पड़ोसी के यहां रने चली जाती है.

उत्तरी चीन में, नवविवाहित महिलाओं से पारंपरिक रूप से यह अपेक्षा की जाती है कि वे शादी के बाद लगातार तीन वर्षों तक लालटेन से दूर रहें. दुल्हन के छिपने के लिए सबसे आम जगह पड़ोसी या उनके मामा का घर होता है.

इस दौरान दुल्हनों को सादे कपड़े पहनने होते हैं और शादी से संबंधित किसी भी बात पर चर्चा करने से बचना होता है.  पूर्वोत्तर चीन में, दुल्हन को सूर्यास्त से पहले उसके ननिहाल के रिश्तेदार विदा कराकर ले जाते हैं. उसे लालटेन देखने से सख्ती से मना किया जाता है, चाहे वह उसके मायके में हो या उसके ससुराल में.कुछ परिवारों ने पारंपरिक प्रवास के स्थान पर यात्रा या छोटी छुट्टी का विकल्प चुनकर इस परंपरा का आधुनिकीकरण किया है.

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