'प्रिय यात्री, आपकी टिकट कन्फर्म हो गई है' मोबाइल स्क्रीन पर चमकता यह छोटा सा मैसेज आजकल के युवाओं के लिए किसी टॉनिक से कम नहीं है.
कल्पना कीजिए, आप ऑफिस में बैठे हैं. एक तरफ क्लाइंट की कॉल चल रही है, दूसरी तरफ डेडलाइन का प्रेशर है और ऊपर से बॉस की चिक-चिक खत्म होने का नाम नहीं ले रही. ऐसे में आप गुस्से और झुंझलाहट में अपना फोन उठाते हैं और बिना ज्यादा सोचे-समझे सीधे किसी हिल स्टेशन या बीच की टिकट बुक कर देते हैं. अगर आपने कभी ऐसा किया है, तो जान लीजिए कि आप अकेले नहीं हैं. इसे आजकल की भाषा में रेज बुकिंग कहा जा रहा है.
अब आपके मन में सवाल तो उठा होगा कि आखिर क्या है ये रेज बुकिंग? जिसके दीवाने भारत के Gen Z और मिलेनियल्स हो रहे हैं. तो चलिए इसके बारे में विस्तार से समझ लेते हैं कि यह क्या बला है.
रेज बुकिंग कोई ऐसी ही हवा-हवाई बात नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक सर्वे के चौंकाने वाले आंकड़े भी हैं. अमेरिका स्थित फेय ट्रैवल, जो कि एक यात्रा बीमा प्लेटफॉर्म है, ने सबसे पहले इस शब्द का इस्तेमाल किया था. उनके एक सर्वे के अनुसार, हर तीन में से एक व्यक्ति कार्यस्थल के तनाव यानी वर्कप्लेस बर्नआउट से निपटने के लिए अचानक छुट्टियां बुक कर रहा है. इसे सरल भाषा में कहें तो रेज बुकिंग का मतलब है ऑफिस के तनाव या हताशा में आकर अचानक किसी यात्रा का प्लान बना लेना. आज के समय में 25 से 45 साल के युवाओं के लिए घूमना अब सिर्फ एक शौक नहीं, बल्कि खुद को टूटने से बचाने का एक जरिया बन गया है. उनके लिए यह सफर मजे से ज्यादा सुकून की तलाश है.
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संस्कृति और क्षितिज की कहानी
24 साल की संस्कृति सिंह एक पीआर कंपनी में काम करती हैं. काम के बोझ की वजह से उन्होंने पहले अपने दोस्त की ट्रिप कैंसिल कर दी थी. लेकिन ऑफिस में बढ़ते तनाव ने उन्हें इतना परेशान कर दिया कि उन्होंने उसी पल दोबारा टिकट बुक कर ली. संस्कृति कहती हैं, अगली सुबह जब मेरी आंख खुली और सामने समुद्र का सुंदर नजारा था, तो मुझे एहसास हुआ कि काम की टेंशन के बीच यह ब्रेक मेरे लिए कितना जरूरी था. वहीं, 31 साल के क्षितिज गुप्ता ने एक थका देने वाली लंबी वर्क कॉल के बाद अचानक भोपाल जाने का फैसला कर लिया. रात 11 बजे दोस्तों को फोन मिलाया और कुछ ही घंटों में फ्लाइट की टिकट उनके हाथ में थी.
आंकड़े दे रहे हैं गवाही
भारत के ट्रैवल मार्केट से जुड़े आंकड़े भी इस बदलाव की गवाही दे रहे हैं. रिपोर्ट्स बताती हैं कि पिछले कुछ समय में लास्ट मिनट बुकिंग यानी यात्रा से ठीक पहले टिकट बुक करने के मामलों में 30% तक की बढ़ोतरी हुई है. हैरानी की बात तो यह है कि लाखों की संख्या में फ्लाइट टिकट रात के 3 से 4 बजे के बीच बुक की जा रही हैं. यह वही समय है जब इंसान या तो चैन की नींद सोता है या फिर करियर और काम की चिंता में डूबा होता है. युवाओं की यह बेचैनी अब उन्हें सीधे एयरपोर्ट या रेलवे स्टेशन तक ले जाने पर मजबूर कर रही है.
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Gen Z और मिलेनियल्स ही क्यों?
आज का युवा वर्ग अब छुट्टियों के लिए किसी खास मौके का इंतजार नहीं करता. उनके लिए घूमना अब केवल शौक नहीं, बल्कि खुद को बचाने का एक तरीका बन गया है. इस पर में विशेषज्ञों का कहना है कि ऑफिस में जहां हर चीज बॉस या कंपनी के हिसाब से चलती है, वहां एक ट्रिप की बुकिंग युवा को यह एहसास दिलाती है कि उसका अपनी जिंदगी पर अब भी कंट्रोल है. वह खुद यह फैसला कर सकता है कि उसे कहां जाना है और कब उठना है. यही वजह है कि अपनी मानसिक शांति के लिए युवा अब अपनी बचत खर्च करने या ईएमआई (EMI) पर पैसे लेने से भी नहीं हिचकिचा रहे.
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या रेज बुकिंग वाकई इस समस्या का सही समाधान है? इस पर एक्सपर्ट्स का मानना है कि रेज बुकिंग तनाव से बचने के लिए एक अस्थाई राहत तो हो सकती है, लेकिन यह ऑफिस की समस्याओं का कोई पक्का इलाज नहीं है. कड़वा सच तो यह है कि अगर आप सिर्फ काम से भागने के लिए घूम रहे हैं, तो ऑफिस लौटते ही वही काम का बोझ और तनाव आपको फिर से घेर लेगा.