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नैमिषारण्य

नैमिषारण्य

नैमिषारण्य

नैमिषारण्य (Naimisharanya) भारत का एक बेहद पवित्र और प्राचीन तीर्थ स्थल है, जिसे हिंदू धर्म में खास महत्व दिया जाता है. नैमिषारण्य उत्तर प्रदेश में स्थित है और सीतापुर से लगभग 32 किलोमीटर दूर है. इसे निम्सार या निमखार के नाम से भी जाना जाता है. यह गोमती नदी के किनारे बसा हुआ है, जिससे इसकी सुंदरता और भी बढ़ जाती है. यहां का नैमिषनाथ विष्णु मंदिर भी बहुत प्रसिद्ध है. इस मंदिर की खास बात यह है कि इसका निर्माण दक्षिण और उत्तर भारतीय शैली के मिश्रण से हुआ है. मंदिर के बाहर “गोपुरम” है, जो दक्षिण भारतीय मंदिरों की पहचान है, जबकि अंदर की बनावट उत्तर भारतीय शैली की झलक दिखाती है. मंदिर में एक खास “गरुड़ स्तंभ” भी है, जो सोने से जड़ा हुआ है और भगवान विष्णु के सामने स्थित है.

मंदिर में तीन मुख्य गर्भगृह हैं, एक भगवान विष्णु के लिए, दूसरा महालक्ष्मी के लिए और तीसरा रामानुजाचार्य के लिए. यहां भगवान विष्णु की सुंदर प्रतिमा काले पत्थर से बनी है और साथ में पंचधातु की चल प्रतिमाएं भी हैं.

मान्यता है कि यहीं पर पहली बार सत्यनारायण व्रत कथा का आयोजन हुआ था. इसलिए इस जगह को इस कथा का उद्गम स्थल भी माना जाता है. कहा जाता है कि यहां एक समय में 88,000 ऋषि-मुनि एक साथ तपस्या करते थे, जिससे इसकी पवित्रता और भी बढ़ जाती है.

इस तीर्थ में मां ललिता देवी का प्रसिद्ध शक्तिपीठ स्थित है, जो देवी के 108 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है. यहां श्रद्धालु दूर-दूर से दर्शन करने आते हैं. माना जाता है कि इस स्थान पर माता की विशेष कृपा बनी रहती है.

नैमिषारण्य का संबंध वेद व्यास जी से भी जुड़ा है. मान्यता है कि उन्होंने इसी पवित्र भूमि पर बैठकर अपने शिष्यों को वेद और पुराणों का ज्ञान दिया था. आज भी यहां “व्यास गद्दी” नाम का स्थान मौजूद है, जहां लोग श्रद्धा से जाते हैं. इसके अलावा महर्षि दधीचि की तपोस्थली भी यहीं है. उन्होंने लोक कल्याण के लिए अपनी हड्डियों तक का दान कर दिया था, जो त्याग और बलिदान की मिसाल है.

यह पूरा क्षेत्र करीब 84 कोस में फैला हुआ है, जिसमें कई पवित्र स्थल शामिल हैं जैसे रुद्रावर्त, हत्याहरण, जानकी कुंड, सूत गद्दी और गोमती नदी का तट. इन सभी जगहों का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है. लोग यहां आकर स्नान, पूजा और ध्यान करते हैं.

कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य और सूरदास जैसे महान लोग भी यहां आ चुके हैं. साथ ही महर्षि सूत ने भी यहीं रहकर ऋषियों को पुराणों का ज्ञान दिया था.

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