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टोक्यो ओलंपिक

Tokyo Olympics: इस खास दांव से रवि दहिया को मिलेगा गोल्ड मेडल! जानें सब कुछ

गोल्ड मेडल के लिए रूस के पहलवान से भीड़ेंगे रवि दहिया
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टोक्यो ओलंपिक में पहलवान रवि दहिया इतिहास रचने के लिए ताल ठोकेंगे. जिस काम को देश के बड़े बड़े दिग्गज पहलवान अनजाम नहीं दे सके. रवि उसे हासिल कर देश को गौरवान्वित करने की कोशिश करेंगे. 57 किलोग्राम वेट कैटेगरी के सेमीफाइनल में कजाकिस्तान के नूरीस्लाम सनायेव को पटखनी देकर सिल्वर मेडल पक्का कर लिया है अब उनकी नजर गोल्ड मेडल हासिल करने पर होगी. जहां उनका मुकाबला दो बार के वर्ल्ड चैंपियन रूस के पहलवान जावुर युगुऐव से होगा. 

रवि कुमार दहिया- (फोटो गैटी)

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चौथी वरीयता प्राप्त भारतीय पहलवान रवि कुमार दहिया अब गोल्ड मेडल से सिर्फ एक कदम दूर हैं. वो आज (गुरुवार) फाइनल मुकाबले के उतरेंगें, जहां पर रवि रूस के ताकतवर पहलवान जावुर युगुऐव से होगा. यह मुकाबला रवि के लिए आसान नहीं होगा क्योंकि युगुऐव दो बार के वर्ल्ड चैम्पियन हैं. ऐसे में रवि को बड़ी सावधानी के साथ मुकाबला खेलना होगा.  

(फाइल फोटो: Getty)
 

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इस महामुकाबले में लिए रवि ने खास तैयारी की हुई है. वो रूस के पहलवान के खिलाफ अपने उसी खास दांव का इस्तेमाल करेंगे. जो उन्होंने कजाकिस्तान के पहलवान के खिलाफ किया. उस दांव का नाम है 'लकड़बग्घा'. जानकारों का कहना है अगर रवि अपने इस खास दांव लगाने में कामयाब हो जाते हैं तो सोने का तमगा उनके गले में होगा. 

(फाइल फोटो: Getty)

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सेमीफाइनल मुकाबले में 9 अंकों से पिछड़ने के बाद दहिया ने जिस तरह वापसी की वह काबिले तारीफ है. रवि ने अंतिम समय में लकड़बग्घा दांव लगाया था. इसका नाम लकड़बग्घा दांव इसलिए पड़ा कि क्योकि लकड़बग्घा अपना शिकार इस तरह से करता है. वह पहले अपने शिकार के गर्दन पर वार करता है और उसे नीचे कर पैर खिंचता है, उसके बाद उसे पलट देता है. 

(फाइल फोटो: AP)

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सेमीफाइनल मुकाबले में रवि ने गजब का प्रदर्शन किया और कजाकिस्तान के नूरीस्लाम सनायेव को एक रोमांचक मुकाबले में शिकस्त दी. एक समय पर रवि  2-9 से पीछे चल रहे थे, लेकिन उन्होंने कुछ शानदार दांव लगाए और हारी हुई बाजी को पलट कर रख दिया और सिल्वर मेडल पक्का कर लिया. 

(फाइल फोटो: Getty)
 

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रवि दहिया कुश्ती के ओलंपिक फाइनल में पहुंचने वाले दूसरे पहलवान बन गए हैं. इससे पहले सुशील कुमार 2012 ओलंपिक में फाइनल में पहुंच कर सिल्वर मेडल जीत चुके हैं. अब उनसे देश को गोल्ड मेडल की दरकार है.  

(फाइल फोटो: Getty)

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रवि दहिया का जन्म हरियाणा के सोनीपत जिले के नाहरी गांव में हुआ था. वो कड़ी मेहतन के बल पर आज जिस मुकाम पर पहुंचे हैं,  उसके पीछे उनकी 13 सालों की कठोर तपस्या है. यहां तक पहुंचने के लिए रवि और उनके परिवार ने कई कुर्बानियां दी हैं. 

(फाइल फोटो: Getty)

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नाहरी गांव ने देश को तीन ओलंपियन पहलवान दिए हैं, जिन्होंने देश का नाम रोशन किया है. महावीर सिंह ने 1980 के मॉस्को और 1984 के लॉस एजेंलिस ओलंपिक खेलों में हिस्सा लिया था, जबकि अमित दहिया लंदन, 2012 के ओलंपिक खेल में हिस्सा ले चुके थे. अब टोक्यो  में रवि दहिया,  इस गांव की आबादी करीब 15 हजार बताई जाती है.  

(फाइल फोटो: Getty)

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रवि को कुश्ती विरासत में मिली है, उन्होंने 10 साल की उम्र में दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में पहलवानी के गुर सीखने शुरू किए थे. बचपन में उन्होंने जो ख्वाब देखा था, वो टोक्यो में पूरा होने वाला है. जिस काम को सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त जैसे पहलवान अंजाम नहीं दे सके उसे पूरा करने का बेड़ा रवि ने अपने कंधे पर उठा लिया है. रवि के पिता का कहना है कि उन्हें अपने बेटी की इस कामयाबी से काफी खुशी है. उन्हें पूरी उम्मीद है कि रवि गोल्ड मेडल लेकर ही आएगा. 

(फोटो: ANI)

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दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम से टोक्यो तक के सफर में रवि के पिता राकेश दहिया का बड़ा अहम योगदान रहा है. बेटे की मेहनत को हौसला देने के लिए पिता हमेशा अपने बेटे के साथ खड़ा नजर आया है. इस सफर में राकेश दहिया अपने बेटे को चैम्पियन पहलवान बनाने के लिए हमेशा दूध, मेवा पहुंचाते रहे. वो चार बजे सुबह उठकर पांच किलोमीटर चलकर नजदीकी रेलवे स्टेशन पहुंचते थे और वहां से आजादपुर रेलवे स्टेशन उतरकर दो किलोमीटर दूर छत्रसाल स्टेडियम पहुंचते थे. यह सिलसिला पिछले कई सालों से चल रहा है. 

(फाइल फोटो: Getty)

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रवि ने छोटी उम्र में ही पहलवानी में अपना लोहा मनवा लिया था. उन्होंने 2015 में जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल जीता. इसके बाद 2018 में अंडर 23 वर्ल्ड चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल पर कब्जा जमाया. 2020 में एशियाई कुश्ती में चैम्पियनशिप में गोल्ड मेडल जीतने में कामयाब रहे. इसके अलाव 2019 में नूर सुल्तान, कजाखस्तान में वर्ल्ड चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज मेडल जीता था और ओलंपिक का कोटा हासिल किया. लेकिन उस समय उनकी पहचान ऐसी नहीं थी जैसी आज है. 

(फाइल फोटो: Getty)

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भारत ने हाल के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय पटल पर कुश्ती में शानदार प्रदर्शन किया है. इसी कड़ी में पिछले तीन ओलंपिक खेलों में भारतीय पहलवानों ने कुल चार मेडल हासिल किए हैं. पहलवान केडी जाधव के हेलसिंकी ओलंपिक (1952) में कांस्य जीतने के 56 साल बाद सुशील कुमार ने 2008 के बीजिंग ओलंपिक में इस उपलब्धि को दोहराया. फिर सुशील ने 2012 के लंदन ओलंपिक में रजत पदक जीता, जबकि योगेश्वर दत्त ने कांस्य पदक जीता. साक्षी मलिक ने 2016 रियो ओलंपिक में एक और कांस्य पदक जीता था. 

Sushil-Yogeshwar-Sakshi (Getty)