मशहूर बॉक्सर एमिले ग्रिफिथ नहीं रहे. 75 साल की उम्र में उनका अमेरिका के न्यूयॉर्क में निधन हो गया. अंतरराष्ट्रीय बॉक्सिंग हॉल ऑफ फेम क्लब ने यह जानकरी दी.
जिंदगी के आखिरी दिनों में वह 'प्यूजीलिस्टिक डिमेंशिया' जैसी बीमारी से जूझने वाले ग्रिफिथ अमेरिका के वर्जिन आइलैंड के पहले बॉक्सर थे, जो विश्व चैंपियन बने और 1990 में हॉल ऑफ फेम में शामिल हुए.
ग्रिफिथ का लगभग पूरा करियर उनकी एक बहुचर्चित और विवादित फाइट के आगोश में रहा. 24 मार्च 1962 का दिन बॉक्सिंग इतिहास की सबसे ज्यादा याद की जाने वाली तारीखों में है. दो दिग्गज मुक्केबाज ग्रिफिथ और बेनी पैरेट नेशनल टीवी ऑडियंस के सामने भि़ड़ रहे थे. मैच 12 राउंड तक खिंचा. ग्रिफिथ ने पैरेट को इतना मारा कि वह कोमा में चले गए और दस दिन बाद अस्पताल में दम तोड़ दिया.
2005 में मशहूर पत्रिका 'स्पोर्ट्स इलस्ट्रेड' में अपनी एक रिपोर्ट में लिखा, 'हो सकता है कि पैरेट ने ग्रिफिथ को समलैंगिक विरोधी टिप्पणी कर उकसाया हो.' ग्रिफिथ अपने जीवन काल में बारी-बारी से खुद को स्ट्रेट, गे और बायसेक्सुअल बता चुके थे.
ग्रिफिथ को वेल्टरवेट टाइटल जीतने की इतनी खुशी नहीं हुई, जितनी मु्श्किलें उन्हें पैरेट की मौत के बाद झेलनी पड़ीं. उन दिनों को याद करते हुए एक बार उन्होंने कहा था, 'सड़क पर लोग मुझ पर थूकते थे. होटल में जब मेरे कमरे के दरवाजे पर आहट होती तो मैं सहम जाता था और दूसरे कमरे में भाग जाता था.'
इसका असर रिंग में भी दिखाई दिया. ग्रिफिथ ने माना, 'मैं पहले जैसा फाइटर नहीं रहा. मैंने फिर कभी सामने वाले फाइटर को नुकसान पहुंचाने की कोशिश नहीं की.'
इस फाइट पर 2005 में एक डॉक्युमेंट्री बनी, 'रिंग ऑफ फायर: द एमिल ग्रिफिथ स्टोरी'.
हॉल ऑफ फेम के डायरेक्टर एड ब्रोफी ने कहा, 'एमिल सच में एक महान मुक्केबाज थे. रिंग के बाहर भी इंसान के तौर पर वह बेहद विनम्र थे.'