विश्व कप क्रिकेट की शुरुआत 1975 में क्रिकेट के दीवानों को ही मुकम्मल टूर्नामेंट में भरपूर मजा देने के मकसद से प्रयोग के तौर पर की गई. मुझे नहीं लगता कि उस समय उसमें शामिल टीमों को अंदाजा भी था कि आखिर वे क्या शुरू कर रहे हैं. ऐसा नहीं कि मुकाबला कड़ा नहीं था—कांटे की स्पर्धा थी—लेकिन सभी टीमें इसे द्विपक्षीय क्रिकेट सीरीज से अलग पखवाड़े भर के मौज-मजे की तरह देख रही थीं और उसी तरह इसका आनंद उठा रही थीं. मैं उस समय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का नया रंगरूट था और अपने कुछ आदर्श बल्लेबाजों के साथ टीम में होने से बेहद खुश था. मुझे उस टूर्नामेंट में बमुश्किल ही बल्लेबाजी का मौका मिला और फाइनल में अपनी फील्डिंग के लिए ही चर्चित हुआ. जब मैंने तीन बल्लेबाजों को रन आउट कर दिया था. खिताब जीतने के बाद और क्लाइव लॉयड को लॉर्ड्स की बालकनी में चांदी के कप को उठाए देखकर ही हमें एहसास हुआ कि हमने कुछ विशेष हासिल कर लिया है.
दूसरे विश्व कप के दौरान मैं बतौर बल्लेबाज अपने करियर को कुछ निखार चुका था. मैं वरिष्ठ बल्लेबाज के रूप में जिम्मेदारी निभाने की कल्पना कर रहा था और इस बार अपने बल्ले से अधिक जांबाजी दिखाने को लेकर बेहद उत्साहित था. विश्व कप इंग्लैंड में ही था—तब हम तो कल्पना भी नहीं कर पाते थे कि यह कहीं और हो सकता है—और मुझे वहां के हालात रास आते थे. इसलिए भी कि मैं उन दिनों समरसेट में काउंटी क्रिकेट खेला करता था. टीम भी काफी खिल उठी थी और यह माना जा रहा था कि हम जहां भी जाते हैं, मैदान मार लेते हैं. गॉर्डन ग्रीनिज, डेसमंड हेंस, क्लाइव लॉयड, आल्विन कालीचरन और कोलिस किंग जैसे बल्लेबाजों के कारण हमारी बल्लेबाजी ही ठोस नहीं थी, बल्कि जोएल गार्नर, माइकल होल्डिंग, एंडी रॉबर्ट्स और कोलिन क्राफ्ट जैसे धुरंधरों की वजह से गेंदबाजी भी लाजवाब थी.
सबसे पसंदीदा टीम होने से खिताब जीत लेने की गारंटी नहीं हो पाती है, इसलिए हमें एहसास था कि हमें मौके पर अपना दमखम दिखाना होगा. हमने भारत के साथ मैच से अपने अभियान की शुरुआत की और आसान-सी जीत हासिल की. शुरुआती मैच से आखिरी मैच तक दो हफ्ते का समय था और हमने शुरुआत अच्छी कर ली तो हमारा जीत का अभियान आगे बढ़ने लगा. लीग मैच आराम से निकल गए और हम आसानी से सेमीफाइनल में पहुंच गए.
सेमी फाइनल तब बेहद अच्छी टीम पाकिस्तान के साथ था. वह उन टीमों में थी जिसमें गेंदबाजी का धारदार आक्रमण और बल्लेबाजी भी उम्दा थी. मुझे याद है कि ग्रीनिज और हेंस की शतकीय साझेदारी से हम 290 से अधिक रनों की चुनौती दे पाए थे. उन दिनों विश्व कप के मैच 60 ओवरों के हुआ करते थे लेकिन कुल स्कोर 240 से ऊपर ले जाना कठिन होता था. हम टेस्ट मैच के अंदाज में ही पारी खड़ी करते थे. शुरुआत में कुछ मेडन ओवर से चेंज रूम में गुस्से का शिकार नहीं होना पड़ता था. पाकिस्तानी टीम रनों का पीछा करते हुए शुरू में स्कोर दर स्कोर हमारी बराबरी में चल रही थी. माजिद खान और जहीर अब्बास ने खूबसूरत बल्लेबाजी की और एक मोड़ तो ऐसा आया कि हमें अपना पूरा दमखम दिखाकर खेल को ज्यादा कड़ा करना पड़ा. मैं तीन विकेट चटकाकर मैच जीतने में अपने योगदान से काफी खुश था. इस तरह हम मेजबान इंग्लैंड के खिलाफ फाइनल में पहुंच गए.
फाइनल में मेरे शतक के बारे में काफी कुछ लिखा गया है, लेकिन जब मैं याद करता हूं तो मुझे सिर्फ कोलिस किंग के शानदार स्ट्रोक ही लाजवाब लगते हैं. मैं उस साझेदारी के दौरान सिर्फ कोलिस का साथ देकर खुश था और अधिक से अधिक स्ट्राइक उन्हें देने की कोशिश कर रहा था. उनके 86 रन में कुछ शॉट तो ऐसे थे कि किसी भी दौर के बल्लेबाज को उन पर गर्व होगा! हम क्रीज पर उस वक्त साथ हुए थे जब 100 पर चार विकेट गिर गए थे और कुछ कठिनाई से टीम को मजबूत स्थिति में ले गए. मैं पारी की शुरुआत में स्ट्राइक बदलता रहा और आखिर में सही मौके पर मैंने अपनी रफ्तार बढ़ाई. इसका श्रेय भी कोलिस को है क्योंकि वे लगातार रनों की रफ्तार बनाए हुए थे, ताकि हम अच्छे औसत से बना रन सकें. वह शतक इसलिए भी याद किया जाता है कि मैंने माइकल हेंड्रिक की आखिरी गेंद पर छक्का जड़ दिया था. मैंने अंदाजा लगा लिया था कि वे यॉर्कर फेंकने वाले हैं और आगे बढ़कर छक्का जड़ दिया था. संतोषजनक स्कोर बनाने का वह तरीका वाकई लाजवाब था लेकिन हम जानते थे कि प्रुडेंशियल कप को अपने पास रखना है तो हमें गेंदबाजी और फील्डिंग उम्दा करनी होगी.
सलामी बल्लेबाजों ने पहले विकेट के लिए करीब 100 रनों की साझेदारी करके अच्छी टक्कर दी थी लेकिन उन दिनों 290 रनों की चुनौती विकट हुआ करती थी. हमारा गेंदबाजी आक्रमण पूरे टर्नामेंट में काफी किफायती रहा था. इंग्लैंड 50 ओवरों में ढह गया और हमें लगातार दूसरी बार खिताब का मालिक बना गया. उस मौके को हम गर्व से याद करते हैं क्योंकि हम दुनिया की बेहतरीन टीम थे. हालांकि दिलचस्प यह भी है कि हम जश्न के दौरान भी अपने प्रदर्शन पर गौर कर रहे थे. ढिलाई संभव नहीं थी क्योंकि हममें से कुछ को कुछ ही दिनों बाद अपनी काउंटी टीमों के लिए संडे लीग खेलना था. हममें से कुछ सीधे अपनी कार में बैठे और अपने उसी गंतव्य की ओर चल पड़े! विश्व कप एक पखवाड़े में जीत लिया गया और खिलाड़ी अपनी काउंटी ड्यूटी के बारे में सोचने लगे. वे दिन शर्तिया तौर पर इतने गहमागहमी भरे नहीं थे! मैं उन तीन फाइनलों को बड़े गर्व से याद करता हूं क्योंकि हमें तीनों में जीत के लिए पसंदीदा टीम माना जा रहा था. 1983 का फाइनल हमारे खाते में नहीं आया लेकिन यही तो खेल की खूबसूरती है—विरोधी टीम अगर अच्छा खेले तो कोई खिताब जीतने पर आश्वस्त नहीं हो सकता.
(लेखक ने 1979 के फाइनल में शतक जड़ा था और मैन ऑफ द मैच थे. वे 1975 की खिताब जीतने वाली टीम में भी थे)