Maha Shivratri 2026: इस बार महाशिवरात्रि का व्र 15 फरवरी को रखा जाएगा. महाशिवरात्रि का पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन की पावन याद में मनाया जाता है. इस दिन भक्त व्रत रखते हैं, शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र अर्पित करते हैं और रातभर जागरण कर भोलेनाथ का स्मरण करते हैं. मंदिरों में विशेष रौनक रहती है और श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगती हैं. लेकिन इस पावन अवसर पर एक सवाल यह भी उठता है क्या केवल पूजन सामग्री अर्पित करना ही सच्ची शिवभक्ति है, या फिर शिव के प्रिय तत्वों की रक्षा और प्रकृति का संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है? आइए ज्योतिषाचार्य से जानते हैं.
प्रकृति को नष्ट करने से नहीं, संजोने से प्रसन्न होगी शिवशक्ति
ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक, बेलपत्र, धतूरा और आक (अकौआ) के पुष्प केवल अर्पित करने भर से भोले बाबा प्रसन्न नहीं होते है. इन पौधों को लगाकर और प्रकृति के संरक्षण में सहयोग करके ही शिवशक्ति वास्तव में प्रसन्न होती है. आज के समय में लोग पौधे लगाने के बजाय उन्हें तोड़कर ईश्वर को अर्पित करने में अधिक रुचि दिखाते हैं. यही कारण है कि कभी जंगली समझे जाने वाले आक और धतूरा के पौधे भी अब शहरों ही नहीं बल्कि गांवों में भी आसानी से दिखाई नहीं देते हैं.
महाशिवरात्रि और सावन के सोमवार पर लोग बेलपत्र की पूरी डालियां तक तोड़ लेते हैं. मंदिरों के बाहर कुछ पत्तियों, धतूरा और आक के फूलों की कीमतें आसमान छूने लगती हैं. यदि पुरुष और प्रकृति के स्वरूप शिवशक्ति को प्रसन्न करना है, तो उनके प्रिय पौधों को केवल तोड़कर अर्पित करने के बजाय उन्हें लगाकर प्रकृति को हरा-भरा बनाए रखने का संकल्प लेना चाहिए. शिवशक्ति की आराधना में सबसे महत्वपूर्ण मन का भाव है. यदि संपूर्ण पूजन सामग्री हो लेकिन मन में श्रद्धा न हो, तो सब व्यर्थ है. अगर सच्चा भाव हो तो बिना अधिक सामग्री के भी भोलेनाथ प्रसन्न हो जाते हैं.
शिवजी को क्यों अर्पित किए जाते हैं बेलपत्र?
बेलपत्र प्रकृति के तीन गुणों- रजस, सत्व और तमस, का प्रतीक माना जाता है. रजस सृष्टि के निर्माणकर्ता ब्रह्मा का प्रतीक है, सत्व सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु का और तमस संहार के देवता भगवान शिव का प्रतीक है. मान्यता है कि श्रीराम ने भी रावण का वध करने से पहले भगवान शिव की आराधना की थी. व्यक्ति के स्वभाव और शरीर में इन तीनों गुणों का संतुलन बना रहे, इसी भावना से शिवजी को बेलपत्र अर्पित किया जाता है.
धतूरा उस विष का प्रतीक है जिसे ग्रहण कर भोलेनाथ नीलकंठ बने. यह त्याग और संरक्षण का संदेश देता है. शिव बनने का अर्थ है प्रकृति और सृष्टि की रक्षा के लिए कठिनाइयों को स्वीकार करना. इसलिए जो भी शिवभक्त हैं, उन्हें प्रकृति के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए. तभी शिवशक्ति की सच्ची कृपा प्राप्त होती है.
किस मंदिर में करें महाशिवरात्रि की पूजा?
अक्सर देखा जाता है कि किसी विशेष पर्व पर लोग अपने आसपास के मंदिरों को छोड़कर बड़े या प्रसिद्ध मंदिरों में पूजा करने जाते हैं. परिणामस्वरूप, एक-दो प्रमुख मंदिरों में इतनी भीड़ हो जाती है कि श्रद्धालुओं को खड़े होने तक की जगह नहीं मिलती है. कई बार दूर से ही दूध और जल फेंककर चढ़ाया जाता है, जो न तो उचित विधि है और न ही श्रद्धा की सही अभिव्यक्ति. इसके बजाय अपने क्षेत्र के मंदिर में शांत और श्रद्धापूर्वक पूजा करना अधिक श्रेष्ठ है. इससे स्थानीय मंदिरों में भी रौनक बनी रहती है और आप भी एकाग्रता और शांति से शिवपूजन कर सकते हैं.