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केदारनाथ के दर्शन से पूरी होती है बद्रीनाथ यात्रा

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक बाबा केदारनाथ के दर्शन की राह आसान नहीं, लेकिन बाबा की एक झलक भी इतनी पुण्यदायी होती है कि भक्त बस खिंचे चले आते हैं. कहते हैं कि केदारनाथ के दर्शन के बिना बद्रीनाथ के दर्शन का फल नहीं मिलता है.

केदारनाथ केदारनाथ
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द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक बाबा केदारनाथ के दर्शन की राह आसान नहीं, लेकिन बाबा की एक झलक भी इतनी पुण्यदायी होती है कि भक्त बस खिंचे चले आते हैं. कहते हैं कि केदारनाथ के दर्शन के बिना बद्रीनाथ के दर्शन का फल नहीं मिलता है.

बर्फ से ढकी चोटियों के बीच भगवान केदारनाथ दर्शन देते हैं. उत्तराखंड के चार धामों में से एक भगवान केदारनाथ, जिनके दर्शन के लिए भक्त पूरे छह महीने पलकें बिछाए इंतजार करते हैं. उत्तराखंड में हिमालय पर्वत की गोद में भगवान केदारनाथ विराजते हैं. केदारनाथ के कपाट सिर्फ छह महीने दर्शन के लिए खुलते हैं, सर्दियों में कपाट श्रद्धालुओं के लिए बंद कर दिए जाते हैं. इस दौरान भगवान ऊखीमठ में विराजते हैं. गर्मियों के आते ही भगवान को पूरे विधि-विधान और धूम-धाम से केदारनाथ लाया जाता है और फिर पूरे भक्तिभाव से उनकी आराधना की जाती है.

केदारनाथ भगवान का घी और मक्खन से लेप किया जाता है, ताकि उनके घाव को आराम मिले. कहते हैं भगवान केदारनाथ पांडवों को भगवान दर्शन नहीं देना चाहते थे और जब पांडवों ने उनके जबरदस्ती दर्शन करने चाहे तो भगवान की पीठ मे घाव हो गए. यही वजह है कि आज भी केदारनाथ में भगवान का घी औऱ मक्खन से पूजन किया जाता है, लेकिन केदारनाथ के दर्शन का सीधा योग बदरीनाथ से जुड़ा हुआ है. मान्‍यता है कि बद्रीनाथ के दर्शन का पुण्य तब तक नहीं मिलता, जब तक भक्त केदारनाथ के दर्शन नहीं कर लेते. केदारनाथ सहित नर-नारायण-मूर्ति के दर्शन से सभी तरह के पाप नष्ट हो जाते हैं.

कपाट खुलने से पहले भगवान भैरवनाथ की पूजा की जाती है और फिर भगवान के द्वार खोले जाते हैं. उसके बाद भुकुंड भैरव की पूजा होती है, जिन्हें क्षेत्रपाल माना जाता है, लेकिन सर्दियों में उनका कपाट बंद हो जाता है. इसके पीछे यह मान्यता काम करती है कि छह महीने तक नारद मुनि भगवान की अकेले में आराधना करते हैं. केदारनाथ भगवान के दर्शन के लिए रुद्रप्रयाग से गुप्तकाशी होकर, 20 किमी. आगे गौरीकुंड तक, मोटरमार्ग से जाना होगा, लेकिन उसके बाद 14 किमी. की यात्रा पैदल मार्ग से करनी पड़ेगी.
भगवान केदारनाथ की पूरी कहानी

भगवान केदारनाथ साढ़े ग्यारह हजार फीट की ऊंचाई पर विराजते हैं. कहते हैं पांडवों से छिपने के लिए बाबा यहां आए थे, और यहीं पांडवों को कुलहत्या के पाप से मुक्ति मिली थी. केदारनाथ, शिव भक्तों की वो मंजिल है जिसके बिना जीवन नहीं संवरता, जिनके दर्शन के लिए भक्तों का मन तरसता है, जिनका आशीर्वाद पाने की राह में न तो हिमालय की दुर्गम चोटियां रोड़ा बन पाती हैं और न ही पथरीले रास्ते मुश्किलें पैदा कर पाते हैं.

पंचकेदारों में प्रमुख केदारनाथ मंदिर में भगवान शिव के धड़ रुप के दर्शन होते हैं. कहते हैं द्वापर युग में पांडवों से बचने के लिए जब महादेव ने भैंसे का रूप धारण किया तो उनका धड़ यहीं गिरा था. यह कहानी द्वापर युग से जुड़ी है, यह कहानी पांडवों से जुड़ी है. कहते हैं महाभारत युद्ध जीतने के बाद पांडवों कुलहत्या का पाप धोना चाहते थे और इसके लिए वो भगवान शिव के दर्शन करना चाहते थे, लेकिन औघड़दानी तो पांडवों से नाराज थे और इसीलिए वो दर्शन देकर उन्हें पाप मुक्त नहीं करना चाहते थे. तब शिव भैंसा रूप धारण कर केदार में छिप गए.

पांडव भी जिद के पक्के थे, उन्होंने भैंसारूपी महादेव को पहचान लिया. कहते हैं भीम ने शिव को पकड़ भी लिया, लेकिन इसी बीच गुत्थमगुत्था में भगवान शिव अंतर्ध्यान हो गए थे पर पांडवों की भक्ति और इच्छशक्ति ने उनके ह्रदय को पिघला दिया और उन्होंने धड़ रुप में प्रकट होकर पांडवों को दर्शन दिए. भगवान के दर्शन पाकर पांडव पाप मुक्त हो गए. उसी समय से केदारनाथ में भगवान शिव पीठ की आकृति-पिंड के रूप में पूजे जाने लगे.

भगवान केदारनाथ का सिर नेपाल में और उनकी भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मदमदेश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुई. इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदार कहा जाता है, जिनकी आराधना समस्त पाप-कष्ट से मुक्ति देती है. भगवान केदारनाथ के कपाट साल में 6 महीने आम भक्तों के लिए खुलते हैं और जो भी भक्त इस दौरान भगवान के दर्शन कर लेता है उसे कई जन्मों का पुण्य मिल जाता है.

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