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Premanand Maharaj: वर्ल्ड कप चैंपियन दीप्ति शर्मा को प्रेमानंद महाराज ने दी ये अनमोल सीख, हुई खास बातचीत

Premanand Maharaj: भारतीय क्रिकेटर दीप्ति शर्मा ने 2025 विश्वकप जीत के बाद प्रेमानंद महाराज के आश्रम जाकर उनका आशीर्वाद लिया. दीप्ति शर्मा और महाराज के बीच हुई खास बातचीत में अभ्यास और समर्पण की अहमियत पर भी चर्चा हुई.

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विश्वकप विजेता दीप्ति शर्मा प्रेमानंद महाराज से मिलने पहुंचीं (Photo: Instagram/@Bhajanmargofficial)
विश्वकप विजेता दीप्ति शर्मा प्रेमानंद महाराज से मिलने पहुंचीं (Photo: Instagram/@Bhajanmargofficial)

Premanand Maharaj: साल 2025 में भारतीय महिलाओं ने साउथ अफ्रीका को हराकर क्रिकेट विश्वकप अपने नाम किया था. उसी का आशीर्वाद लेने वर्ल्ड कप चैंपियन दीप्ति शर्मा शुक्रवार को प्रेमानंद महाराज के आश्रम पहुंचीं.  इस दौरान क्रिकेटर दीप्ति शर्मा ने प्रेमानंद महाराज के दर्शन कर, उनका आशीर्वाद लिया. इसके बाद महाराज जी और क्रिकेटर दीप्ति शर्मा के बीच खास बातचीत भी हुई. 

खेल जीतने से पूरा राष्ट्र जीतता है

महाराज जी के शिष्य नवल नागरी ने दीप्ति शर्मा का परिचय देते हुए भारत की विश्व चैंपियनशिप जीत का उल्लेख किया, तो महाराज जी ने खुशी जताई और इसे पूरे देश के लिए गर्व का अवसर बताया. प्रेमानंद महाराज ने कहा कि, 'कहने को तो एकमात्र खेल है लेकिन इससे पूरे अपने भारत को सुख मिलता है. जैसे जब भारतीय खिलाड़ी कोई मैच जीतते हैं, तो जीत सिर्फ उनकी नहीं होती, बल्कि हम सभी भारतवासी ऐसा महसूस करते हैं कि हम जीत गए. जब भारत जीतता है, तो पूरा देश, पूरा नगर और हर व्यक्ति प्रसन्न हो जाता है. लोगों के चेहरों पर खुशी लाना भी एक बहुत बड़ा परोपकार है. इसलिए हमें हमेशा अच्छा अभ्यास करना चाहिए, पूरी मेहनत से प्रयास करना चाहिए और विजय प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए.

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हमेशा करें अभ्यास

आगे प्रेमानंद महाराज ने कहा कि, 'भगवान का चिंतन करना चाहिए और निरंतर अभ्यास करना चाहिए. क्योंकि अभ्यास से ही सफलता मिलती है. यदि हम रोज अभ्यास करें, तो एक दिन अवश्य प्रवीण खिलाड़ी बन सकते हैं. अक्सर देखा जाता है कि जब कोई खिलाड़ी जीत हासिल कर लेता है, तो वह अभ्यास में ढील दे देता है और मनोरंजन में उलझ जाता है, जिससे आगे उसकी उन्नति रुक जाती है. इसलिए जीत मिलने के बाद और भी अधिक सावधान रहना चाहिए, नियमित अभ्यास करते रहना चाहिए और अपनी प्रवीणता को निरंतर बढ़ाना चाहिए. इसी तरह हम आगे बढ़ते चले जाते हैं. 

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