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Premananad Maharaj: नीम करोली बाबा से कैसे कहें अपने मन की बात? प्रेमानंद महाराज ने दिया इसका ये सरल उत्तर

Premananad Maharaj And Neem Karoli Baba: प्रेमानंद महाराज ने नीम करोली बाबा की शिक्षाओं को जीवंत करते हुए बताया कि गुरु का स्थान हमारे हृदय में होना चाहिए. यदि गुरुदेव प्रगट न हों तो हमें उनका स्मरण कर नामजप करना चाहिए.

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प्रेमानंद महाराज और नीम करोली बाबा (Photo: ITG)
प्रेमानंद महाराज और नीम करोली बाबा (Photo: ITG)

Premananad Maharaj And Neem Karoli Baba: प्रेमानंद महाराज आज अध्यात्म की दुनिया बहुत ही तेजी से प्रसिद्ध हो रहे हैं. हर दिन उनका कोई न कोई वीडियो सोशल मीडिया वायरल होता नजर आता है. नीम करोली बाबा भी ऐसे ही महान संत रहे हैं, जिनके भारत में ही नहीं बल्कि दुनियाभर में लाखों अनुयायी हैं. 

नीम करोली बाबा ने लोगों को धर्म, जाति और वर्ग से ऊपर उठकर प्रेम और सेवा का संदेश दिया था. उनके अनुसार ईश्वर की सच्ची उपासना दूसरों की सेवा में हैं. वे हमेशा कहते थे कि 'सब में ईश्वर हैं' और 'प्रेम ही सबसे बड़ा धर्म है'. उनका आश्रम मुख्य रूप से उत्तराखंड के कैंची धाम में स्थित है जहां लाखों भक्त हर दिन उनके दर्शन करने पहुंचते हैं.

हाल ही में प्रेमानंद महाराज के दरबार में एक महिला भक्त अपनी नीम करोली बाबा से संबंधित इच्छा लेकर पहुंची. उस महिला ने महाराज जी से कहा कि 'हम नीम करोली बाबा के भक्त हैं और हमने महाराज जी के साक्षात दर्शन नहीं किए. कभी-कभी हृदय में ये विचार आता है की गुरु के सामने हम अपने मन की बात कह सके. तो ये कैसे संभव हो पाएगा?'

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प्रेमानंद महाराज ने दिया ये सरल उत्तर

प्रेमानंद महाराज ने उस महिला के प्रश्न का जवाब देते हुए कहा कि, 'क्यों नहीं संभव हो पाएगा? हमारा हृदय ही तो गुरुदेव है, जो हमारे हृदय में बात है उसे गुरु तक पहुंचाने में क्या दिक्कत है. जैसे हम अपनी मां से कोई बात छुपा नहीं सकते हैं. उसी तरह हमारे गुरुदेव होते हैं, अगर हमसे कोई गलती भी हो जाए तो भी हमारे गुरुदेव हमारा मंगल विधान ही करेंगे. भले ही वो डांट दे, उनका डांट भी दुलार हैं. 

गुरुदेव हैं हमारे वैद्य

आगे वह महिला प्रेमानंद महाराज से सवाल करती हैं कि अगर प्रगट में गुरुदेव विराजमान न हो और फिर हम बात करना चाहे तो क्या करें. इसका उत्तर देते हुए महाराज जी कहते हैं कि 'हमें लगता है कि हमें प्रगट गुरुदेव की आवश्यकता है. गुरुदेव वैद्य हैं और हम उनके मरीज. ऐसे में कभी हमें डांट की जरूरत होती है, कभी स्नेह और कभी मार्गदर्शन की. जो महापुरुष अव्यक्त हो चुके हैं, वे तो डांटने या समझाने स्वयं नहीं आएंगे. इसलिए, हमें अपने गुरुदेव का स्मरण करके या उन्हें याद करके सिर्फ नामजप करना चाहिए.'

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