Premanand Maharaj: आज की चमक-दमक भरी पार्टियों में सब कुछ है, लेकिन पवित्रता कहीं खोती जा रही है. शराब के गिलास और भोजन की थाली के बीच न आचरण की शुद्धता बची है, न विचारों की. कभी भोजन भी एक संस्कार था, आज वह केवल औपचारिकता बनकर रह गया है. इसी से जुड़ा सवाल एक भक्त ने वृंदावन-मथुरा के जाने माने प्रेमानंद महाराज से पूछा. उसका प्रश्न था कि हमें शादियों और पार्टियों में किस तरह से भोजन करना चाहिए और क्या हमें उसमें शुद्धता का ध्यान रखना चाहिए?
पवित्रता हो गई है समाप्त
जिसको लेकर प्रेमानंद महाराज ने बड़ा ही सरल उत्तर देते हुए कहा कि, 'आज की पार्टियों में देखें तो लोग शराब पीकर उसी हाथ से भोजन कर लेते हैं, उसी चम्मच से खाते हैं और फिर दूसरों से हाथ मिलाते हैं. सब कुछ जैसे अपवित्र होता जा रहा है. यही तो कलियुग का प्रभाव है, जहां न बुद्धि की शुद्धता बची है, न आचरण की पवित्रता. पहले भोजन कितनी पवित्रता के साथ किया जाता था. स्वच्छ स्थान पर भोजन परोसा जाता था, हाथ-पैर धुलवाए जाते थे, तिलक लगाकर बैठाया जाता था. आज अगर कोई ऐसा करे तो लोग उसका उपहास करते हैं, उसे पिछड़ा या गरीब समझ लेते हैं. जबकि पहले पवित्रता को ही श्रेष्ठता माना जाता था.
पुरानी परंपराएं थी बहुत अच्छी
आगे प्रेमानंद महाराज जवाब देते हुए कहते हैं कि, 'गांवों में उत्सव हो, विवाह हो या कोई भी मांगलिक कार्य, सबसे पहले अतिथियों के पैर धुलवाए जाते थे. पवित्र आसन पर बैठाकर, पवित्र पत्तल में भोजन परोसा जाता था. माताएं मंगल गीत गाती थीं और पंगत में बैठकर श्रद्धा से भोजन कराया जाता था. आज स्थिति बिल्कुल बदल गई है. भोजन की पद्धति, सोच और संस्कार, सब कुछ बदलता जा रहा है. समय के साथ हमारी अधार्मिक प्रवृत्तियां बढ़ती जा रही हैं और पवित्रता धीरे-धीरे जीवन से दूर होती जा रही है.'