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Holi 2026: रंग, शरारत और मिठास... लड्डू से लट्ठ तक, ब्रज में दिखते हैं होली के निराले रंग

होली का त्योहार आने वाला है. बड़े शहरों में रहने वाले ज्यादातर लोग सिर्फ रंग वाली होली के बारे में ही जानते हैं. लेकिन शायद आपको मालूम नहीं कि ब्रजभूमि में और भी कई तरह की होली खेली जाती है. आइए आज आपको मथुरा-वृंदावन-गोकुल में खेली जाने वाली अनोखी होली के बारे में बताते हैं.

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दुनियाभर में प्रसिद्ध है ब्रज की लड्डू मार और लट्ठमार होली. (Photo: ITG)
दुनियाभर में प्रसिद्ध है ब्रज की लड्डू मार और लट्ठमार होली. (Photo: ITG)

Holi 2026: भारत में होली सिर्फ एक त्योहार नहीं है, बल्कि लोक पंरपरा, आस्था और संस्कृति के अनगिनत रंगों से सजा उत्सव है. बड़े शहरों में लोग सिर्फ 2-3 घंटे की रंग वाली होली से ही परिचित हैं. लेकिन ब्रजभूमि पर इसके कई अलग रूप-रंग दिखाई देते हैं. कहीं लड्डूमार होली खेली जाती है. तो कहीं लट्ठमार का हास्य रंग दिखाई देता है. इस तरह होली का त्योहार कई दिनों तक चलता है. आइए आज आपको ब्रज में खेली जाने वाली सभी होली के बारे में बताते हैं.

लड्डू होली- श्रीजी मंदिर, बरसाना
बरसाना की लड्डू होली से ब्रज की होली का आगाज होता है. यह होली बरसाना स्थित श्रीजी मंदिर के परिसर में खेली जाती है. इस दिन मंदिर के पुजारी और सेवायत भक्तों पर लड्डू बरसाते हैं. श्रद्धालु लड्डू को प्रसाद मानकर ग्रहण करते हैं और इसे सौभाग्य का प्रतीक समझते हैं. इस दिन पूरा बरसाना भक्ति रस से सराबोर रहता है. मान्यता है कि होली की ये अनोखी परंपरा यहां भगवान कृष्ण के बरसाना आगमन से शुरू हुई थी.

लट्ठमार होली- बरसाना
बरसाना में खेली जाने वाली लट्ठमार होली पूरी दुनिया में लोकप्रिय है. इस होली को देखने देश-विदेश से लोग बरसाना आते हैं. इस दिन महिलाएं पुरुषों पर आक्रामक रूप से लाठियां चलाती हैं. हालांकि इसमें भक्ति, आनंद और प्रेम का भाव रहता है. मान्यता है कि भगवान कृष्ण नंदगांव से बरसाना आकर राधा और उनकी सखियों को चिढ़ाते थे. फिर उन्हें सखियों का आक्रामक रुख भी देखना पड़ता था.

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लट्ठमार होली- नंदगांव
लट्ठमार होली का दायरा बरसाना तक सीमित नहीं है. बरसाना के बाद अगले दिन नंदगांव में भी लट्ठमार होली खेली जाती है. इसे लट्ठमार होली का दूसरा चरण माना जाता है. इस दिन लोग प्रेम से महिलाओं को रंग-गुलाल लगाकर छेड़ते हैं. फिर महिलाएं भी प्रतीकात्मक रूप से लाठियां चलाकर इस माहौल को आनंदमयी बनाती हैं. यह आयोजन कृष्ण की बाल लीलाओं और ब्रज के आपसी प्रेम को दर्शाता है.

फूल वाली होली- बांके बिहारी मंदिर, वृंदावन
वृंदावन का बांके-बिहारी मंदिर दुनियाभर में प्रसिद्ध है. इसी मंदिर में फूल वाली होली खेलने की परंपरा है. मंदिर के परिसर और आस-पास रंगो की जगह फूलों की वर्षा होती है. इसके पीछे मान्यता है कि यहां भगवान कृष्ण ने राधा और उनकी सखियों के साथ फूलों से होली खेली थी. इस दिन मंदिर के पुजारी भक्तों पर फूल बरसाते हैं. इस दिन वृंदालन की गलियों में भजन-कीर्तन से पूरा वातावरण भक्तिमय रहता है.

होली समारोह- कृष्ण जन्मभूमि, मथुरा
मथुरा स्थित कृष्ण जन्मभूमि में होली का उत्सव बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है. इस दिन झांकियों के जरिए श्रीकृष्ण लीलाएं दिखाई जाती हैं. भजन, नृत्य और जयकारों से लोगों में उत्साह बना रहता है. चारों तरफ रंग-गुलाल उड़ते हैं.

छड़ीमार होली- गोकुल
गोकुल की गलियों में खेली जाने वाली छड़ीमार होली भी बहुत लोकप्रिय है. इस दिन महिलाएं प्रतीकात्मक रूप से पुरुषों को छड़ियों से मारती हैं. इसके पीछे स्नेह-प्रेम का भाव रहता है. यह होली भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ी है. कान्हा जब शरारत करते थे, तब गोपियां छड़ी दिखाकर उन्हें डांटती थीं.

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रमणरेती की होली- गोकुल
गोकुल के रमणरेती क्षेत्र में भी एक बड़ी ही दिलचस्प किस्म की होली मनाई जाती है. मान्यता है कि भगवान कृष्ण इसी जगह पर अपने सखाओं के साथ खेला-कूदा करते थे. इसलिए भक्त यहां रेत में बैठकर भजन-कीर्तन करते हैं और रंग-गुलाल उड़ाते हैं. यह आयोजन भक्ति और सादगी का प्रतीक है.

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