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Garud Puran: पिता के जीवित रहते पुत्र को नहीं करने चाहिए ये 5 काम, जानें क्या कहता है गरुड़ पुराण

Garud Puran: गरुड़ पुराण में पिता के सम्मान और पारिवारिक मर्यादा को लेकर विशेष नियम बताए गए हैं. जानें पिता के जीवित रहते पुत्र को कौन-से 5 काम नहीं करने चाहिए और इसके पीछे क्या धार्मिक व सामाजिक कारण बताए गए हैं.

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गरुड़ पुराण के अनुसार, पिता के जीवित रहते पुत्र को नहीं करने चाहिए ये काम (Photo: Pixabay)
गरुड़ पुराण के अनुसार, पिता के जीवित रहते पुत्र को नहीं करने चाहिए ये काम (Photo: Pixabay)

Garud Puran: हिंदू परंपरा में पिता को परिवार का आधार माना गया है. गरुड़ पुराण में यह बात बार-बार कही गई है कि जब तक पिता जीवित हों, तब तक पुत्र को कुछ मर्यादाओं का पालन करना चाहिए. ये नियम केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं हैं, बल्कि घर में अनुशासन, सम्मान और संतुलन बनाए रखने से भी जुड़े हैं. मनुस्मृति और गरुड़ पुराण जैसे ग्रंथों में ऐसे कई संकेत मिलते हैं, जिनका उद्देश्य परिवार में पदक्रम और आदर की भावना को बनाए रखना है. आइए सरल शब्दों में समझते हैं कि पिता के रहते पुत्र को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए.

घर के मुखिया की भूमिका न निभाना

गरुड़ पुराण के मुताबिक, जब पिता जीवित हों, तो घर के प्रमुख निर्णय और धार्मिक अनुष्ठानों की अगुवाई वही करें, यही परंपरा मानी गई है. पुत्र को आगे बढ़कर नेतृत्व करने के बजाय सहयोगी की भूमिका निभानी चाहिए. इससे परिवार में अनुशासन बना रहता है.

पितृकर्म खुद न करना

पूर्वजों का तर्पण या पिंडदान करने का पहला अधिकार पिता का माना गया है. ऐसे में पुत्र को स्वयं यह कर्म नहीं करना चाहिए. यह परंपरा पीढ़ियों के क्रम को सम्मान देने के लिए बनाई गई है.

दान में पिता का नाम प्राथमिक रखना

यदि पुत्र कोई दान-पुण्य करें, तो परंपरा के अनुसार पिता का नाम आगे रखना शुभ माना गया है. इससे परिवार की प्रतिष्ठा और बड़ों का मान बना रहता है.

सामाजिक आयोजनों में नाम का क्रम

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किसी कार्यक्रम, निमंत्रण पत्र या सार्वजनिक मंच पर पिता का नाम पहले और पुत्र का बाद में लिखा जाना शिष्टाचार माना गया है. यह छोटी बात लग सकती है, लेकिन परंपरा में इसका खास महत्व है.

कुछ पारंपरिक प्रतीकों का ध्यान

पुराने समय में मूंछ को सम्मान और वंश की गरिमा से जोड़ा जाता था. मान्यता थी कि पिता के रहते पुत्र को इसे नहीं कटवाना चाहिए. हालांकि आज समय बदल चुका है, फिर भी इसका भाव यही था कि पिता का स्थान सर्वोपरि है.

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