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Chandra Grahan 2022: क्यों राहु-केतु के कारण लगता है चंद्र ग्रहण? पढ़ें ये रहस्यमयी कहानी

साल का अंतिम चंद्र ग्रहण मेष राशि और भरणी नक्षत्र में लगा है. ये चंद्र ग्रहण अरुणाचल प्रदेश, कोलकाता और पटना जैसे शहरों में दिखना शुरू हो गया है. इसका समापन शाम 06 बजकर 20 मिनट पर होगा. ज्योतिषियों का दावा है कि जब भी राहु या केतु सूर्य, चंद्रमा को ग्रसित करते हैं, तब ग्रहण लगता है.

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क्यों लगता है चंद्र ग्रहण? जानें ग्रहण से राहु-केतु का क्या है कनेक्शन
क्यों लगता है चंद्र ग्रहण? जानें ग्रहण से राहु-केतु का क्या है कनेक्शन

Chandra Grahan 2022 Date and Timing: साल का आखिरी चंद्र ग्रहण लग चुका है. ये चंद्र ग्रहण मेष राशि और भरणी नक्षत्र में लगा है और अरुणाचल प्रदेश, कोलकाता और पटना जैसे शहरों में दिखना शुरू हो गया है. इसका समापन शाम 06 बजकर 20 मिनट पर होगा. ज्योतिषियों का दावा है कि जब भी राहु या केतु सूर्य, चंद्रमा को ग्रसित करते हैं, तब ग्रहण लगता है. आइए आज आपको ग्रहण लगने का पूरा इतिहास बताते हैं.

क्यों लगता है चंद्र ग्रहण? (Story Behind Chandra Grahan)
पौराणिक कथाओं में देवों और असुरों के बीच समुद्र मंथन का वर्णन मिलता है. समुद्र मंथन के दौरान 14 रत्न बाहर आए थे, जिनमें से एक अमृत कलश भी था. इस अमृत कलश को पाने के लिए देवताओं और असुरों में विवाद छिड़ गया. इस समस्या को सुलझाने के लिए मोहिनी एकादशी पर भगवान विष्णु ने मोहिनी का भेष धारण किया. मोहिनी रूप धारण करने के बाद भगवान विष्णु ने अमृत कलश को देवों और असुरों में समान रूप से बांटने पर विचार किया.

भगवान विष्णु के इस प्रस्ताव को असुरों ने भी स्वीकार किया. अमृत कलश को समान रूप से बांटने के लिए विष्णु जी ने देवों और असुरों को अलग-अलग पंक्तियों में बैठाया और अपना काम शुरू कर दिया. हालांकि इस बीच दैत्यों की पंक्ति में विराजमान स्वर्भानु नाम के एक राक्षस को लगा कि असुरों के साथ कुछ गलत हो रहा है. उसे आभास हो गया था कि मोहिनी का रूप धारण करके दानवों के साथ धोखा किया जा रहा है.

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वो चुपचाप दानवों की पंक्ति से निकलकर देवताओं की पंक्ति में सूर्य और चंद्रमा के बगल में आकर बैठ गया. जैसे ही स्वर्भानु के हाथ अमृत पान आया, सूर्य और चंद्र देव ने उसे पहचान लिया और इसकी सूचना विष्णु जी को दे दी. इस पर भगवान विष्णु क्रोधित हो उठे और उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से स्वर्भानु का गला काट दिया. हालांकि जब तक सुदर्शन चक्र स्वर्भानु की गर्दन काट पाता, उससे पहले ही अमृत उसके गले से नीचे उतर गया. इससे वो मृत्यु को तो प्राप्त नहीं हुआ, लेकिन उसका शरीर दो भागों में बंट गया.

राहु-केतु के दुश्मन है सूर्य-चंद्रमा (Rahu Ketu and Surya Chandrama)
सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, स्वर्भानु के सिर वाले हिस्से को राहु और धड़ वाले हिस्से को केतु कहा जाता हैं. हालांकि भगवान विष्णु ने बाद में स्वर्भानु के सिर को एक सर्प के शरीर से जोड़ दिया, जिसे राहु कहा जाता है और उसके धड़ को सर्प के मुख से जोड़ दिया, जिसे केतु कहा जाता है.

कथा के अनुसार, चूंकि सूर्य और चंद्रमा ने स्वर्भानु की सच्चाई भगवान विष्णु को बताई थी, इसलिए उसके शरीर के दोनों हिस्से राहु और केतु सूर्य-चंद्रमा के दुश्मन बन गए. यही कारण है कि पूर्णिमा के दिन राहु और केतु चंद्रमा को ग्रस यानी निगल लेते हैं और तभी चंद्र ग्रहण लगता है.

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