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Basant Panchami 2026: थोड़ी देर में खत्म होने वाला है बसंत पंचमी का मुहूर्त, इस विधि से करें सरस्वती पूजन

Basant Panchami 2026 Date: आज बसंत पंचमी है. इस बार बसंत पंचमी पर सरस्वती पूजा का शुभ मुहूर्त प्रातः 07.15 बजे से लेकर दोपहर 12.50 बजे तक बताया गया है. ज्योतिषविदों का कहना है कि इसी अवधि में सरस्वती पूजन सबसे अधिक फलदायी होगा.

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इस बार बसंत पंचमी पर सरस्वती पूजा का सबसे उत्तम मुहूर्त प्रातः 7 बजकर 15 मिनट से दोपहर 12 बजकर 50 मिनट तक रहेगा. (Photo: ITG)
इस बार बसंत पंचमी पर सरस्वती पूजा का सबसे उत्तम मुहूर्त प्रातः 7 बजकर 15 मिनट से दोपहर 12 बजकर 50 मिनट तक रहेगा. (Photo: ITG)

Basant Panchami 2026 Date: आज बसंत पंचमी है. मां सरस्वती को समर्पित यह पर्व साल के सबसे अबूझ मुहूर्तों में भी गिना जाता है. इसलिए इस दिन लोग शादी-विवाह जैसे मांगलिक कार्य करना शुभ मानते हैं. इस दिन विवाह, गृह प्रवेश, नया कार्य आरंभ करने जैसे मांगलिक कार्य बिना विशेष मुहूर्त देखे भी किए जा सकते हैं. बसंत पचंमी पर सरस्वती पूजन शुभ मुहूर्त में करना बहुत फलदायी माना जाता है. सरस्वती पूजा का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त समाप्त होने में अब सिर्फ थोड़ा ही समय बाकी रह गया है.

बसंत पंचमी 2026 का शुभ पूजा मुहूर्त
इस बार बसंत पंचमी पर सरस्वती पूजा का सबसे उत्तम मुहूर्त प्रातः 7 बजकर 15 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 50 मिनट तक बताया गया है. अगर आप इस अबूझ घड़ी में मां सरस्वती की पूजा करना चाहते हैं तो दोपहर को 12.50 बजे से पहले पूजा-पाठ कर लीजिए.

बसंत पंचमी की पूजा विधि
बसंत पंचमी के दिन पीले, बसंती या सफेद रंग के वस्त्र पहनकर मां सरस्वती की पूजा करनी चाहिए. लाल और काले रंग के कपड़ों से परहेज करें. मां सरस्वती की पूजा पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके करना श्रेष्ठ माना गया है. शुभ मुहूर्त में देवी की पूजा करें तो अच्छा होगा. अन्यथा आप सूर्योदय के बाद ढाई घंटे और सूर्यास्त के बाद ढाई घंटे में किसी भी समय देवी की पूजा कर सकते हैं.

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पूजा के लिए मां सरस्वती को सफेद चंदन, पीले या सफेद पुष्प अर्पित करें. भोग में मिश्री, दही या केसर युक्त खीर चढ़ाएं. इसके बाद “ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः” मंत्र का जप करें. श्रद्धा से की गई पूजा से देवी की कृपा सदैव बनी रहती है.

बसंत पंचमी की कथा

बसंत पंचमी का पर्व ज्ञान, कला और विद्या की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है. मान्यता है कि इसी शुभ तिथि पर देवी सरस्वती धरती पर प्रकट हुई थीं. एक पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु की प्रेरणा से ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की. जब ब्रह्माजी सृष्टि का निरीक्षण करने निकले, तो उन्हें चारों ओर नीरवता ही दिखाई दी. संपूर्ण संसार मौन था और कहीं भी जीवन का उत्साह नजर नहीं आ रहा था. यह देखकर ब्रह्माजी अपने सृजन से संतुष्ट नहीं हुए.

ब्रह्माजी को अनुभव हुआ कि सृष्टि में अभी कोई महत्वपूर्ण तत्व की कमी है, जिसके कारण सब कुछ शांत और निस्तब्ध बना हुआ है. तब उन्होंने श्रीहरि विष्णु से अनुमति प्राप्त कर अपने कमंडल से जल की कुछ बूंदें पृथ्वी पर छिड़कीं. जैसे ही वे जल कण धरती पर गिरे, वहां हलचल शुरू हो गई और उसी क्षण एक दिव्य शक्ति का अवतरण हुआ. यह दिव्य स्वरूप चार भुजाओं वाली एक अत्यंत सुंदर देवी का था. उनके एक हाथ में वीणा थी, दूसरा हाथ वरदान की मुद्रा में था, जबकि शेष दो हाथों में पुस्तक और जप माला सुशोभित थी.

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इसके बाद ब्रह्माजी ने देवी से वीणा का मधुर वादन करने का निवेदन किया. जैसे ही देवी ने वीणा के तार छेड़े, पूरे ब्रह्मांड में एक मनोहारी नाद गूंज उठा. उस दिव्य ध्वनि से सृष्टि में चेतना का संचार हुआ और सभी जीव-जंतुओं को वाणी प्राप्त हुई. तब ब्रह्माजी ने उन्हें वाणी और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी के रूप में “सरस्वती” नाम प्रदान किया. मां सरस्वती की आराधना से विद्या, बुद्धि, कला और विवेक का विकास होता है. चूंकि देवी का प्राकट्य बसंत पंचमी के दिन माना जाता है, इसलिए इस दिन को मां सरस्वती के जन्मोत्सव के रूप में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है.

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