Bakrid 2026: बकरीद (ईद-उल-अजहा) और हज के पाक मौके पर आब-ए-जमजम (जमजम के पवित्र पानी) का जिक्र हर जुबान पर होता है. मक्का जाने वाला हर जायरीन वहां से जमजम का पानी बड़ी अकीदत (श्रद्धा) के साथ अपने घर लेकर लौटता है. पूरी दुनिया के मुसलमान इस पानी को बेहद बरकत वाला मानते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि मक्का की उस तपती और बेजान घाटी के बीचों-बीच सदियों पहले यह पानी कैसे निकला था?
जब तपते रेगिस्तान में अकेले छूट गए मां-बेटा
सहीह अल-बुखारी (किताबुल अंबिया) के ऐतिहासिक संदर्भों के मुताबिक, हजारों साल पहले अल्लाह के हुक्म पर हजरत इब्राहिम अपनी पत्नी हजरत हाजरा और अपने छोटे से दुधमुंहे बेटे हजरत इस्माइल को मक्का की एक सुनसान घाटी में छोड़ आए थे. हजरत इब्राहिम ने यह फैसला किसी नाराजगी में नहीं, बल्कि अल्लाह की तरफ से मिले एक हुक्म के तहत लिया था.
उस दौर में मक्का आज जैसा आधुनिक शहर नहीं था. वहां दूर-दूर तक सिर्फ तपती रेत, पहाड़ और सन्नाटा था. हजरत इब्राहिम अपनी पत्नी को खाने के लिए कुछ खजूर और एक मश्कीजा (चमड़े का थैला) पानी देकर आगे बढ़ गए. कुछ ही दिनों में पानी की आखिरी बूंद और खजूर भी खत्म हो गए.
सफा-मरवा की दौड़
भीषण गर्मी और चिलचिलाती धूप के बीच छोटा सा बच्चा (हजरत इस्माइल) प्यास के मारे तड़पने लगा. बेटे को इस हाल में देख मां हजरत हाजरा का दिल बैठ गया. वह पानी की तलाश में पागलों की तरह पास की दो पहाड़ियों सफा और मरवा की तरफ दौड़ीं.
वह उम्मीद से एक पहाड़ी पर चढ़कर दूर तक देखतीं कि शायद कोई काफिला या पानी का कोई जरिया दिख जाए, फिर वहां कुछ न पाकर दौड़ते हुए दूसरी पहाड़ी पर जातीं. तड़पते बच्चे के लिए पानी की एक बूंद जुटाने की चाह में उन्होंने इन दोनों पहाड़ियों के बीच पूरे 7 चक्कर काटे.
बच्चे की एड़ी रगड़ने से फूटा चश्मा
जब हजरत हाजरा सातवीं बार दौड़कर थक-हारकर अपने बच्चे के पास वापस पहुंचीं, तो वहां का नजारा देखकर उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं. जब प्यास से बेहाल नन्हा बच्चा जमीन पर अपनी एड़ियां रगड़ रहा था. ठीक उसी वक्त अल्लाह के हुक्म से फरिश्ते हजरत जिब्राइल वहां अवतरित हुए और उन्होंने जमीन पर पैर मारा., ऐसा करते ही पानी का एक तेज चश्मा (सोता) फूट पड़ा. सूखे रेगिस्तान में पानी को इतनी तेजी से बहता देख मां हजरत हाजरा खुशी से रो पड़ीं. उन्होंने पानी को बहकर जाया होने से रोकने के लिए जल्दी-जल्दी रेत की एक मेड़ बनाई और पानी से कहा "जम जम" (यानी रुक जा, थम जा). बस, तभी से इस पवित्र कुएं का नाम जमजम पड़ गया.
हज का कनेक्शन
मां की इसी ममता, तड़प और कोशिश की याद में आज भी हज करने जाने वाले लाखों लोग सफा और मरवा पहाड़ियों के बीच 7 बार टहलते या दौड़ते हैं, जिसे हज की भाषा में सई की रस्म कहा जाता है. इसके बिना हज मुकम्मल नहीं माना जाता.
क्यों दी जाती है हजरत इस्माइल की याद में कुर्बानी?
जमजम का पानी निकलने के बाद वहां यमन का बनी जुरहुम कबीला आकर बस गया और मक्का एक शहर बन गया. इसी पानी को पीकर हजरत इस्माइल भी बड़े हुए. जब हजरत इस्माइल थोड़े बड़े हुए, तो अल्लाह ने पिता हजरत इब्राहिम की वफादारी और मोहब्बत का एक और कड़ा इम्तिहान लिया.
अल्लाह ने हजरत इब्राहिम को ख्वाब में अपनी सबसे प्यारी चीज कुर्बान करने का हुक्म दिया. हजरत इब्राहिम के लिए उनके बुढ़ापे का सहारा और इकलौते बेटे हजरत इस्माइल से प्यारा दुनिया में कुछ नहीं था. अल्लाह की रजा के लिए वे अपने कलेजे के टुकड़े की कुर्बानी देने को तैयार हो गए. बेटा भी अल्लाह की राह में कुर्बान होने को तैयार हो गया.
हजरत इब्राहिम ने जब अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर बेटे की गर्दन पर छुरी चलाई,लेकिन जब छूरी चलाने के बाद पट्टी खोली तो उन्होंने देखा कि हजरत इस्माइल सामने खड़े हैं उनकी जगह एक दुंबे (भेड़) कुर्बान हुआ है .