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बैसाखी के बीच पुरी में क्यों खास है ‘पहिला बैसाख’? जानिए जगन्नाथ मंदिर की अनोखी परंपरा

जगन्नाथ मंदिर में महाबिशुबा के दिन एक खास अनुष्ठान होता है, जिसे पना संक्रांति कहते हैं. ये अनुष्ठान असल में भगवान के 'महाभोग प्रसाद' से जुड़ा है. महाबिशुबा के दिन पना संक्रांति सांस्कृतिक व धार्मिक परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है.

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भगवान जगन्नाथ मेष संक्रांति के दिन ओडिया पंचांग से नए वर्ष की शुरुआत करते हैं
भगवान जगन्नाथ मेष संक्रांति के दिन ओडिया पंचांग से नए वर्ष की शुरुआत करते हैं

जब एक तरफ उत्तर भारत के पंजाब में बैसाखी की धूम रहती है, ठीक इसी समय में ओडिशा के पुरी में अलग ही रंगत छायी रहती है. बैसाख महीने के दौरान 14-15 अप्रैल की तारीख 'पहिला बैसाख' कहलाती है. इस दिन पुरी जगन्नाथ मंदिर में इसे ओडिया नव वर्ष के तौर पर मनाया जाता है. इसे महाविशुव संक्रांति या महाबिशुबा कहा जाता है. 

इस दौरान मंदिर में खास अनुष्ठान होते हैं. मंदिर में तीनों देवताओं को नया वस्त्र पहनाया जाता है. मंदिर की रसोई में विशेष भोग तैयार किया जाता है. माना जाता है कि इस दिन से भगवान जगन्नाथ की चंदन यात्रा का पहला चरण शुरू होता है, जो ज्येष्ठ पूर्णिमा तक चलती है.  
भगवान जगन्नाथ पढ़ते हैं नया पंचांग!
इस दिन जगन्नाथ जी को नया पंचांग दिया जाता है. जिसे ओडिया पंचांग कहते हैं. माना जाता है कि साल का पहला दिन होने के नाते भगवान जगन्नाथ खुद पंचांग पढ़ते हैं और साल भर की पंजिका तैयार करते हैं. इसलिए पंचांग को सबसे पहले भगवान जगन्नाथ के चरणों में समर्पित किया जाता है, जिसके बाद ही वर्ष के त्योहारों की गणना शुरू होती है.

नई फसल के भोग का महाप्रसाद
इस दिन महाप्रसाद के रूप में खास प्रकार के मीठे व्यंजन और पारंपरिक ओडिया व्यंजन तैयार किए जाते हैं. इसी दिन से भगवान की सेवा में चंदन लेपन और चंदन सुगंधि की शुरुआत की जाती है. जो उनकी चंदन यात्रा तक जारी रहती है. मंदिर के सेवायत नए पंचांग को पढ़ते हैं और आने वाले वर्ष के लिए आशीर्वाद मांगते हैं. इसलिए पहिला बैसाख, ओडिया संस्कृति में नए कृषि वर्ष की शुरुआत का प्रतीक भी माना जाता है. श्रद्धालु इस दिन जगन्नाथ जी का दर्शन कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं.

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Lord Jagnnath

जगन्नाथ मंदिर में इस दिन एक और खास अनुष्ठान होता है, जिसे पना संक्रांति कहते हैं. ये अनुष्ठान असल में भगवान के 'महाभोग प्रसाद' से जुड़ा है. महाबिशुबा के दिन पना संक्रांति सांस्कृतिक व धार्मिक परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है. यह पर्व नवजीवन, समृद्धि और नई शुरुआत का संदेश देता है.

जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है तब इस दिन से गर्मी के मौसम की शुरुआत हो जाती है. जिससे इस दिन का ज्योतिषीय महत्व भी बढ़ जाता है. 'पना' शब्द एक पारंपरिक पेय से लिया गया है, जो गुड़, पानी और फलों से बनाया जाता है. यह गर्मी के मौसम की शुरुआत और शरीर को ठंडा रखने की जरूरत का प्रतीक है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु ने अपने वराह अवतार में पृथ्वी को दैत्य हिरण्याक्ष से मुक्त कराया था. 

पना नाम का पेय पीते हैं जगन्नाथ महाप्रभु
इस दिन 'पना' नामक विशेष पेय बनाया जाता है. जिसमें पानी, गुड़, फल और कभी-कभी दूध या दही भी मिलाया जाता है. इसे देवताओं को अर्पित करने के बाद परिवार और पड़ोसियों में बांटा जाता है, जो शेयरिंग की हमारी मूल भावना का प्रतीक है.

मूल रूप से पना कच्चे आम से बनता है, लेकिन जगन्नाथ मंदिर में अलग-अलग फलों के पना भी बनाए जाते हैं. 'डंडा नाचा' इस पर्व का एक प्रमुख लोकनृत्य है. यह पुरुषों की ओर से किया जाने वाला लोकनृत्य है. ये लोग 'डंडुआ' कहलाते हैं. 

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वहीं, तटीय इलाकों में 'बोइता बंदाना' नाम की भी एक परंपरा निभाई जाती है. इसमें केले के तने या कॉर्क से बनी छोटी नावें नदी या तालाब में बहाई जाती है. यह ओडिशा की प्राचीन समुद्री परंपराओं को सम्मान देने का प्रतीक है.
 

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