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14 रुपये के इंजेक्शन ने बचाई नवजात की जान, जयपुर में डॉक्टरों ने किया चमत्कार

जयपुर में एक दुर्लभ बीमारी से जूझ रहे नवजात को डॉक्टरों ने मात्र 56 रुपये के इलाज से बचा लिया. परिवार पहले ही दो बच्चों को खो चुका था. बच्चे का एएनसी स्तर बेहद खतरनाक 82 था, जिसे 14 रुपये के इंजेक्शन से 6000 से ऊपर पहुंचा दिया गया. डॉ प्रियांशु माथुर के अनुसार, दुनिया में इसके केवल 60 मामले हैं. समय पर इलाज से बच्चे की जान बची.

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दुनियाभर में इस बीमारी के 60 मरीज हैं.
दुनियाभर में इस बीमारी के 60 मरीज हैं.

राजस्थान के जयपुर में एक ही परिवार के दो मासूम बच्चों को दुर्लभ बीमारी ने छीन लिया, लेकिन तीसरे बच्चे को महज 56 रुपए के इलाज ने मौत के मुंह से वापस खींच लिया. यह किसी चमत्कार से कम नहीं, जिसे जयपुर के जेके लोन अस्पताल के डॉक्टरों ने संभव कर दिखाया. यह कहानी न सिर्फ आधुनिक चिकित्सा की ताकत को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि सही समय पर सही इलाज मिले तो छोटी सी दवा भी बड़ा चमत्कार कर सकती है.

दरअसल, 10 मार्च को परिजन नवजात को अस्पताल लेकर पहुंचे, तब उसकी हालत बेहद गंभीर थी. जन्म के कुछ ही दिनों बाद बच्चे को गंभीर संक्रमण ने जकड़ लिया था. परिवार पहले उसे एक निजी अस्पताल लेकर गया, लेकिन वहां हालत में कोई सुधार नहीं हुआ. आखिरकार उम्मीद की आखिरी किरण के तौर पर उसे जेके लोन अस्पताल लाया गया. जांच में सामने आया कि बच्चे का एब्सोल्यूट न्यूट्रोफिल काउंट (ANC) मात्र 82 रह गया था, जो बेहद खतरनाक स्थिति मानी जाती है. 

डॉक्टरों के मुताबिक, अगर यह स्तर 500 से नीचे चला जाए, तो शरीर की संक्रमण से लड़ने की क्षमता लगभग खत्म हो जाती है और जान का खतरा बढ़ जाता है. बीमारी के कारण बच्चे का शरीर न तो पर्याप्त खून बना पा रहा था और न ही रोगों से लड़ने वाली कोशिकाएं.

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14 रुपए के इंजेक्शन ने किया चमत्कार
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए डॉक्टरों ने तुरंत सही दिशा में कदम उठाया और हाइड्रॉक्सीकॉबालामिन इंजेक्शन का इलाज शुरू किया. इस इंजेक्शन की कीमत मात्र 14 रुपए है और सप्ताह में एक बार दिए जाने वाले डोज ने चमत्कार कर दिखाया. कुछ ही समय में बच्चे का बोन मैरो सक्रिय हो गया और उसका ANC स्तर 82 से बढ़कर 6000 के पार पहुंच गया. धीरे-धीरे बच्चे की हालत में सुधार होता गया और अब वह पूरी तरह स्वस्थ होकर अस्पताल से डिस्चार्ज हो चुका है.

इस बीमारी के दुनिया में 60 मामले
मेडिकल जेनेटिक्स विभाग के प्रभारी डॉ. प्रियांशु माथुर ने बताया कि इस बीमारी के अब तक विश्वभर में केवल लगभग 60 मामले ही रिपोर्ट हुए हैं. समय पर सही पहचान और उपचार शुरू होने से इस बच्चे की जान बचाई जा सकी. यह मामला उस परिवार से जुड़ा है, जिसमें पहले दो बच्चों की लगभग 40 दिन की उम्र में मृत्यु हो चुकी थी. ऐसे में इस सफल उपचार ने न केवल एक जीवन बचाया, बल्कि परिवार को नई उम्मीद भी दी है. 

डॉक्टरों का कहना है कि इस मामले में सबसे अहम भूमिका समय पर सही बीमारी की पहचान और तुरंत शुरू किए गए इलाज की रही. यदि थोड़ी भी देरी होती, तो परिणाम पहले दो बच्चों जैसा दुखद हो सकता था. परिवार के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं है. उन्होंने कहा, 'हमने अपने दो बच्चों को इसी बीमारी के कारण खो दिया था, लेकिन इस बार डॉक्टरों ने हमारे बच्चे को नई जिंदगी दे दी.'

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