राजनीति की राह पर सपने जो दशकों पहले देखे गए, मंजिल जो वर्षों पहले तय हुई. रास्ता दुर्गम, उतार-चढ़ाव बहुत, कभी लक्ष्य दो हाथ पास कभी कोसों दूर. जनसंघ से 1980 में बीजेपी की स्थापना होती है. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी समेत तमाम नेतृत्वकर्ता और अनगिनत कार्यकर्ताओं ने अपना तन मन झोंका. विचारों की जमीन पर धारा 370, राम मंदिर, नागरिकता कानून से लेकर देश भर में अंधेरा छंटने कमल खिलने की बात कही गई. लेकिन उस अंधेरे को हटाने, कमल खिलाने, दशकों पहले रोपे गए बीजों में सफलता का अंकुरण कराने वाला सूर्य बीजेपी के लिए मोदी राज में उग पा रहा है. जहां असंभव रहे चुनावी मुकाबले अब संभव हो रहे हैं. चर्चा के समंदर में तैरते रहे बीजेपी के वैचारिक मूल मुद्दों को किनारा मिला है. पार्टी-संगठन का अभूतपूर्व विस्तार आकार लिया है. क्या इसलिए क्योंकि मोदी है तो मुमकिन है?