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श्‍वेतपत्र

डॉक्टर्स 24 घंटे कोरोना की लाइन ऑफ कंट्रोल पर तैनात, देखें श्वेतपत्र

22 मई 2021

डर से डरना नहीं है डर का मुकाबला करना है, घबराहट के समय दूसरों को संभालना भी एक ऐसी बिमारी है जिससे लड़ना बेहद जरुरी है ताकि हिंदुस्तान जीते. हमारे डॉक्टर्स दिन रात ड्यूटी कर रहे हैं ताकि कोरोना वायरस जैसी महामारी से लड़ा जा सके और कोरोना मरीजों को बचाया जा सके. हमारे देश के डॉक्टर्स हिंदुस्तान के कर्मवीर हैं जो अपने परिवारों को छोड़कर 24 घंटे अस्पतालों में पीपीई किट पहनकर पसीने में तरबतर होकर भी मरीजों की जान बचाने में लगे हुए हैं. इसी पर देखें श्वेतपत्र का ये एपिसोड.

श्वेतपत्र: कोरोना से लड़ाई में कहां है देश?

15 मई 2021

क्या कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर में त्राहिमाम का दौर धीरे-धीरे बीत रहा है? अलग-अलग राज्यों में जो कुछ कम होते आंकड़े नजर आ रहे हैं, वे क्या संकेत देते हैं, जानना जरूरी है. इन आंकड़ों पर गौर करने की जरूरत है, जिससे देश के मौजूदा हाल के बारे जानकारी मिल सके. वैक्सीन को लेकर केंद्र और राज्यों के बीच खींचतान मची हुई है. बच्चों में संक्रमण की बात को लेकर क्या तैयारी की जा रही है, कोरोना के मौजूदा हालात कैसे हैं, देखें इन सब सवालों के जवाब, श्वेतपत्र में श्वेता सिंह के साथ.

श्वेतपत्र: ऑक्सीजन संकट से क्यों जूझ रहा है देश?

08 मई 2021

देश कोरोना संकट से जूझ रहा है. कोरोना के खिलाफ लड़ाई में ऑक्सीजन महत्वपूर्ण हथियार बना है, लेकिन देश के हर हिस्से से इसकी किल्लत सामने आ रही है. ऑक्सीजन उत्पादन बढ़ाने के लिए प्लांट लगाने पर जोर लगाया जा रहा है. कोरोना की दूसरी लहर में सांसों के लिए तरस रहे हैं, लेकिन ऑक्सीजन पर्याप्त नहीं मिल पा रहा है. दिल्ली के एम्स में भी ऑक्सीजन प्लांट लगाया गया है, जहां ऑक्सीजन की किल्लत दूर करने की कोशिश की जा रही है. हर जगह ऑक्सीजन प्लांट लगाने पर जोर लगाया जा रहा है. देखें श्वेतपत्र.

श्वेतपत्र: वेंटिलेटर पर क्या कर रहा सिस्टम?

01 मई 2021

कोरोना संकट के देश जूझ रहा है. अस्पतालों के बाहर लंबी-लंबी कतारे हैं. ऑक्सजीन के लिए लोग जूझ रहे हैं. केंद्र और राज्य सरकारें दावा कर रही हैं कि स्थितियां सामान्य करने की कोशिशें की जा रही हैं, अगर ऐसा है तो जमीन पर चीजें क्यों नहीं नजर आती हैं. कोरोना से लड़ाई में भारत कहां खड़ा है, वैक्सीनेशन के हिसाब से उसकी रफ्तार बढ़ाने के लिए क्या तैयारियां की जा रही हैं? जिंदगी मौत के दरवाजे पर अब भी सांसों की पनाह मांग रही है. व्यवस्थाएं, अव्यवस्थाओं की आपदा के नीचे अब भी कुचली पड़ी हैं। संक्रमण का आंकड़ा कब कम होगा ? मौत के आंकड़े कबसे घटेंगे ? दवाई, ऑक्सीजन, बेड, एंबुलेंस की कमियों का आपातकाल कब खत्म होगा? इन सवालों के बीच जब वैज्ञानिक बताते हैं कि लहर का पीक आना अभी बाकी है, तो मन सवालों से भर जाना लाजिमी है. देखें श्वेतपत्र, श्वेता सिंह के साथ.

ऑक्सीजन के लिए क्यों तड़प रहा देश? देखें श्वेतपत्र

24 अप्रैल 2021

कोरोना संकट से देश जूझ रहा है. कहीं ऑक्सीजन की किल्लत देखने को मिल रही है, तो कहीं अस्पतालों की किल्लत. हर राज्य में चुनैतियां बेकाबू होती जा रही हैं. चुनौतियों के मुकाबले देश की तैयारियां क्या हैं, किन उपायों को अपनाकर देश में किल्लत दूर हो सकती है, कैसे देश ऑक्सीजन की किल्लत से उबरेगा ये जानना जरूरी है. चरमराती व्यवस्थाएं हालत को बयान कर रही हैं. साइंस, डॉक्टर, सिस्टम हर तरफ यही सवाल खड़े हो रहे हैं कि क्यों देश की चुनौतियां गहरी होती जा रही हैं, क्यों देश की अर्थव्यवस्था जूझ रही है, क्यों हालात बेकाबू हो रहे हैं. इन सब चुनौतियों पर देखें श्वेतपत्र, श्वेता सिंह के साथ.

बंगाल के युवा किन मुद्दों पर डालेंगे वोट? देखें श्वेतपत्र

17 अप्रैल 2021

युवाओं का रुख जिस तरफ हो जाता है इतिहास भी उसी तरफ मुड़ जाता है. अगर सबसे ज्यादा युवाओं वाला राज्य अपने सबसे आक्रामक चुनाव के दौर से गुज़र रहा हो तो नौजवानों की भूमिका मुद्दों और वोटों से कहीं अधिक हो ही जाती है. पश्चिम बंगाल के चुनावों में अगर इस समय सबसे ज्यादा बेचैनी है तो इसलिए क्योंकि इसमें वहां के युवाओं की आकांक्षांएं शामिल हैं और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए वो बेहद जरूरी बन चुके हैं. क्या है बंगाल के नौजवानों के मुद्दे, सरकार से क्या हैं उनकी उम्मीदें, देखें श्वेतपत्र, श्वेता सिंह के साथ.

कौन जीतेगा नक्सलबाड़ी की जंग? देखें श्वेतपत्र

10 अप्रैल 2021

बंगाल का नक्सलबाड़ी गांव, नक्सल आंदोलन के मूल में है. यहीं से नक्सल विचारधारा की शुरुआत हुई. नक्सलवाद की शुरुआत हुई. हां परिस्थितियां आज बिल्कुल बदल गई हैं लेकिन क्या विचार भी बदले हैं? आज हम समूचे उत्तर बंगाल को देखेंगे, वहां की सोच को टटोलेंगे, राजनीतिक विचारधारा को समझने का प्रयास करेंगे. नक्सलबाड़ी गांव, 1967 की याद दिलाता है. नक्सलवाद की शुरुआत किस तरह से हुई थी चाहे लेनिन, स्टालिन, माओ-त्से-तुंग की बात हो या फिर 1967 के आंदोलन के जो अगुआ थे चारू मजूमदार, कानू सान्याल, इन नामों की बात हो, या फिर उस खूनी संघर्ष की बात हो, जिसके लिए 1967 जाना जाता है. आज के दौर में आज की राजनीति में उसकी कोई जगह नहीं है, लेकिन क्या लोगों के मन में वो बातें हैं? और यहां की राजनीति समूचे पश्चिम बंगाल के लिए क्या संकेत दे रही है? देखें श्वेतपत्र.

श्वेतपत्र: बंगाल में मुसलमान किसके साथ?

03 अप्रैल 2021

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के लिए दो चरणों के मतदान हो गए हैं. मुसलमानों को अपने पक्ष में करने के लिए सियासी पार्टियां ने हर चाल चली. श्वेतपत्र के इस वीडियो में बात होगी कि क्या बंगाल में मुस्लमान वोट बैंक है? बंगाल में मुस्लमान किसके साथ हैं, टीएमसी या बीजेपी के साथ? बंगाल में मुस्लमानों का सबसे बड़ा मुद्दा क्या है? बंगाल में ममता के दावों या मोदी के वादों पर मुस्लमानों को यकीन है?

श्वेतपत्र: बंगाल की नारी वोट शक्ति किसके साथ?

28 मार्च 2021

कहते हैं कि महिलाओं को समझना या उनके मन की बातों को बूझना नामुमकिन है. लेकिन इस बार सारी राजनीतिक पार्टियों का प्रयास यही है. दरअसल कुल मतदाताओं में 49 प्रतिशत होने के कारण वो बहुत निर्णायक हैं. ममता बनर्जी अभी तक अपनी महिला मतदाताओं पर बैंक करती रही हैं और प्रधानमंत्री मोदी की ताकत महिला मतदाता ही रही हैं. तो इस बार पश्चिम बंगाल में महिलाएं किस पर दांव लगाने वाली हैं, आइए उनके मन की बात जानने की कोशिश करते हैं. चुनाव दर चुनाव पुरुषों से अधिक संख्या में बंगाल की महिलाएं वोट देती रही हैं. इसीलिए देखिए कैसे बंगाल का चुनावी मैनिफेस्टो इस बार महिलाओं पर ही केंद्रित है. देखें श्वेतपत्र, श्वेता सिंह के साथ.

श्वेतपत्र: मत के लिए बंगाल में मौत का खेल क्यों?

13 मार्च 2021

बंगाल की सियासत और हिंसा का गहरा रिश्ता है. आखिर क्या कारण हैं कि बंगाल में जब भी चुनाव आते हैं या फिर जब भी सियासत की बात होती है तब खून बहता है, रक्त बहता है. कितने कार्यकर्ता, कितने नेता हिंसा का शिकार हो रहे हैं. कितने आम लोग उसकी चपेट में आ रहे हैं. ये सारी चीजें बंगाल में क्यों होती हैं? इसका अंत आखिर कब होने वाला है? माओत्से तुंग ने कहा था कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है. पश्चिम बंगाल ने इसे राजनीति की शायद पहली शर्त ही मान लिया. आंकड़े और इतिहास बताते हैं कि इसे एक ऐसा राज्य कहा जा सकता है, जहां हिंसात्मक राजनीतिक के विरोध में भी हिंसा ही सबसे जरूरी हथियार बन जाती है. राजनीतिक रिवाज रक्त-रंजित दिखते हैं. सामाजिक सरोकार रक्त रंजित दिखते हैं. व्यक्तिगत अधिकार रक्त-रंजित दिखते हैं. स्थिति ये है कि सत्ता बदलती है लेकिन पश्चिम बंगाल का रक्त-चरित्र नहीं बदलता. देखें श्वेतपत्र, श्वेता सिंह के साथ.

श्वेतपत्र: क्या मुस्लिम वोटर बंगाल में बनेंगे गेमचेंजर?

06 मार्च 2021

पश्चिम बंगाल का चुनाव क्या है? ये समझ लीजिए कि इतिहास करवट ले रहा है. अब से 75 साल पहले, यानि 1946 में बंगाल की ज़मीन संप्रदाय के नाम पर डायरेक्ट एक्शन की तलवार से बंटी थी. उस बंटवारे के ठीक 75 साल बाद पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव इसकी सियासी जमीन में गहरी लकीरें खींचते दिख रहे हैं. क्यों और कितना जरूरी है ‘हम’ यानि हिंदू मुस्लिम फैक्टर पश्चिम बंगाल की राजनीति में और क्या इसका असर चुनावों पर पड़ेगा? 2011 की जनगणना ने पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की आबादी 27 प्रतिशत दर्ज की थी. कुल आबादी में मुसलमानों की संख्या के हिसाब से पश्चिम बंगाल देश में चौथे नंबर पर है. लेकिन पहले तीन राज्य लक्षद्वीप, जम्मू-कश्मीर और असम की कुल मुस्लिम आबादी को जोड़ भी दिया जाए तब भी पश्चिम बंगाल के 2 करोड़ 46 लाख मुसलमान उन राज्यों से 50 लाख ज्यादा बैठते हैं. यही वजह है कि पश्चिम बंगाल की सियासत में ये वोट हमेशा अहम रहे हैं. देखें श्वेतपत्र, श्वेता सिंह के साथ.