दो जून की रोटी के लिए आम आदमी मेहनत करता है. दो जून की रोटी जनता को देने के नाम पर ही नेतागीरी होती है. दस्तक में देखें कि जाति जनगणना पर मिलकर फैसला लेने वालों के राज में दो जून की रोटी का जुगाड़ देने लायक शिक्षा व्यवस्था क्यों नहीं बन पा रही है? जनता के लिए दो जून की रोटी की बात करने वाली राजनीति कैसे अपने लिए राजनीतिक टोपी की व्यवस्था कर लेती है और दो जून की रोटी के लिए कश्मीर में जाकर नौकरी करने वाले लोगों को कैसे आतंकवादी चुनकर मार रहे हैं. क्यों कश्मीर से डरकर लोग वापस लौट रहे? इस पर देखें दस्तक.