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साउथ सिनेमा के आगे धूल चाट रहा बॉलीवुड, क्या है इसका कारण?

बॉलीवुड अगर तीसरे नंबर पर आ गया है तो इसके पीछे की वजह समझना बहुत जरूरी है, चलिए दिमाग के सारे घोड़े दौड़ा लीजिए और याद करके बताइए कि आखिरी बार बॉलीवुड की बायोपिक या रीमेक को छोड़कर आपने कौन सी अच्छी हिंदी फिल्म देखी है? तो बॉलीवुड की मीनारों और मेहराबों को एक दफे नाप लीजिए. 

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अल्लू अर्जुन, जॉन अब्राहम अल्लू अर्जुन, जॉन अब्राहम

सिनेमा जगत में टॉलीवुड बनी देश की नंबर वन इंडस्ट्री, बॉलीवुड तीसरे पायदान पर,14 शब्दों की ये एक हेडलाइन हो सकता है कि आपके लिए एक खबर हो, मगर इसे सिर्फ खबर मत समझिए, इसे चेतावनी समझिए कि बॉलीवुड के दिन लदने वाले हैं, या बॉलीवुड के तथाकथित नीति नियंताओं का समय बहुत तेजी से गुजर रहा है या ये भी कि बॉलीवुड वालों की काहिली को सिनेमा का दर्शक अब बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है, क्योंकि अब उसके पास ये बंदिश नहीं है कि सिनेमा हॉल का टिकट खरीद लिया तो पूरी फिल्म देखनी ही पड़ेगी, एक क्लिक और पिक्चर बदल गई मेरे दोस्त.

तो बॉलीवुड अगर तीसरे नंबर पर आ गया है तो इसके पीछे की वजह समझना बहुत जरूरी है, चलिए याद कीजिए...एक फिल्म के करीब 60 करोड़ रुपए लेने वाले सलमान खान की कोई फिल्म जिसे देखने के बाद आपको लगा हो कि वाह क्या शानदार फिल्म है, या एक फिल्म के 55 करोड़ लेने वाले शाहरुख खान ने पिछले एक दशक में ऐसी कौन सी फिल्म बनाई जिसे देखकर लगा हो कि वाह क्या सिनेमा है. 

ज्यादा पैसे कमाना अच्छे सिनेमा की निशानी नहीं

फिल्म के पैसे कमाने का अर्थ ये नहीं बताता कि फिल्म अच्छी है, ये फिल्मों की बेहतरी का परिचायक नहीं हो सकता, फिर भी आपको एक किस्सा बताना लाजिमी है, एक दफे आजतक के एक कार्यक्रम में शाहरुख खान गेस्ट के तौर पर आए थे, आजतक के एक सीनियर संवाददाता ने शाहरुख खान से सवाल किया था कि क्या कभी शाहरुख खान, आमिर खान, और सलमान खान, एक साथ किसी फिल्म में दिखेंगे? उस सवाल के जवाब में शाहरुख खान ने कहा था कि तीनों को साइन करने में घर के बर्तन बिक जाएंगे, कई बरस बाद आरआरआर के प्रमोशन के लिए कपिल शर्मा के शो में गए जूनियर एनटीआर और राम चरण से सवाल किया गया कि पहली बार दोनों एक साथ फिल्म कर रहे हैं, अब तक साथ में काम क्यों नहीं किया? 

तो जूनियर एनटीआर ने वही कहा मगर भाषा में लचक थी कि बजट ज्यादा था दोनों का, राजामौली ने 400 करोड़ रुपए दोनों बाहुबली फिल्मों से कमाए और साढ़े चौर सौ करोड़ आरआरआर में लगाकर रामचरण और जूनियर एनटीआर को साइन कर लिया. 

हाल ही में अर्जुन अल्लू से भी सवाल किया गया कि बॉलीवुड के हीरो उनकी फिल्मों के रीमेक बना रहे हैं तो क्या कभी मौका मिला को वो बॉलीवुड की किसी फिल्म का रीमेक में काम करेंगे, अल्लू अर्जुन ने टूटी फूटी हिंदी में जवाब दिया कि उन्होंने अपने करियर में कभी भी रीमेक नहीं बनाया.

ये बोलने का भरोसा कैसे आया, जाहिर सी बात है कि मेहनत करके, और मेहनत किसे कहते हैं ये जानने के लिए दो फिल्में देख लीजिए, दृश्यम-2 और नेत्रिकन. इन दो फिल्मों का जिक्र इसलिए क्योंकि ये हिंदी में नहीं हैं, आप इन्हें देखिए महसूस करेंगे कि अच्छा सिनेमा हो तो भाषा बाधक नहीं बनती, एक सांस में देख जाएंगे दोनों फिल्में. 

कहने का अर्थ ये है कि जिन साउथ की फिल्मों का एक दशक पहले मजाक बनाया जाता था वही साउथ की फिल्में कमाल कर रही हैं, और उनके अदाकार अगली पंक्ति में भारतीय सिनेमा जगत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. 

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बेहतर कंटेंट आ रहा दर्शकों को पसंद

ऐसा पहली बार देखा गया है कि अल्लू अर्जुन अभिनीत फिल्म पुष्पा, यूपी और बिहार के थियेटरों में भी हाउस फुल रही. हिंदी का दर्शक पुष्पा को देखने के लिए लालायित दिखा. 

बात अकेले पुष्पा की नहीं है, बात है अच्छे कंटेंट, बेहतर अदाकारी और अच्छी स्क्रिप्ट के साथ तरीके से फिल्म को बनाने की, दिमाग के सारे घोड़े दौड़ा लीजिए और याद करके बताइए कि आखिरी बार बॉलीवुड की बायोपिक या रीमेक को छोड़कर आपने कौन सी अच्छी हिंदी फिल्म देखी है? तो बॉलीवुड की मीनारों और मेहराबों को एक दफे नाप लीजिए. 

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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फालतू डायलॉग से होता है सिर्फ शोर

अभी हाल ही में एक फिल्म आई थी, नाम था धमाका, ये फिल्म धमाका नहीं फुस्सी फटाखा थी, मीडिया की पढ़ाई कर रहा कोई छात्र भी फिल्म देखकर कह सकता था कि इस फिल्म में रिसर्च के नाम पर जीरो था जीरो. पहली बार ही हिंदी सिनेमा के दर्शक देख रहे थे कि एक रेडियो जॉकी है जो एंकर है, जो प्रोड्यूसर भी है, जो पीसीआर का हेड भी है, और उनकी चैनल हेड जो मिनट-मिनट में बता रही हैं कि टीआरपी ऊपर जा रही है. 

मतलब मजाक की सारी सीमाएं यहीं नहीं टूटीं, इसी के साथ एक और फिल्म आई थी सत्यमेव जयते 2 पूरी फिल्म में जॉन अब्राहम सीधे मुंह बात ही नहीं कर रहे, जॉन का डायलॉग है 

जिस देश की गंगा मैया है, वहां खून भी तिरंगा है 

मतलब? 

खून भी तिरंगा है...क्यों मगर? 

एक और डायलॉग है पंखे में झूल रहा किसान है, गड्ढे में पूरा जहान है, फिर भी भारत महान है? 

ऐसी तुकबंदी से आपको लगता है कि आप बॉलीवुड में नंबर वन बने रहेंगे? 

केआरके ने अपने एक वीडियो में बताया कि आरआरआर में छोटा सा रोल करने के लिए भी अजय देवगन तैयार हो गए क्योंकि वो राजमौली से दोस्ती बढ़ाना चाहते थे, पता नहीं केआरके की मंशा क्या रही हो ये कहने में, मगर इतना जरूर है कि राजमौली आज की तारीख में नंबर वन फिल्म मेकर्स में से एक हैं, और अकेले अजय देवगन नहीं, अभी हाल में एक फिल्म आई थी मोहनलाल अभिनीत फिल्म मराक्कर, इस फिल्म में सुनील शेट्टी के रोल को देखकर सिर्फ दया आती है, कि उन्होंने इस फिल्म में दो चार मिनट का रोल क्यों किया? इस पूरे कथानक का सार ये है कि बॉलीवुड ने तौबा कर ली है, अच्छी एक्टिंग से, अच्छी स्क्रिप्ट से, और अच्छे सिनेमा से, मतलब मान के चलिए कि कॉलीवुड और टॉलीवुड का समय शक्तिशाली हो रहा है. 

लेखक अजित त्रिपाठी आजतक में सीनियर प्रोड्यूसर हैं.

 

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