कर्नाटक के सीएम सिद्धारमैया 'सबसे लंबे समय तक कर्नाटक का मुख्यमंत्री' बने रहने का रिकॉर्ड बनाने जा रहे हैं. वह इस वक्त अपने होमटाउन मैसूर में हैं और कल इस पद पर रहते हुए सात साल 239 दिनों से अधिक कार्यकाल पूरा कर लेंगे. इस तरह वह कर्नाटक के सबसे बेहतरीन मुख्यमंत्रियों में शुमार रहे 'डी. देवराज उर्स' के सबसे लंबे कार्यकाल का रिकॉर्ड तोड़ देंगे.
इस इतिहास के रचे जाने की पूर्व संध्या पर, सिद्धारमैया क्रिकेट प्रेमी हैं और शायद ही कभी चिन्नास्वामी स्टेडियम में किसी मैच से चूकते हैं. उन्होंने मीडिया से कहा, 'आप जानते हैं, रिकॉर्ड तो टूटने के लिए ही होते हैं. हमने देखा है कि विराट कोहली ने सचिन तेंदुलकर के कितने रिकॉर्ड तोड़े हैं… कोई और भविष्य में मेरा रिकॉर्ड भी तोड़ सकता है.'
सिद्धारमैया ने यह उपलब्धि ऐसे समय में हासिल की है, जब उनके उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार पिछले कुछ महीनों से लगातार मुख्यमंत्री पद की बागडोर संभालने की कोशिशों में जुटे हैं, लेकिन शिवकुमार के लिए यह सपना अब सपना जैसा ही लगता है.
सिद्धारमैया ने पूरा किया सबसे लंबा कार्यकाल
अपने दूसरे कार्यकाल में सिद्धारमैया, देवराज उर्स के दो कार्यकालों में पूरे हुए सात साल 239 दिनों के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ रहे हैं और फिलहाल कुर्सी छोड़ने की कोई जल्दी उनके व्यवहार में नहीं दिखती. उन्हें इस बात से भी हौसला मिला हुआ है कि डीके शिवकुमार की लगातार कोशिशों के बावजूद कांग्रेस हाईकमान ने भी उन्हें हटाने में कोई खास जल्दबाजी नहीं दिखाई है.
12 अगस्त 1948 को जन्मे सिद्धारमैया, अगर मई 2028 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का नेतृत्व करने की अपनी महत्वाकांक्षा पूरी करते हैं, तो वे पद पर रहते हुए कर्नाटक के सबसे उम्रदराज मुख्यमंत्री भी बन सकते हैं.
अब सवाल यह उठता है कि उपलब्धियों के पैमाने पर सिद्धारमैया की तुलना देवराज उर्स से कैसे की जाए, जिन्होंने 1972 से 1980 तक मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया. उर्स का दौर भले ही अलग समय का रहा हो, लेकिन चुनौतियों से भरा हुआ था.
कैसी है पूर्व सीएम देवराज उर्स की विरासत?
देवराज उर्स को दो सबसे प्रभावशाली समुदायों लिंगायत और वोक्कालिगा के वर्चस्व को तोड़ने का श्रेय दिया जाता है, जिन्होंने एक चौथाई सदी तक सत्ता पर पकड़ बनाए रखी थी. उर्स ने पिछड़े वर्गों और छोटे समुदायों को सत्ता और संसाधनों में हिस्सेदारी दिलाई. उन्होंने एलजी. हवनूर की अध्यक्षता में पहला पिछड़ा वर्ग आयोग गठित किया, जिसने सैकड़ों जातियों और उनके सामाजिक-आर्थिक हालात पर स्टडी की. इसके आधार पर कर्नाटक में देश की सबसे प्रगतिशील आरक्षण व्यवस्थाओं में से एक लागू हुई, जो शिक्षा से लेकर सरकारी नौकरियों तक फैली.
उर्स ने राज्य के कुछ हिस्सों में चली आ रही बंधुआ मजदूरी प्रथा खत्म कराई.सबसे अहम, भूमि सुधारों के जरिए गरीब तबकों को सशक्त किया. उर्स ये सामाजिक सुधार इसलिए कर पाए क्योंकि उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष इंदिरा गांधी का मजबूत समर्थन हासिल था. हालांकि अपने अंतिम वर्षों में वे इंदिरा गांधी की नाराजगी का शिकार हुए और मुख्यमंत्री पद से हटा दिए गए, लेकिन आज भी उन्हें उस नेता के रूप में याद किया जाता है जिसने कर्नाटक की राजनीति की दिशा हमेशा के लिए बदल दी.
इसके उलट, सिद्धारमैया का रिकॉर्ड सीमित माना जाता है. उन्होंने कोई बड़े स्तर का गेम-चेंजर सुधार नहीं किया, हालांकि ‘राजनीतिक प्रबंधन’ के जरिए वे पार्टी और सहयोगियों की मजबूत निष्ठा हासिल करने में सफल रहे.
पिछड़े वर्ग के कुरुबा नेता सिद्धारमैया ने जयप्रकाश नारायण से प्रेरित जनता पार्टी आंदोलन से राजनीति की शुरुआत की. 1983 में रामकृष्ण हेगड़े की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार में वे मंत्री बने. हेगड़े को वे आज भी अपना राजनीतिक गुरु मानते हैं. लेकिन 1988 में जब हेगड़े और देवगौड़ा के बीच टकराव हुआ, तो सिद्धारमैया ने देवगौड़ा की नवगठित समाजवादी जनता पार्टी का साथ चुना, जो 1989 के चुनावों में लगभग साफ हो गई.
कैसे राजनीति में आए सिद्धारमैया
इसके बाद सिद्धारमैया ने ओबीसी पहचान को मजबूती से गढ़ा और देवगौड़ा के वोक्कालिगा समर्थन आधार के साथ मिलकर फिर से राजनीतिक जमीन तैयार की. जनता दल (यूनाइटेड) एक बार फिर प्रभावशाली शक्ति बनकर उभरा. 2004 के त्रिशंकु विधानसभा चुनावों के बाद, देवगौड़ा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन सरकार बनाई, जिसमें सिद्धारमैया उपमुख्यमंत्री बने. यहीं से उनके भीतर मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा ने आकार लिया. लेकिन देवगौड़ा का ध्यान अपने बेटे एचडी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनाने पर था. निराश सिद्धारमैया ने विधायक पद से इस्तीफा दिया, कांग्रेस में शामिल हुए और चामुंडेश्वरी सीट से उपचुनाव लड़ा.
यह उनके करियर की सबसे बड़ी परीक्षा थी. बीजेपी और देवगौड़ा की जेडी(यू) ने उन्हें हराने के लिए गुप्त समझौता किया, लेकिन सिद्धारमैया महज 257 वोटों से जीत गए. यह हार शायद उनका राजनीतिक करियर समाप्त कर देती, लेकिन इस 'बचाव’ को उन्होंने कांग्रेस पर धीरे-धीरे नियंत्रण स्थापित करने के अवसर में बदल दिया.
सिद्धारमैया की सफलता की चाबी ‘अहिंदा’—अल्पसंख्यक, हिंदू पिछड़े वर्ग और दलित गठजोड़ रही. उन्होंने ऐसे समय में कांग्रेस को मजबूत किया, जब 2004 में एसएम कृष्णा की हार के बाद पार्टी दिशाहीन दिख रही थी. 2004 में बीजेपी की अप्रत्याशित बढ़त और 2008 में येदियुरप्पा के नेतृत्व में पहली बीजेपी सरकार बनी, लेकिन तीन साल के भीतर ही खनन घोटाले पर लोकायुक्त संतोष हेगड़े की 24,000 पन्नों की रिपोर्ट के बाद वह सरकार गिर गई. इसके बाद बीजेपी ने दो और मुख्यमंत्री बदले, सदानंद गौड़ा और जगदीश शेट्टर, और आखिरकार येदियुरप्पा ने बदला लेने के लिए केजेपी बना ली.
33 साल बाद सिद्धारमैया ने पूरा किया था पांच साल का कार्यकाल
2013 के चुनावों में बीजेपी की आपसी लड़ाई का फायदा उठाते हुए, सिद्धारमैया के नेतृत्व में कांग्रेस स्पष्ट बहुमत से सत्ता में आई. सोनिया और राहुल गांधी के समर्थन से सिद्धारमैया मुख्यमंत्री बने और बांगारप्पा, मोइली और धरम सिंह के बाद चौथे ओबीसी मुख्यमंत्री बने—हालांकि इन तीनों के कार्यकाल छोटे रहे थे. मुख्यमंत्री बनते ही सिद्धारमैया ने ‘अन्न भाग्य’ जैसी लोकलुभावन योजना शुरू की, जिसके तहत गरीब परिवारों को 10 किलो मुफ्त चावल दिया गया. वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने ‘जितनी आबादी, उतना हक’ के सिद्धांत पर पिछड़े वर्गों और अल्पसंख्यकों के लिए भारी बजट आवंटन किया. विधायकों को खुश रखने के लिए उनके क्षेत्रों में विकास निधि भी खुलकर दी और पार्टी हाईकमान की चुनावी जरूरतों का भी ध्यान रखा.
नतीजा यह रहा कि 33 साल बाद कोई मुख्यमंत्री देवराज उर्स के बाद पूरा पांच साल का कार्यकाल पूरा कर पाया.
2018 के चुनावों में सिद्धारमैया को जनता की नाराजगी का आभास हो गया था. सूखा प्रबंधन, बुनियादी ढांचे और रोजगार सृजन जैसे मुद्दों पर उनकी सरकार विफल रही थी. उन्होंने चामुंडेश्वरी और बागलकोट की बदामी—दो सीटों से चुनाव लड़ा. अपने गढ़ चामुंडेश्वरी में वे 34,000 वोटों से हार गए, जबकि बदामी ने उन्हें 1,600 वोटों के मामूली अंतर से बचाया. 2018 से 2023 तक कर्नाटक की राजनीति उथल-पुथल का पर्याय रही. बीजेपी 104 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से येदियुरप्पा की सरकार चार दिन में गिर गई. इसके बाद जेडी(एस)-कांग्रेस गठबंधन बना, लेकिन 14 महीने में ही सिद्धारमैया की पर्दे के पीछे की भूमिका से वह सरकार भी गिर गई.
इसके बाद येदियुरप्पा चौथी बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन दो साल में उन्हें हटाकर बसवराज बोम्मई को लाया गया. 2023 के चुनावों में सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार ने ओबीसी और वोक्कालिगा गठजोड़ बनाकर कांग्रेस को 136 सीटों के साथ प्रचंड जीत दिलाई. महिलाओं को केंद्र में रखकर बनाई गई ‘पांच गारंटियों’ ने चुनावी बाजी पलट दी. लेकिन इन वादों को लागू करने में सरकार को पिछले 30 महीनों में करीब दो लाख करोड़ रुपये खर्च करने पड़े. विकास कार्यों और ढांचागत सुधारों के लिए धन की कमी से लोग परेशान हैं.
इसके बावजूद सुर्खियों में असली मुद्दा ‘सत्ता’का बना हुआ है, सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच सत्ता संघर्ष जारी है. अब सवाल वही है, रिकॉर्ड तो सिद्धारमैया तोड़ रहे हैं, लेकिन क्या वे देवराज उर्स जैसी ऐतिहासिक विरासत छोड़ पाएंगे?
रिपोर्ट- रामकृष्ण उपाध्याय