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नेहरू की आपत्ति के बावजूद शक्‍सगाम घाटी को पाक‍िस्तान ने कैसे चीन को ग‍िफ्ट कर दिया?

चीन लगातार कई मोर्चों पर भारत को घेर रहा है. अब खबर मिल रही है कि पाक अधिकृत कश्मीर के शक्सगाम घाटी के हिस्से में चीन लगातार निर्माण कार्य कर रहा है. चीन की सीनाजोरी यह है कि भारत सरकार के विरोध के बावजूद वह इसे वैध बता रहा है.

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पीओके में चीन की एक और हिमाकत, शक्सगाम घाटी में करा रहा है पक्का निर्माण.
पीओके में चीन की एक और हिमाकत, शक्सगाम घाटी में करा रहा है पक्का निर्माण.

शक्सगाम घाटी एक बार फिर सुर्खियों में है. भारत ने शक्‍सगाम में चीन की इंफ्रास्ट्रक्चर गतिविधियों (खासकर चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर या CPEC के तहत सड़क निर्माण) पर कड़ी आपत्ति जताई. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जयसवाल ने 9 जनवरी 2026 को कहा कि शक्‍सगाम घाटी भारतीय क्षेत्र है. हम 1963 के तथाकथित चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते को कभी मान्यता नहीं देते, जो अवैध और अमान्य है. उन्होंने CPEC को भी खारिज किया, क्योंकि यह भारतीय क्षेत्र से होकर गुजरता है जो पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है.

शक्‍सगाम घाटी (Shaksgam Valley), जिसे ट्रांस-कराकोरम ट्रैक्ट भी कहा जाता है, जम्मू-कश्मीर के पूर्ववर्ती रियासत का हिस्सा है और वर्तमान में भारत द्वारा लद्दाख संघ राज्य क्षेत्र का अभिन्न अंग माना जाता है. यह क्षेत्र 5,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक में फैला हुआ है, जो सियाचिन ग्लेशियर के उत्तर में स्थित है. कठोर जलवायु और दुर्गम भूभाग के कारण यहां मानव बस्तियां बहुत कम हैं, लेकिन रणनीतिक महत्व बहुत अधिक है. यह कराकोरम पास के निकट है, जहां से भारत चीन की गतिविधियों पर नजर रख सकता है, और सियाचिन से पाकिस्तान पर भी.

चीन क्या कहता है

चीन ने भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जयसवाल के आरोपों का जवाब 12 जनवरी 2026 को इसका जवाब दिया. विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा, यह क्षेत्र चीन का है. अपनी जमीन पर इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण हमारा संप्रभु अधिकार है. 1960 के दशक में चीन और पाकिस्तान ने सीमा समझौता किया था. जो दोनों संप्रभु देशों का अधिकार है. चीन ने CPEC को आर्थिक विकास का प्रोजेक्ट बताया और कश्मीर मुद्दे पर अपना रुख दोहराया कि यह भारत-पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय है.

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 यह विवाद नया नहीं है. इसकी जड़ें 1947-48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में हैं. जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को भारत में विलय किया, जिसके बाद पूरा क्षेत्र (शक्‍सगाम सहित) भारत का हिस्सा बना. लेकिन पाकिस्तान ने 1947-48 युद्ध में गिलगित-बाल्टिस्तान और हंजा क्षेत्र पर कब्जा कर लिया, जिसमें शक्‍सगाम शामिल था. भारत ने कभी इस कब्जे को मान्यता नहीं दी. 1950 के दशक में चीन ने पूर्वी हंजा में घुसपैठ शुरू की, जिससे भारत-चीन संबंध बिगड़े. 1950 के दशक में चीन ने अक्साई चिन में हाईवे बनाया (तिब्बत-शिनजियांग कनेक्ट करने के लिए), जो भारत के अनुसार जम्मू-कश्मीर का हिस्सा है. पाकिस्तान ने चीन को खुश करने के लिए 1963 में शक्‍सगाम घाटी सौंप दी.

नेहरू ने कड़ी आपत्ति जताई थी

 2 मार्च 1963 को पाकिस्तान के विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो और चीन के चेन यी ने समझौता किया. पाकिस्तान ने लगभग 5,180 वर्ग किमी क्षेत्र (यारकंद नदी और शक्‍सगाम घाटी) चीन को सौंप दिया. समझौते के अनुच्छेद 6 में कहा गया कि कश्मीर विवाद सुलझने के बाद संबंधित संप्रभु पक्ष चीन के साथ बातचीत कर औपचारिक सीमा संधि करेगा. भारत ने इसे अवैध बताया, क्योंकि पाकिस्तान के पास क्षेत्र पर संप्रभुता नहीं थी. तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 5 मार्च 1963 को संसद में इस पर कड़ी आपत्ति जताई.

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उन्होंने कहा, कि हम पाकिस्तान के साथ समझौता चाहते हैं, लेकिन चीन-पाकिस्तान समझौते का समय कश्मीर वार्ता को प्रभावित करने के लिए चुना गया है. नेहरू ने चीन पर आरोप लगाया कि वह भारत-पाकिस्तान मतभेदों का फायदा उठाकर विस्तारवादी नीति चला रहा है. उन्होंने कहा, कि चीन कश्मीर विवाद में सीधे हस्तक्षेप कर रहा है. नेहरू ने समझौते को भारत-चीन संबंधों में हस्तक्षेप बताया और कहा कि कश्मीर समझौता पाकिस्तान की शर्तों पर नहीं होगा. यह समझौता 1962 के भारत-चीन युद्ध के ठीक बाद हुआ, जब चीन ने भारत पर हमला किया था. पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ गठबंधन के बावजूद चीन से निकटता बढ़ाई, जो बाद में आयरन-क्लैड दोस्ती बनी.

समझौते ने कराकोरम हाईवे (1970 के दशक में बनाया गया) की नींव रखी, जो CPEC का हिस्सा है. 2026 में मुद्दा फिर गरमाया क्योंकि चीन CPEC के तहत शक्‍सगाम में ऑल-वेदर रोड बना रहा है. लगभग 75 किमी पूरी हो चुकी है. यह सड़क सियाचिन से 49 किमी दूर है और भारत की रक्षा स्थिति को प्रभावित कर सकती है. भारत ने इसे ग्राउंड रियलिटी बदलने की कोशिश बताया और आवश्यक कदम उठाने का अधिकार सुरक्षित रखा.

1963 समझौते की प्रक्रिया और कारण

1963 का समझौता नेहरू की आपत्ति के बावजूद कैसे हुआ? इसका जवाब भू-राजनीतिक साजिशों में है. 1962 युद्ध के बाद पाकिस्तान ने चीन से संपर्क बढ़ाया. पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने चीन को खुश करने के लिए शक्‍सगाम घाटी सौंपने का फैसला किया. 2 मार्च 1963 को बीजिंग में पाकिस्तान के विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो और चीन के चेन यी ने समझौते पर हस्ताक्षर किए. समझौते में पाकिस्तान ने 5,180 वर्ग किमी क्षेत्र (यारकंद नदी और शक्‍सगाम घाटी) चीन को सौंप दिया.

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समझौते के अनुच्छेद 6 में कहा गया कि कश्मीर विवाद सुलझने के बाद संबंधित संप्रभु पक्ष (यानी भारत या पाकिस्तान) चीन के साथ औपचारिक सीमा संधि करेगा. लेकिन पाकिस्तान ने इसे सौंपकर चीन को स्थायी कब्जा दे दिया. नेहरू की आपत्ति के बावजूद यह हुआ क्योंकि पाकिस्तान की रणनीति थी कि पाकिस्तान भारत के खिलाफ चीन को साथी बनाना चाहता था.1962 युद्ध में चीन की जीत से पाकिस्तान को अवसर मिला. अयूब खान ने अमेरिका के साथ गठबंधन होने के बावजूद चीन से दोस्ती की, जो बाद में आयरन-क्लैड संबंध बनी.

भारत कहां कमजोर पड़ गया

1962 युद्ध के बाद भारत कमजोर था. नेहरू की आपत्ति कूटनीतिक थी, लेकिन सैन्य या अंतरराष्ट्रीय दबाव नहीं डाल सका. पाकिस्तान ने क्षेत्र पर अवैध कब्जा होने से भी सौदा किया. समझौता भारत-पाकिस्तान कश्मीर वार्ता के दौरान हुआ, जिससे वार्ता प्रभावित हुई. नेहरू ने इसे समयबद्ध साजिश कहा.

समझौता नेहरू की आपत्ति के बावजूद हुआ क्योंकि यह भारत की पहुंच से बाहर था. आज भारत कूटनीतिक और सैन्य रूप से मजबूत है, लेकिन विवाद जारी है. नेहरू की चेतावनी आज भी प्रासंगिक है कि चीन मतभेदों का फायदा उठाता है. भारत को संप्रभुता की रक्षा के लिए मजबूत कदम उठाने होंगे.

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