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सुनील दत्त की एक गुहार...और 'खलनायक' संजय दत्त के लिए 'सरकार' बन गए थे बाल ठाकरे

सुनील दत्त कभी भी इस बात को मानने को तैयार नहीं थे कि उनके बेटे पर जो आरोप लगे हैं वो सच हैं. उन्होंने संजय को जेल से निकालने की हर कोशिश भी आज़मा ली थी. कांग्रेस ने भी इस मामले में मूक दर्शक होना चुन लिया था. शरद पवार बनाम सुनील दत्त का दौर भी जारी था. ऐसे में सुनील दत्त का साथ शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने दिया. हालांकि बाल ठाकरे से मदद मांगने के लिए कांग्रेस नेता सुनील दत्त बिल्कुल भी तैयार नहीं थे, लेकिन एक पिता के तौर पर उन्होंने मातोश्री में क़दम रखा और बाल ठाकरे ने उतनी ही सादगी से उनकी सारी बातें सुनीं और मदद का आश्वासन भी दिया.

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संजय दत्त के सबसे मुश्किल समय में बाल ठाकरे ने बेहद खास किरदार निभाया था! संजय दत्त के सबसे मुश्किल समय में बाल ठाकरे ने बेहद खास किरदार निभाया था!

सुनील दत्त की ज़िंदगी में एक बड़ी टीस रही और वो थी उनके बेटे संजय दत्त की 'ज़िंदगी की गिरफ्तारी'. सुनील दत्त की दिली तमन्ना थी कि वो एक बार संजय दत्त को आज़ाद इंसान के तौर पर देख सकें. जिसके लिए उन्होंने हर मुनासिब कोशिशें कीं. लेकिन किसी भी तरह से उन्हें आस दिखती नजर नहीं आ रही थी. हर तरफ निराशा ही निराशा. कांग्रेस पार्टी ने भी इस पूरे मामले से तकरीबन किनारा ही कर लिया था. सुनील ने हर दरवाज़ा खटखटा कर देख लिया, लेकिन कोई काम नहीं आया.

वहीं दूसरी तरफ़ संजय दत्त के साथ जो कुछ भी हो रहा था, इसके पीछे की वजह संजय अपने पिता के राजनीतिक जीवन को मानते थे. सुनील जब भी संजय से ऑर्थर रोड जेल में मिलने जाते तो संजय सिर्फ एक ही बात कहते कि आपकी राजनीति की वजह से मुझे मोहरा बनाया गया है, आप मुझे बाहर निकलवा सकते हैं, मुझे यहां से निकालिए. और सुनील दत्त, 'बस कुछ दिन और' कहकर वहां से चले जाते. ये सिलसिला महीनों चला.  

सुनील जहां एक तरफ़ संजय (Sanjay Dutt) की गिरफ़्तारी को लेकर मुश्किलों में थे तो दूसरी तरफ़ उनके राजनीतिक जीवन में भी सब कुछ ठीक नहीं चल रहा था. शरद पवार और सुनील दत्त के बीच जो राजनैतिक संघर्ष चल रहा था, वो कहीं न कहीं संजय पर असर कर रहा था.

तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने भी उस समय सुनील दत्त की जगह शरद पवार को तरजीह देना शुरू कर दिया, तो सुनील को यह समझ आ गया था कि उन्हें अब नज़रअंदाज किया जा रहा है. ऐसे में 'शरद पवार बनाम सुनील दत्त' ने संजय दत्त पर असर दिखाया. संजय दत्त की मुश्किलें, मुसीबत में बदल गई थीं... और इस सब के बीच कांग्रेस एक मूक दर्शक की तरह सब कुछ देखती रही.

इस पूरे मामले में शिवसेना प्रमुख बालठाकरे (Bal Thackeray) ने 'सामना' को दिए एक इंटरव्यू में बताया था कि एक बार सुनील दत्त ने उनसे कहा था कि शरद पवार (Sharad Pawar) ने उनके बेटे संजय की ज़िंदगी तबाह कर दी है. सुनील ने शरद की बात मानकर अपने बेटे को पुलिस के पास भेजा, जहां उसे अरेस्ट कर लिया गया. जिसके बाद की कहानी सब को पता है कि संजय को जेल में अपने जीवन के सबसे तकलीफ भरे दिन देखने पड़े. 

सुनील दत्त (Sunil Dutt) के जीवन में बाल ठाकरे एक ऐसा नाम रहे जिन्होंने सुनील को उस वक़्त गले से लगाया जब एक पिता के लिए हर तरफ से उम्मीद ख़त्म हो चुकी थी. जो जेल में अपने बेटे का कॉलर पकड़ कर यह कह आया था कि मैं तुम्हारे लिए अब और कुछ नहीं कर सकता, मुझे माफ़ कर देना.
 

 

एक पिता के रूप में अपने बेटे को दिन रात तड़पते देखना सुनील को अंदर अंदर से खाए जा रहा था. इसी बीच उनके समधी और फिल्म अभिनेता राजेंद्र कुमार ने उनसे बाल ठाकरे के पास जाने की बात कही. जिस पर सुनील काफी गुस्सा गए थे. सुनील दत्त एकदम सेक्युलर प्रवत्ति के तो दूसरी तरफ बाल ठाकरे और उनकी पार्टी कट्टर दक्षिणपंथी. सुनील दत्त एक कांग्रेसी होते हुए राजनीतिक रूप से भी बालठाकरे के विरोधी थे.

वहीं मुंबई धमाकों के मामलों में नाम आने के बाद शिवसेना संजय दत्त का खुलकर विरोध भी कर रही थी. ऐसे में बाल ठाकरे से मदद मांगना उनके लिए ज़रा भी हक़ की बात नहीं थी. लेकिन बाल ठाकरे के पास नहीं जाने की सभी वजहों को दरकिनार कर सुनील एक पिता बनकर मातोश्री गए.

ये वो दौर था जब महाराष्ट्र में साल 1995 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां चल रही थीं. मातोश्री के बाहर हर समय भारी भीड़ जुटी रहती थी. ऐसे में जब सुनील दत्त मातोश्री पहुंचे, बाल ठाकरे शिवसैनिकों के साथ एक ज़रूरी मीटिंग कर रहे थे. अचानक एक शख्स उनके पास जाता है और उन्हें बताता है कि बाहर सुनील दत्त जी आए हुए हैं. बाल ठाकरे इतना सुनकर उसी वक़्त बैठक ख़त्म कर देते हैं और बाहर आकर सुनील दत्त से मिलते हैं.

सुनील ने जैसे ही बाल ठाकरे को देखा तो उन्होंने यह साफ़ करने में देर नहीं लगाई कि मातोश्री में इस वक़्त जो आदमी बाल ठाकरे के सामने खड़ा है वो एक कांग्रेस का नेता, या जाना माना एक्टर नहीं बल्कि एक पिता है.

इस मुलाकात की बातें जब मातोश्री से बाहर आईं तो पता चला कि सुनील बाल ठाकरे के सामने रो पड़े थे. जैसे एक बेबस पिता होता है, ठीक वैसे ही वो अपनी हर बात बाल ठाकरे को बस कह देना चाहते थे और चाहते थे कि अब उनकी पीड़ा को आराम मिले, उनकी मदद हो जाए. बाल ठाकरे भी उस वक़्त सुनील को ऐसे सुन रहे थे जैसे एक पिता, दूसरे पिता को... कि जैसे उसे किसी और को नहीं बल्कि अपने ही बेटे को बचाना हो. बाल ठाकरे ने ऐसे समय पर, जब सुनील के लिए सभी दरवाज़े बंद हो चुके थे, साथ देने का वादा कर दिया. बताया जाता है कि इसके बाद बाल ठाकरे ने तत्कालीन प्रधान मंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव को फोन कर संजय दत्त को न्याय दिलाने की बात भी कही थी.


 

इतना ही नहीं, संजय दत्त का खुला विरोध दर्ज करा रही शिवसेना के मुखपत्र 'सामना' में संजय के समर्थन में लिखना शुरू कर दिया. संजय दत्त को राजनीतिक मोहरा बनाने की बात को कहते हुए सामना ने यह भी साफ़ किया कि उन्हें ऐसा नहीं लगता कि सुनील दत्त के परिवार का कोई भी सदस्य राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में शामिल होगा. ऐसे में बाला साहेब इकलौते ऐसे नेता थे जो उस दिन मातोश्री में अपनी विपदा सुनाने आए एक बेबस पिता सुनील दत्त के साथ थे.

साल 1995 में शिवसेना और बीजेपी ने मिलकर महाराष्ट्र जीत लिया. जिसके बाद तो जैसे संजय की रिहाई की उम्मीदें जाग चुकी थीं. संजय ने अपना 36वां जन्मदिन भी जेल में ही मनाया. जिसके बाद संजय दत्त को रिहा कराने के लिए कपिल सिब्बल और ललित भसीन ने कोर्ट में एक ताकतवर लड़ाई लड़ी. जिसके परिणाम स्वरुप संजय दत्त को 15 महीनों बाद ज़मानत मिल गई. पांच लाख रुपए और पासपोर्ट जमा करने की शर्त पर संजय 18 अक्टूबर को 'आधी आज़ादी' मिल गई थी.

जेल से बाहर आते ही संजय नंगे पांव मातोश्री की तरफ भागे. संजय को इस समय बाल ठाकरे को शुक्रिया कहना था. गाड़ियों का काफिला सीधे मातोश्री जा पहुंचा. बाल ठाकरे ने संजय को देखते ही गले से लगा लिया. इस मुलाक़ात की तस्वीरें लंबे समय तक चर्चा का विषय बनी रहीं. 

संजय को गले लगाए हुए बाल ठाकरे और पास में खड़े सुनील दत्त... या शायद एक पिता जो अपने बेटे को एक 'नर्क' से निकाल लाया था. इन तस्वीरों ने अब महाराष्ट्र की राजनीति में एक नई हलचल पैदा कर दी थी. हालांकि संजय को अभी सिर्फ ज़मानत मिली थी, वो इस पूरे मामले से आज़ाद नहीं हुए थे. ऐसे में संजय की यह लड़ाई अभी लंबी चलने वाली थी. लेकिन संजय को एक और झटका लगाना बाकी था. 25 मई 2005 में सुनील दत्त, संजय को पूरी तरह से आज़ाद देखने की आस लिए इस दुनिया को अलविदा कह गए. संजय अब इस लड़ाई में अकेले थे.  

संजय की सबसे बड़ी चाहत यही थी कि उन पर लगे 'आतंकवादी' के दाग को मिटा सकें और वो यह साबित कर सकें कि वो इस देश और देश की मिट्टी को उतना ही प्यार करते हैं जितना कि कोई और, वो आतंकवादी नहीं हैं और ना ही उनका मुंबई बम धमाके में कोई हाथ था. एक लंबी लड़ाई के बाद ऐसा हुआ भी, आर्म्स एक्ट में सज़ा सुनते हुए कोर्ट ने संजय से यह कहा भी कि तुम यह सुनना चाहते हो कि तुम टेरेरिस्ट नहीं हो, तो यह कोर्ट कहती है कि तुम टेरेरिस्ट नहीं हो.

संजय हमेशा कहते हैं कि मेरे पिता यह सुनना चाहते थे कि मैं आतंकवादी नहीं हूं, वो मुझे आज़ाद देखना चाहते थे... अब जब मैं आज़ाद हूं तो पापा को याद करता हूं, सोचता हूं कि काश वो सामने होते और वो देख पाते कि उनका बेटा निर्दोष है और आज लंबी चली एक कैद से पूरी तरह से आज़ाद भी है.

दिन... महीने... साल... गुज़रते जाएंगे. इसी कड़ी में इस बार 29 जुलाई को संजय जीवन के 63 साल पूरे कर लेंगे. लेकिन इतने सालों में जो कुछ भी गुज़रा है, वो कहीं न कहीं संजय के भीतर थम गया है. शायद इसीलिए उनकी उदास आंखें आज भी उनसे ज़ियादा बातें करती हैं. संजय दत्त को उनके जन्मदिन की शुभकामनाएं. 

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