scorecardresearch
 

पाकिस्तान, जिसके बनने से ठगे गए 7 मुस्लिम समुदाय

1940 के लाहौर अधिवेशन में जब जिन्ना ने दो कौमी नजरिये और भारत के बंटवारे की बात कही, तभी से ये बात उठने लगी कि मुसलमानों की इतनी बड़ी आबादी को एक हिस्से से उठाकर दूसरे हिस्से में कैसे आबाद किया जाएगा. जिन्ना भी समझने लगे थे कि ऐसा प्रैक्टिकली पॉसिबल नहीं है, लिहाजा वे यह बिल्कुल नहीं चाहते थे कि भारत के सारे मुसलमान पाकिस्तान चले जाएं.

Advertisement
X
पाकिस्तान में कैसे ठगे गए सात मुस्लिम समुदाय
पाकिस्तान में कैसे ठगे गए सात मुस्लिम समुदाय

उर्दू जुबान के शायर असगर सौदाई ने 1943 में एक स्लोगन के जरिये पाकिस्तान को पहचान दे दी थी. 'पाकिस्तान का मतलब क्या, ला इलाहा इलल्लाह' (यानी, पाकिस्तान का मतलब अल्लाह के सिवाय दूसरा कोई खुदा नहीं है). मुसलमानों की खातिर नया मुल्क मांगने में मुहम्मद अली जिन्ना ने कोशिश में कोई कमी नहीं छोड़ी, जो 14 अगस्त 1947 में भारत के बंटवारे के साथ कामयाब हो गई. दुनिया के नक्शे में पाकिस्तान उभर आया. कत्लोगारत के बीच बड़े पैमाने पर मुसलमान भारत से पाकिस्तान गए, और उधर से हिंदू और सिख विस्थापित होकर आए. पाकिस्तान की हुक्मरानी मुसलमानों के हाथ आ गई, जबकि भारत सेक्युलर मुल्क बन गया.

1. जिन्ना ने दी भारतीय मुसलमानों की 'कुर्बानी'

1940 के लाहौर अधिवेशन में जब जिन्ना ने दो कौमी नजरिये और भारत के बंटवारे की बात कही, तभी से ये बात उठने लगी कि मुसलमानों की इतनी बड़ी आबादी को एक हिस्से से उठाकर दूसरे हिस्से में कैसे आबाद किया जाएगा. जिन्ना भी समझने लगे थे कि ऐसा प्रैक्टिकली पॉसिबल नहीं है, लिहाजा वे यह बिल्कुल नहीं चाहते थे कि भारत के सारे मुसलमान पाकिस्तान चले जाएं. बंटवारे की चाह में अंधे हो चुके जिन्ना की जुबान पर 30 मार्च, 1941 को मुसलमानों के मुस्तकबिल का मास्टर प्लान आ ही गया. कानपुर में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि 'आज जहां 7 करोड़ मुसलमान आबादी बहुसंख्यक है, उनकी आजादी के लिए वे भारत के दीगर इलाकों में अल्पसंख्यक होकर रह रहे 2 करोड़ मुसलमानों की शहादत देने के लिए तैयार हैं.' इस तरह पाकिस्तान की नींव जिन्ना ने भारतीय मुसलमानों के एक वर्ग को धोखा देकर रखी. ये और बात है कि भारत ने अपने संविधान में उन्हीं मुसलमानों को बराबर का शहरी माना.

Advertisement

2. बलूचिस्तान को हड़पा, बलोचों से जंग छेड़ दी

पाकिस्तान बनने से पहले बलूचिस्तान आकार ले चुका था. भारतीय उपमहाद्वीप के कई रजवाड़ों में से एक बलूचिस्तान (कलात) को बंटवारे के समय यह आजादी थी कि वे खुद को भारत में मिला दें या, पाकिस्तान में शामिल करा लें. तबके बलोच प्रिंस अहमद यार खान ने 1876 की एक संधि का हवाला देते हुए कहा कि वे अलग रियासत हैं, भारतीय उपमहाद्वीप का कोई हिस्सा नहीं. उनकी दलील मानी गई, लेकिन जिन्ना इस इलाके को हर हाल में पाकिस्तान में मिलाना चाहते थे. आखिर में कलात के खान अहमद यार खान पर दबाव डालकर उनसे पाकिस्तान में शामिल होने का करार करवा लिया गया. यह समझौता कलात के रहने वालों को सख्त नाग़वार गुजरा. बलोच और पाकिस्तान सेना के बीच पहली जंग तभी छिड़ गई. जो आज तक जारी है. लाखों बलोच मारे गए हैं. पाकिस्तान और बलोचों के बीच खूनखराबा इस बात पर भी नहीं रुका कि दोनों एक ही पैगंबर को मानने वाले हैं.

3. बंगाली मुसलमानों को भाषा और कदकाठी के नाम पर मारा

पाकिस्तान में बराबरी का शहरी होने के लिए सिर्फ मुसलमान होना ही काफी नहीं रहा. इसका सबसे बड़ा उदाहरण बने बंगाली मुसलमान. पहले उन्हें भाषा के नाम पर दबाया गया. कहा गया कि पूरे पाकिस्तान की भाषा उर्दू होगी. यह बात बंगाली मुसलमानों को नागवार गुजरी. काफी विरोध प्रदर्शन हुए. 21 फरवरी 1952 को ऐसी ही एक रैली पर गोली चलाई गई, जिसमें 5 युवा मारे गए, और सैकड़ों घायल हुए. अपनी मातृभाषा के लिए मरने का यह अनूठा मामला था. जिसे याद करने के लिए आज भी 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाया जाता है. बंगाली मुसलमानों के साथ सिर्फ भाषायी स्तर पर ही भेदभाव नहीं हो रहा था.

Advertisement

पंजाबी मुसलमान कदकाठी में ऊंचे थे, इसलिए वे बंगालियों को निचले दर्जे का समझते थे. बराबरी का काम नहीं देते थे. 1970 के चुनाव में बंगाली मुसलमानों में लोकप्रिय अवामी लीग को बहुमत मिला. यह नतीजा पश्चिमी पाकिस्तान में लोकप्रिय जुल्फिकार अली भुट्टो (पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी यानी पीपीपी) को मंजूर नहीं हुआ. सेना ने भी पीपीपी का ही साथ दिया. इस बेइमानी से पूर्वी पाकिस्तान में बवाल खड़ा हो गया. जिसे दबाने के लिए सेना ने कोई रियायत नहीं बरती. नरसंहार हुआ. महिलाओं से बलात्कार हुए. बंगाली मुसलमानों को आखिरकार भारत की मदद के बाद पाकिस्तान से मुक्ति मिली.

4. बांग्लादेश की खीझ अहमदिया मुसलमानों पर निकाल दी

1971 के युद्ध में हार के बाद जुल्फिकार अली भुट्टो कठमुल्लों का दिल जीतने में लग गए. सबसे पहले अहमदिया मुसलमानों, जिन्हें कादियानी या लाहोरी ग्रुप भी कहा जाता है, को गैर-मुस्लिम करार दिया गया. इस आदेश को 1974 का सेकंड अमेंडमेंट भी कहा जाता है. अहमदिया समुदाय पैगंबर मोहम्मद को आखिरी पैगंबर नहीं मानता है. 1940 में अहमदिया नेता जफरुल्ला खान ने ही लाहौर रिजॉल्यूशन में पाकिस्तान की मांग को लेकर संकल्प पत्र पेश किया था, जिसे बंटवारे की पहली सीढ़ी भी कहा जाता है. इतना ही नहीं, 1948 में हुई कश्मीर की जंग में अहमदिया समुदाय ने बढ़-चढ़कर पाकिस्तान की ओर से भारत के खिलाफ हिस्सा लिया था. लेकिन, आज वे पाकिस्तान में खुलकर नमाज नहीं पढ़ सकते. वे अपनी इबादतगाह को मस्जिद नहीं कह सकते. यदि उनकी इबादतगाह पर मीनार होती है, तो उसे तोड़ दिया जाता है. वहां से अजान नहीं हो सकती है.

Advertisement
कराची की अहमदिया मस्जिद की मीनारों को सुन्नी मुसलमानों ने तोड़ दिया. (फरवरी, 2023).

5. बिहारी मुसलमानों की दुर्गति

बंटवारे के बाद मुहाजिर मुसलमानों (प्रवासी मुसलमानों) को न पूर्वी पाकिस्तान में चैन मिला, न पश्चिमी पाकिस्तान में आराम. यूपी और बिहार से अपना नया घर तलाशने गए इन मुसलमानों पर दोनों ओर जमकर ज्यादती हुई. खासकर बिहार मुसलमानों को. 1947 के बाद बड़ी तादाद में बिहार मुसलमान पूर्वी पाकिस्तान चले गए. ये ज्यादातर सुन्नी थे, और अपनी पहचान बिहारी ही बताते रहे. बंगाली मुसलमानों के साथ इनकी पटरी जरा भी नहीं बैठ पाई, क्योंकि ये उर्दू बोलते थे. इसी उर्दू के कारण ये पश्चिमी पाकिस्तान के पंजाबी मुसलमानों के नजदीकी बन गए, और बंगाली मुसलमानों पर जुल्म और ज्यादती के हिस्सेदार भी. भारत-पाक युद्ध के बाद जब सत्ता बंगाली मुसलमानों के हाथ आई तो बिहारी मुसलमानों के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. अल्लाह को मानने वाले आपस में एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए. अलग अलग अनुमानों के मुताबिक मुक्ति वाहिनी के हाथों पांच हजार से लेकर पांच लाख बिहारी मुसलमान मारे गए. 1972 में बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने बिहारी मुसलमानों को देश का नागरिक माना, लेकिन पांच लाख मुसलमानों ने पाकिस्तान जाना चुना. लेकिन, उनका दुर्भाग्य ये था कि उन्हें पाकिस्तान ने भी नहीं अपनाया. बिहारी मुसलमानों में से बहुतायत ने फिर रेड क्रॉस के रिफ्यूजी शिविरों में जगह ली. बाद में फिर इनमें से कुछ वापस घुसपैठ करके भारत के असम, बंगाल और पूर्वी बिहार के जिलों में आ बसे.

Advertisement

6. कश्मीरी मुसलमानों को बर्बादी का इनसेंटिव

'कश्मीर बनेगा पाकिस्तान', एक नारा जो कश्मीर के कट्टरपंथी मुसलमानों ने खूब लगाया. इसके वास्ते उन्हें पाकिस्तान से पैसा मिला, और हथियार भी. कश्मीर घाटी में मुसलमानों की तीन पीढि़यों को आतंक के हवाले करके पाकिस्तान ने ऐसा गंदा खेल खेला, जिसमें हजारों मांओं की गोद उजड़ी. कश्मीर के अलगाववादी नेताओं को पैसा देकर पाकिस्तान ने घाटी के युवाओं के खून से होली खेली. आतंक के कारोबार में उसने कश्मीर को एक दुकान की तरह इस्तेमाल किया. और वहां के युवाओं को ग्राहक. इस्लाम के नाम पर युवाओं का ब्रेनवॉश करवाया और उन्हें आतंक की राह पर धकेला. वे कभी निर्दोषों की हत्या करते तो कभी सेना पर पत्थर बरसाते. धारा 370 हटने के बाद आतंक के प्रति जीरो टॉलरेंस पॉलिसी के बाद से पाकिस्तान ठंडा बैठ गया है.

7. शिया मस्जिदों में यूं ही नहीं फटते हैं बम

पाकिस्तान की आबादी में 17 फीसदी शिया मुसलमान हैं. लेकिन, Pew रिसर्च के एक सर्वे के मुताबिक 41 फीसदी पाकिस्तानी शियाओं को मुसलमान नहीं मानते हैं. वैसे, दुनिया में शिया-सुन्नी विवाद नया नहीं है. लेकिन, पाकिस्तान में इसका उभार 70 के दशक से होता है. भुट्टो से सत्ता छीनकर पाक सेनाध्यक्ष जियाउल हक ने मार्शल लॉ लगा दिया, और देश में सुन्नी मुसलमानों का निजाम लागू कर दिया. स्कूलों के सिलेबस बदल दिए गए. सुन्नी मदरसे सत्ता का केंद्र बनने लगे. पाकिस्तानी सोसायटी पर सुन्नियों का प्रभाव अपने चरम पर पहुंच गया. यहां तक शियाओं को ज्यादा परेशानी नहीं हुई. लेकिन 1979 ईरान में इस्लामिक क्रांति हो गई. यहां एक शिया कट्टरपंथी धर्मगुरु अयातुल्ला खुमैनी के पास सत्ता आ गई. पड़ोस में शिया प्रभुत्व देख पाकिस्तान के सुन्नी हुक्मरान सहम गए. और उन्होंने शियाओं को हाशिये पर धकेलना शुरू कर दिया. क्रांति के बाद से ईरान काफी समय इराक युद्ध और फिर पश्चिमी देशों की राजनीति में उलझा रहा. लेकिन, पाकिस्तान में शियाओं को कोई रियायत नहीं मिली. उन्हें निशाना बनाया जाता रहा है. खासकर उनकी मस्जिदों को.

Advertisement
शिया मस्जिद ब्लास्ट (22 मार्च)
शिया मस्जिद ब्लास्ट (मार्च 2022)

पाकिस्तान की नींव में है गफलत की ईंटें

मुसलमानों के लिए अलग मुल्क मांगते रहे जिन्ना पाकिस्तान बनाने से ठीक पहले अचानक 'सेक्युलर' हो गए. 11 अगस्त 1947 के भाषण में कहते हैं- 'आप स्वतंत्र हैं. आप स्वतंत्र हैं अपने मंदिरों में जाने के लिए. आप स्वतंत्र हैं अपनी मस्जिदों में जाने के लिए और पाकिस्तान राज्य में अपनी किसी भी इबादतगाह में जाने के लिए. आपके संबंध किसी भी धर्म जाति या नस्ल से हों, राज्य को इससे कोई लेना-देना नहीं है.' लेकिन, जिन्ना की बात जमीनी स्तर पर किसी ने नहीं मानी. शायद जिन्ना भी नहीं चाहते थे. 1949 में एक प्रस्ताव के जरिये इतना जरूर माना गया कि पाकिस्तानी स्टेट का रिलीजन इस्लाम रहेगा. जबकि, भारत ने 1950 में खुद को संवैधानिक रूप से सेक्युलर देश घोषित कर दिया. जबकि उधर पाकिस्तान में संविधान बनाने की कवायद 1956 तक चलती रही. न वो सुकलर होना चाहता था, और न ही इस्लामी कानून लागू करने को तैयार था. आखिर, संविधान लागू होने के साथ पाकिस्तान को मिली नई पहचान- 'इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान'. और हिंदू सहित तमाम गैर-मुस्लिम दूसरे दर्जे के नागरिक बना दिए गए. 1971 में भारत-पाक युद्ध के बाद पाकिस्तान में हालात ऐसे बने कि सेक्युलरिज्म को वहां कब्र भी नसीब नहीं हुई. गैर-मुस्लिम समुदायों को तो छोड़ ही दीजिये.

Advertisement

अब तो दो अपवादों का भी नहीं बचा पाकिस्तान

पाकिस्तान पर नजर रखने वाले दानिशवर कहते हैं कि पाकिस्तान में दो ही कम्युनिटी फली-फूली हैं. एक, जमींदार और दूसरे, वर्दी वाले. आजादी मिलने के बाद भारत ने जहां सबसे पहले भूमि सुधार कानून लाकर जमींदारी प्रथा को खत्म किया था. वहीं पाकिस्तान ने इसे बदस्तूर जारी रखा. एक बारगी तो ऐसा लगा कि मानो जमींदारों के लिए यह मुल्क बनाया गया था. पंजाब के रईसों और यूपी से गए नवाबों ने पाकिस्तान की जमीन आपस में बांट ली. लिहाजा, वहां जमींदार रहे, या फिर निचले तबके के गरीब. जी हां, पाकिस्तान में मिडिल क्लास एक लंबे वक्त तक नहीं रहा. आज भी वह कुछ फुटकर शहरों तक सीमित है. 

पाकिस्तान से फायदा उठाने वाली दूसरी कम्युनिटी रही सेना. यानी, वहां के वर्दी वाले. सत्ता से लेकर कोराबार तक सब पर उनकी मोनोपॉली रही. बिना किसी जवाबदेही के. लेकिन, पिछले अरसे में पाकिस्तान से जो दृश्य सामने आए हैं, उसमें यही जमींदार एक दूसरे के जान के प्यासे हो रहे हैं. जिस वर्दी के खौफ से पाकिस्तान में कोई चूं नहीं करता था. आज उन्हीं वर्दी वालों के घर जलाए जा रहे हैं. यूं तो दुनिया में कोई मुल्क परफेक्ट नहीं है, लेकिन पाकिस्तान तो शर्तिया फेल्ड स्टेट है. अल्लाह के नाम पर बना मुल्क जब अल्लाह को मानने वालों को नहीं हो पाया, तो किसका होगा?  मुल्क में हिस्सेदारी इस बात पर तय हुई कि अल्लाह को किस कुनबे से और किस कूचे से कौन आवाज दे रहा है. शायद इसी वजह से पाकिस्तान एक नेशन-स्टेट नहीं बन पाया. भारत से नहीं तो पाकिस्तानी हुक्मरान कम-से-कम बांग्लादेश से तो सीख ही सकते थे कि देश कैसे बनाते हैं.

Advertisement
Advertisement