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बेटी की बगावत और पिता की चुप्पी: KCR की पार्टी को कितना नुकसान पहुंचाएगी कविता?

अब सवाल ये है कि ये नई राजनीतिक चाल कितनी दूर तक जाएगी और तेलंगाना की पहले से भीड़ भरी राजनीति को कैसे प्रभावित करेगी? सामने से देखें तो कविता के सामने सबसे बड़ी चुनौती अगले तीन साल तक अपनी राजनीतिक ऊर्जा बनाए रखने की होगी क्योंकि विधानसभा चुनाव दिसंबर 2028 में हैं. साथ में ये खतरा भी है कि वो बहुत जल्दी अपने चरम पर पहुंच जाएं.

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BRS से अलग होकर कविता का नया रास्ता (Photo: ITG)
BRS से अलग होकर कविता का नया रास्ता (Photo: ITG)

तेलंगाना विधान परिषद के सदन में भावनाओं का ज्वार, दर्द, नाराजगी के साथ के. कविता ने व‍िदाई ली. फूट-फूटकर रोते हुए वो सदन को अलविदा कह रही थीं. बता दें कि बीआरएस से निलंबन के बाद उन्होंने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया था. कुछ ही देर बाद वो तेलंगाना विधानसभा के बाहर स्थित गन पार्क पहुंचीं, वही जगह जो तेलंगाना आंदोलन की पहचान रही है और वहां उन्होंने ऐलान कर दिया कि वो जल्द ही अपनी नई राजनीतिक पार्टी शुरू करेंगी.

असल में ये सब पहले से तय स्क्रिप्ट जैसा ही था. अगस्त 2024 में दिल्ली की तिहाड़ जेल में पांच महीने बिताने के बाद उनकी रिहाई हुई. इसके बाद कविता ने शुरू से ही आक्रामक राजनीति की राह अपनाई. उन्होंने अपनी ही पार्टी के बड़े नेताओं पर निशाना साधा जिनमें उनके चचेरे भाई हरीश राव (तेलंगाना के पूर्व वित्त मंत्री) और जे. संतोष कुमार (पूर्व राज्यसभा सांसद) शामिल थे.

उनके लगातार हमलों से बीआरएस नेतृत्व असहज होने लगा. आखिरकार पार्टी प्रमुख और उनके पिता के. चंद्रशेखर राव ने सख्त फैसला लिया. वो पार्टी से बाहर हो गईं. लेकिन, पार्टी से निकाले जाने के बाद कविता के तेवर और भी तीखे हो गए जिससे बीआरएस बैकफुट पर आ गई. पार्टी के नेता कविता पर खुलकर हमला करने से बचते रहे क्योंकि वो पार्टी प्रमुख की बेटी हैं. यही वजह रही कि कविता को खुलकर वार करने की छूट मिलती गई जबकि बीआरएस की जवाबी रणनीति फीकी पड़ती रही.

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ये लगभग तय था कि कविता बीआरएस जैसी ही एक नई पार्टी बनाएंगी. उन्होंने तेजी से कदम बढ़ाए और तेलंगाना जागृति के नाम से अपने सांस्कृतिक संगठन के दफ्तर को राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बनाना शुरू कर दिया. ये दफ्तर बीआरएस मुख्यालय से कुछ ही दूरी पर है और यही कविता की नई राजनीति का कंट्रोल सेंटर बनने वाला है. इसके साथ ही उनका पहनावा और अंदाज भी बदल चुका है. अब वो पूरी तरह ग्रामीण तेलंगाना नेता की छवि में दिख रही हैं.

अब सवाल ये है कि ये नई राजनीतिक चाल कितनी दूर तक जाएगी और तेलंगाना की पहले से भीड़ भरी राजनीति को कैसे प्रभावित करेगी? सामने से देखें तो कविता के सामने सबसे बड़ी चुनौती अगले तीन साल तक अपनी राजनीतिक ऊर्जा बनाए रखने की होगी क्योंकि विधानसभा चुनाव दिसंबर 2028 में हैं. साथ में ये खतरा भी है कि वो बहुत जल्दी अपने चरम पर पहुंच जाएं.

उनके ज्यादातर हमले सिर्फ बीआरएस पर केंद्रित हैं जिससे उनकी राजनीति एक-आयामी लग सकती है. कुछ वैसा ही जैसा लक्ष्मी पार्वती के साथ हुआ था, जिनकी राजनीति एनटी रामाराव और चंद्रबाबू नायडू के टकराव से आगे नहीं बढ़ पाई. सोमवार को भी कविता ने यही कहा कि पार्टी में उन्हें लगातार अपमानित किया गया और बीआरएस का संगठनात्मक ढांचा मजाक बन चुका है. अब वो बीआरएस के पूरे दस साल के शासन पर ही सवाल उठा रही हैं, ऐसे में पार्टी के लिए उनके आरोपों को नजरअंदाज करना मुश्किल हो गया है.

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इसी वजह से बीआरएस को शक है कि कविता के हमलों के पीछे कोई राजनीतिक 'गॉडफादर' भी हो सकता है. उनकी पार्टी बीआरएस की ही नकल जैसी दिखेगी और लक्ष्य होगा केसीआर के तेलंगाना भावनाओं वाले वोट बैंक में सेंध लगाना. कविता के साथ जुड़ने वाले लोग अधिकतर बीआरएस के वे दूसरे दर्जे के नेता हो सकते हैं जिन्हें पार्टी में आगे बढ़ने का मौका नहीं मिला. चुनाव के वक्त कविता बीआरएस से नाराज वोटों को काट सकती हैं.

सबसे बड़ी चुनौती धारणा की है. कविता आरोप लगा रही हैं कि उनके परिवार के प्रभावशाली लोगों ने तेलंगाना की मूल भावना से भटककर भ्रष्टाचार किया. ऐसे में सवाल उठना तय है, अगर उन्हें सब पता था तो उन्होंने बीआरएस शासन के दौरान चुप्पी क्यों साधी? वो तो अपने पिता और भाई तक सीधे पहुंच रखती थीं या फिर ये सब सत्ता और पद न मिलने की नाराजगी का नतीजा है?

कविता को एक राजनीतिक मौका बीआरएस के नाम बदलने में दिखता है. दिसंबर 2022 में केसीआर ने तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) का नाम बदलकर भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) किया ताकि पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर फैले. लेकिन बीआरएस, बाहुबली या पुष्पा जैसी तेलुगु फिल्मों की तरह हैदराबाद से बाहर असर नहीं दिखा पाई. साल 2023 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी. दिलचस्प बात ये है कि नाम बदलने के दिन कविता ने इस फैसले का स्वागत किया था, लेकिन अब वो इसे गलत मानती हैं. उन्हें लगता है कि शुद्ध तेलंगाना पहचान वाली पार्टी ही कांग्रेस, भाजपा और बीआरएस तीनों से मुकाबला कर सकती है.

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अपनी सीमाओं को समझते हुए कविता अब पिछड़ा वर्ग (बीसी) आरक्षण के मुद्दे पर दांव आजमा रही हैं. उनका फोकस उन वर्गों पर है जो बीआरएस और कांग्रेस दोनों से नाराज हैं, खासकर उत्तर तेलंगाना में. उनकी एक अलग पहचान भी है. वो फाइटर के तौर पर दिखती हैं जबकि उनके भाई केटीआर को हमेशा शहरी और सॉफ्ट नेता की छवि में पेश किया गया.

...तो क्या बीआरएस को चिंता करनी चाहिए? जवाब होगा- बिल्कुल. बड़े भ्रष्टाचार के आरोप '2014 से 2023 तक सुनहरे तेलंगाना' के दावे को कमजोर कर सकते हैं. इससे कांग्रेस और भाजपा दोनों को फायदा होगा क्योंकि बीआरएस अंदरूनी पारिवारिक कलह में उलझी रहेगी.

कविता इसलिए भी असरदार हो रही हैं क्योंकि केसीआर पिछले दो साल में बेहद कम सार्वजनिक रूप से दिखे हैं. लोकसभा चुनावों में भी उनका अभियान फीका रहा. जैसे-जैसे केटीआर और हरीश राव पार्टी के चेहरे बनते जाएंगे, कविता के हमले असर पकड़ते जाएंगे. बीआरएस को अपना वोट बैंक कटने से बचाना है तो केसीआर को फिर से खुद आगे आकर पार्टी की कमान संभालनी होगी. बीते दो साल की 'बैकसीट ड्राइविंग' ने पार्टी को लगातार नुकसान ही पहुंचाया है.

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