दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी को नया राष्ट्रीय अध्यक्ष मिल गया है. नितिन नबीन को इस अहम जिम्मेदारी के लिए चुना गया है और वे पार्टी के अब तक के सबसे युवा अध्यक्ष हैं. इसके लिए उन्हें बधाई. नबीन का उभार इस बात का संकेत है कि बीजेपी आज भी ऐसे कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाती है जो चुपचाप काम करते हैं और नतीजे देते हैं.
लेकिन हैरानी की बात यह रही कि उस पार्टी में, जहां पंचायत से लेकर नगर निगम तक के टिकट के लिए कड़ा मुकाबला होता है, राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद के लिए कोई मुकाबला ही नहीं हुआ.
अध्यक्ष पद के लिए दाखिल हुईं सभी 37 नामांकन नितिन नबीन के नाम पर थीं. यानी फैसला पहले से तय था. ये हाईकमान की पसंद थी. और यहीं से सवाल उठते हैं.
सबसे पहले एक बात साफ होनी चाहिए, बीजेपी अध्यक्ष ही हाईकमान नहीं होता. ये स्थिति कांग्रेस से अलग नहीं है जहां पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे खुद कहते हैं कि अहम फैसले हाईकमान लेता है. फर्क सिर्फ इतना है कि कांग्रेस में हाईकमान वंशानुगत है, जबकि बीजेपी में शीर्ष नेतृत्व आमतौर पर चुनाव जीतकर आगे बढ़ता है. लेकिन बीजेपी कभी कांग्रेस जैसी पार्टी बनने के लिए नहीं बनी थी. वो खुद को 'पार्टी विद अ डिफरेंस' कहती रही है.
अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री कार्यकाल (1998-2004) में बीजेपी के चार राष्ट्रीय अध्यक्ष बदले. हालांकि संगठन की बारीक जिम्मेदारियों में लालकृष्ण आडवाणी की बड़ी भूमिका रही लेकिन तब पार्टी में कई कद्दावर नेता थे, जनाधार वाले नेता, संसद के अनुभवी चेहरे और संगठन से निकले दिग्गज.
अब 2025–26 की तस्वीर बिल्कुल अलग है.
कार्यकारी अध्यक्ष बनने से पहले नितिन नबीन का नाम बिहार और छत्तीसगढ़ से बाहर बहुत कम लोगों ने सुना था. यहां तक कि बिहार बीजेपी के कई वरिष्ठ नेता भी इस फैसले से चौंक गए.
नबीन का उभार गलत नहीं है. छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव और फिर 2024 के लोकसभा चुनाव में उनकी भूमिका प्रभावशाली रही. वे कायस्थ समुदाय से आते हैं, जिसकी बिहार की ओबीसी-प्रधान राजनीति में हिस्सेदारी महज एक फीसदी के आसपास है. ये बीजेपी की दीर्घकालिक सामाजिक इंजीनियरिंग का हिस्सा भी हो सकता है और ये भी कि संगठन में फैसले अब ऊपर से नीचे तय होते हैं.
बीजेपी के 45 साल के इतिहास में कभी अध्यक्ष पद के लिए मुकाबला नहीं हुआ. हमेशा 'सर्वसम्मति' से नाम तय किया गया. औपचारिक प्रक्रिया जरूर होती है जैसे सदस्यता अभियान, फिर मंडल, जिला, क्षेत्र और राज्य स्तर के चुनाव. लेकिन शीर्ष पद पर पहुंचते-पहुंचते मतभेद गायब हो जाते हैं.
पार्टी विद अ डिफरेंस यानी असहमति रखने वाली पार्टी में अब कोई डिफरेंस नहीं बचा है. अब जो है, वो है परंपरा, प्रतिष्ठा और अनुशासन.
फिर सवाल उठता है अगर मुकाबला होना ही नहीं है, तो नामांकन और वापसी की तारीखें क्यों होती हैं? जवाब शायद यही है कि भारत में लोकतंत्र में प्रक्रिया निभाना भी एक रस्म, एक परंपरा है.
जैसे नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने से पहले संसदीय दल का नेता चुना जाना जरूरी होता है. राज्यों में मुख्यमंत्री चुनने की भी यही औपचारिकता बार-बार दोहराई जाती है. नतीजा पहले से तय होता है, लेकिन प्रक्रिया निभाई जाती है क्योंकि यही परंपरा है.
क्षेत्रीय और पारिवारिक दलों से आंतरिक लोकतंत्र की उम्मीद करना शायद बेमानी हो. लेकिन जब बीजेपी और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियों में भी वास्तविक आंतरिक लोकतंत्र न हो, तो यह चिंता का विषय है.
2022 में शशि थरूर ने कांग्रेस को मजबूर किया कि वह 20 साल बाद अध्यक्ष पद के लिए चुनाव कराए. नतीजा तय था, फिर भी एक चुनाव हुआ. थरूर की टीम ने उस चुनाव में भी खामियों की ओर इशारा किया. लेकिन कम से कम एक औपचारिक लोकतांत्रिक अभ्यास तो हुआ.
कांग्रेस के पास G-23 था.
बीजेपी के पास है ‘हां जी’ समूह.
यही वजह है कि इतने विशाल संगठन और मजबूत ढांचे के बावजूद बीजेपी में शशि थरूर जैसा असहज सवाल पूछने वाला नेता नहीं दिखता.
और पार्टी विद अ डिफरेंस (difference) अब धीरे-धीरे पार्टी विद डिफरेंस (deference) बन चुकी है यानी बाकियों से अलग सोच वाली पार्टी अब बिना सवाल आज्ञा निभाने वाली पार्टी बन गई है.
नितिन नबीन एक प्रभावी पार्टी अध्यक्ष साबित होंगे या नहीं, यह वक्त बताएगा.
लेकिन यह भी संभव है कि उन्हें यह साबित करने का पूरा मौका ही न मिले.