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10 मिनट की चुल्ल क्यों? मस्त में रहने का

भारत अब 'तुरंत' के पागलपन से तंग आ चुका है. ब्लिंकिट और ज़ोमैटो अब 10 मिनट में 'स्विगी' नहीं कर सकते. और अगर वे ऐसा करते भी हैं, तो वे इसे अपनी खासियत नहीं बता सकते. भारत किसी भी काम को तेजी से करने के लिए कुछ खास नहीं जाना जाता. लेकिन अब जब सरकार ने बोल दिया है, तो हमें उन कुछ 'इंस्टेंट' कामों में समय लगाना सीखना होगा जिनकी हमें खतरनाक आदत पड़ गई थी.

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'10 मिनट डिलीवरी' के पागलपन को रिजेक्ट करने की जरूरत है. (Photo: ITG)
'10 मिनट डिलीवरी' के पागलपन को रिजेक्ट करने की जरूरत है. (Photo: ITG)

मकर संक्रांति वह समय है जब सूरज दक्षिण से उत्तर, और पूर्व से पश्चिम की ओर प्रस्थान करता है. सूरज देवता की इस बदली चाल को हम अलग-अलग नामों वाले त्योहार के रूप में मनाते हैं. उत्तर प्रदेश में  लोग इसे खिचड़ी कहते हैं, यह एक स्वादिष्ट भोजन है, जिसे बड़े मनोयोग से पकाया जाता है. कहा जाता है कि बीरबल ने अकबर के दरबार में इसे ऐसे पकाया कि एक कहानी बन गई. इसमें काफी वक्त लगा था. तभी से 'बीरबल की खिचड़ी' वाली कहावत कही जाने लगी. खासतौर पर तब जब कई डेडलाइन डेड होने लगे. 

हम एक धीमे-धीमे खाने वाली कौम हैं.  हम एक धीमे चलने वाले देश के नागरिक हैं. एशियाई बाघ कहलाते हैं, चीनी ड्रैगन, तो भारतीय हाथी हैं. आज हमें उस हाथी को संबोधित करना ही होगा जो 'एलिफेंट इन द रूम' है. यानी सबसे बड़ा मुद्दा. चलिए, श्री गणेश करते हैं! 

भारत वह भूमि है जहां दूध वाली चाय घंटों धीमी आंच पर उबलती रहती है, ट्रैफिक जाम हमारे सब्र का इम्तिहान लेता है. और निहारी पूरी रात धीमी आंच पर पकती रहती है. लेकिन कुछ ही सालों में हम एक ऐसा देश बन गए हैं जो दम बिरयानी सिर्फ 10 मिनट में मांगता है? सोशल मीडिया पर छोटी-छोटी रील्‍स की खुराक ने हमारे फोकस को तो खत्म कर ही दिया है, अब हमारा सब्र भी जवाब दे रहा है. इसीलिए अब क्विक डिलीवरी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स उभरे हैं. आप 'जल्दी आना भैया' कह भी नहीं पाते और ये आपके दरवाजे पर होते हैं.

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लेकिन शुक्र है, डिलीवरी वाले भाइयों ने वादा किया था, जिसे सरकार ने आखिरकार डिलीवर कर दिया. बेहद ऊर्जावान डिलीवरी ऐप्स पर ब्रेक लगाने के लिए सरकार को शाबाशी. सरकार ने गिग वर्कर्स की भलाई का हवाला देते हुए आदेश दिया, 'बंद करो 10 मिनट का प्रॉमिस'. एप्स ने इतनी तेजी से ये बात मान ली कि आप 'भैया थोड़ा आराम से चलाया करो' भी नहीं कह पाए.

लेकिन यहीं क्यों रुके? अगर हम झूठी जल्दबाजी के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं, तो आइए इस तेजी के कल्चर में आम दोषियों को पकड़ें. मैगी के '2-मिनट नूडल्स'? फेविक्विक का 'इंस्टेंट ग्लू'? माइक्रोवेव की दीवानी हमारी दुनिया में जो सब कुछ हो रहा है उसका तो बस ये एक छोटा सा हिस्सा है. सच कहूं तो 10 मिनट में किसी को क्या चाहिए, जब तक कि आप कोई बम डिफ्यूज न कर रहे हों?

चलिए मैगी से शुरू करते हैं, वह चालाक स्विस-इंडियन शातिर जो क्विक फिक्स होने का नाटक करती है. हर पैकेट पर लिखा होता है 2-मिनट में नूडल्स. हम कोई कुकिंग शो के कंटेस्टेंट नहीं हैं जिसे गॉर्डन रैमसे का जुड़वा जज कर रहा हो. और हां, उन नूडल्स को खाने लायक नरम होने में कम से कम चार से पांच मिनट लगते हैं, जब तक कि आपको रबर बैंड चबाना पसंद न हो. और 'मैजिक मसाला' के बारे में तो बात ही मत करो. मैं ऐसे पैकेट से कोई लज्‍जतदार दावत की उम्मीद नहीं करता जो ऐसा लगता है जैसे किसी हैंगओवर वाले इंटर्न ने डिज़ाइन किया हो. सरकार को दखल देना चाहिए! इसका नाम बदलकर 'जब तैयार हो नूडल्स' कर देना चाहिए.

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'पानी उबालें (5 मिनट), नूडल्स डालें (3 मिनट), बीच-बीच में हिलाते रहें... वाह! अब टाइमफ्रेम में ऐसा डिनर तैयार है जो आपकी इंसानियत का सम्मान करता है!'

फिर है फेविक्विक, जो असल में जल्दबाजी का लिक्विड फॉर्मेट है, जो गोंद होने का नाटक करती है. इसका दावा है 'बॉन्ड इन सेकेंड्स!' उन पलों के लिए एकदम सही जब आप दादी का गुलदस्ता तोड़ देते हैं और उनके देखने से पहले आपको मासूमियत का नाटक करना होता है. लेकिन सच में, इतनी जल्दी? क्या होगा अगर मैं अपने DIY डिजास्टर पर दोबारा सोचना चाहूं और उसे इश्क के मुजस्सिमा की तरह एक कलाकृति में बदलना चाहूं? 

मुझे ऐसा गोंद चाहिए जो चिपकाने में 10 मिनट ले. इतना समय कि मैं ज़िंदगी के फैसलों पर सोच सकूं. थोड़ी चाय पी सकूं. या यह स्‍वीकार कर सकूं कि मुझे किसी प्रोफेशनल को बुलाना चाहिए था. इस तेज-तर्रार वाले पागलपन में हम सांकेतिक और सचमुच में अपनी उंगलियां चिपका रहे हैं.  इतनी जल्दी क्यों? जब तक आप सलमान खान नहीं हैं और YRF की जासूसी फिल्म के एक एक्शन सीक्वेंस में हों, कुछ एक्स्ट्रा मिनट आपको मार नहीं डालेंगे. 

डोमिनोज़ के '30 मिनट में या फ्री' पिज़्ज़ा के वादे पर बात करें. आप इसे 20 मिनट में चाहते हैं, और आप यह भी चाहते हैं कि यह अच्छा हो. है ना? जल्दी से आटा गूंथकर ओवन में डालें, बॉक्स में पैक करके अगले ही मिनट डिलीवर करने से ज़्यादा 'क्वालिटी' और कुछ नहीं हो सकता. हां, यह गर्म और चीज से भरा होता है, लेकिन क्या यह म्युनिसिपल सड़कों पर गड्ढों के बीच डिलीवरी वाले लड़के की जानलेवा स्टंट के लायक है? Amazon की 'सेम-डे डिलीवरी' है, जो आपकी जल्दबाजी में खरीदी हुई बेकार चीज़ों को एक बुरे सपने में बदल देती है, और इससे पहले कि आपको खरीदने का पछतावा हो, वह आपके दरवाज़े पर होती है. एक दिन इंतज़ार करें. अपनी ज़िंदगी के बारे में सोचें. खुद न बुनें, लेकिन क्या आपको सच में इसकी ज़रूरत है सिर्फ इसलिए कि उस पर लाल मेपल का पत्ता है? क्या आप कैनेडियन हैं या अक्षय कुमार?

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उन '5-मिनट एब्स' वर्कआउट को भी न भूलें, जिन्हें इंस्टाग्राम के 'रामदेव' जैसे लोग बेचते हैं. जिनके शरीर अजीब तरह से तराशे हुए होते हैं. पांच मिनट? प्लीज़. उतने समय में तो आप Amazon के डिब्बों और Blinkit के कागज़ के थैलों के ढेर के नीचे अपना योगा मैट भी मुश्किल से ढूंढ पाएंगे. असली एब्स बनाने में महीनों तक हर दिन घंटों लगते हैं, पसीना बहाना पड़ता है, और समोसे छोड़ने पड़ते हैं.

हमें 'इंस्टेंट मैसेजिंग' की इतनी आदत हो गई है कि अगर आप नैनोसेकंड में जवाब नहीं देते, तो आपको 'गुमशुदा' का टैग मिल जाएगा. ईमेल एक क्रांति थी. अब यह बहुत धीमा है. यार, ईमेल कौन इस्तेमाल करता है? मेरा फोन हर 10 सेकंड में पिंग करता है. मैं पूरे दिन पोंग बॉल की तरह WhatsApp ग्रुप्स के बीच घूमता रहता हूं. क्योंकि फास्ट लेन की गलियों से गुजरती जिंदगी ने  GPS को खराब कर दिया है.

अब एक स्पीड डेटिंग भी होती है? आपको 35 वर्षों में जो सोलमेट नहीं मिला, उसे ढूंढने के लिए 10 मिनट लगाते हैं? यह रोमांस नहीं है. यह 'डेस्परेट मेजर्स' नाम के रियलिटी शो के लिए ऑडिशन है. इंस्टेंट कॉफी के ज़माने का प्यार. क्योंकि बीन्स को ग्राइंड करने, धीरे-धीरे कॉफी बनाने और खुशबू का मजा लेने का टाइम नहीं है. क्योंकि हम सब घड़ी के गुलाम हैं.

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हर चीज को 10 मिनट में पाने की यह दीवानगी क्यों? कुछ खास मामलों में, जैसे CPR या फ्लाइट पकड़ने के लिए तो यह ठीक है. लेकिन हर ऑर्डर के लिए? मैंने Maska Chaska ऑर्डर किया, और वह 11 मिनट में आ गया. यह बड़ा अजीब है. क्योंकि डाइजेस्टिव बिस्किट, Maska Chaska नाम की नमकीन पुदीने वाली चीज से ज़्यादा हेल्दी होते हैं. लेकिन नहीं, मुझे MC चाहिए. मुझे MC चाहिए और अभी चाहिए. यह 'फास्ट लाइफ' एक स्कैम है जिसे कंपनियां हमें बहुत तेजी से चीज़ें खरीदने के लिए बेच रही हैं, और इस चक्कर में वर्कर्स और धरती दोनों को नुकसान पहुंचा रही हैं. गिग ड्राइवर सस्ते शूमाकर की तरह गलियों में मस्‍तचाल वाली इलेक्ट्रिक हरी बाइक को फॉर्मूला वन की तरह दौड़ा रहे हैं. डार्क स्टोर 'इंस्टेंट' परोस रहे हैं, यह सब थकावट की परफेक्ट रेसिपी है. कछुए और खरगोश की कहानी याद है? धीरे धीरे और लगातार चलने वाला जीतता है, न कि वह खरगोश जो ज़्यादा भागदौड़ की वजह से मुंह के बल गिर जाता है.

चूंकि सरकार को यकीन है कि हर चीज में दखल देना चाहिए. तो क्या हम '15-मिनट नूडल्स' का नियम बना सकते हैं ताकि मैगी पकते समय हम थोड़ी देर की झपकी ले लें. यह मानते हुए कि वो 'झपकी' भी किसी दार्शनिक ठहराव के बाद रिश्ते से जुड़ी है. 'जब ड्राइवर को सुरक्षित लगे, तब' के समय पर डिलीवरी होगी. इससे एक्सीडेंट कम होंगे. नूडल्स नरम रहेंगे. और शायद पड़ोसियों से बात करने का भी वक्त मिले. बजाय उस लाल स्कूटर आइकन को बार-बार टैप करके चेक करने के कि 'भइया पहुंच गए क्या?' 'फास्ट फूड' का नाम बदलकर रख दो ' फूड जिसके लिए आप बाद में पछताएंगे.' कौन मेरे साथ है? हाथ उठाओ... जब मन करे, कोई जल्दी नहीं!

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