उत्तर कोलकाता की गलियों में चलना किसी भाप से भरे सपने में चलने जैसा है. हवा में उबलते दूध की खुशबू है, चीनी-मिट्टी के बर्तनों की खनक है. माहौल रोमांटिक है, नॉस्टैल्जिक है और अगर ईमानदारी से कहा जाए तो ठहरा हुआ भी है.
अब जरा करीब 1,600 किलोमीटर पश्चिम की ओर नजर घुमाते हैं. बीकानेर की तरफ. यहां हवा में भाप की हल्की खुशबू ही नहीं, बल्कि खौलते घी, गेहूं, चावल, तिल, गोंद, मूंग दाल और भूने हुए बेसन की महक है.
बंगाली मिठाई मेन्यू का मिथक
दशकों से बंगाली बुद्धिजीवियों ने एक मिथक को सहेजकर रखा है कि कोलकाता ‘भारत की मिठाई राजधानी’ है. सुनने में यह बात अच्छी लगती है, लेकिन तथ्यात्मक रूप से यह दावा खोखला है.
असलियत यह है कि कोलकाता छेना (दही किया हुआ दूध) की राजधानी है, मिठाई की नहीं. यह एक स्पेशलिस्ट मेन्यू है. इसके उलट, बीकानेर एक ऐसा पाक-कला साम्राज्य है जिसने रेत और मजबूरी से एक ग्लोबल इंडस्ट्री खड़ी कर दी.
छेना ट्रैप में फंसा बंगाल
बंगाली तर्क हमेशा इतिहास से शुरू होता है. वे इस बात का जिक्र नहीं करते कि डच लोग दूध को फाड़ने की तकनीक को ईस्ट इंडिया में लेकर आए थे. वे बात करते हैं नोबिन चंद्र दास की, जिन्हें लेखक 'छेना का एडिसन' कहता है.
1868 में उन्होंने यह खोज की कि फटे हुए दूध से निकले अवशेष को भुरभुरा नहीं, बल्कि स्पंजी कैसे बनाया जा सकता है. रसगुल्ला का आविष्कार निस्संदेह प्रतिभा का कमाल था. यह पहली बार था जब भारतीय मिठाई भारी, ठोस बनावट से हटकर हल्की और फूली हुई बनी. लेकिन समस्या यहीं से शुरू होती है. बंगाल इसके आगे बढ़ ही नहीं पाया.
1868 से वहीं अटका स्वाद
1868 के बाद से बंगाली मिठाइयों का संसार एक हाई-मॉइश्चर बुलबुले में कैद हो गया. चाहे संदेश हो, रस मलाई हो या छेना पोड़ा- बेस वही, टेक्सचर वही और शेल्फ लाइफ भी वही. कुछ घंटों में खत्म.
सिर्फ एक सामग्री को परफेक्ट कर लेने से किसी शहर को 'मिठाई राजधानी' कहना वैसा ही है जैसे कोई शहर दुनिया के सबसे अच्छे टायर बनाए और उसे 'कार कैपिटल' कह दिया जाए. टायर इंडस्ट्री का हिस्सा है, पूरी इंडस्ट्री नहीं.
रेगिस्तान की सच्चाई... जहां मिठाई जरूरत थी
बंगाल में मिठाई भद्रलोक के लिए भोजन के बाद की विलासिता थी, वहीं बीकानेर में मिठाई जीवन की जरूरत थी. थार के रेगिस्तान में, जहां तापमान 48 डिग्री से रात में शून्य के करीब पहुंच जाता है और पानी अक्सर मृगतृष्णा होता है, वहां आप स्पंजी चीजों पर जिंदा नहीं रह सकते. वहां कैलोरी डेंसिटी, लंबी शेल्फ लाइफ, घी, गुड़ और जरूरत से निकली विविधता चाहिए.
राजस्थानी समाज ने गुड़ और घी को रोजमर्रा के भोजन में इसलिए शामिल किया क्योंकि उन्हें ऊर्जा चाहिए थी. बीकानेर का मजदूर जब घर से निकलता था तो वो ऐसी मिठाई साथ ले जाता था जो सूरज में खराब ना हो.
यहीं से वो विविधता पैदा हुई जो कोलकाता कभी नहीं छू सका. बीकानेर ने सिर्फ दूध नहीं, पूरा भंडार इस्तेमाल किया. जैसे-
बेसन (चना आटा): लाजवाब लड्डूओं के लिए
मूंग दाल: पौष्टिक हलवे के लिए
मैदा और घी: घेवर के लिए
दरदरा गेहूं: लपसी के लिए
गोंद पाक बनाम रसगुल्ला
अगर दोनों फिलॉसफी का फर्क देखना है तो गोंद पाक को देखिए. गोंद पाक बीकानेर की 'हेवीवेट चैंपियन' मिठाई है. यह सर्दियों में बनने वाली पारंपरिक मिठाई है, जिसमें देसी घी, गेहूं का आटा, पोषक गोंद, बादाम, सूखा नारियल और काली मिर्च होती है. यह थार की कठोर सर्दियों में शरीर को जिंदा रखने के लिए बनी.
इसके सामने रसगुल्ला क्या है? चीनी-पानी का एक गुब्बारा. एक उछाल देता है, फिर थका देता है.
गोंद पाक फंक्शनल न्यूट्रिशन है- हड्डियों के लिए कैल्शियम, जोड़ों के लिए फैट, खून के लिए गर्मी. यह 'सुपरफूड' तब था, जब पश्चिम ने यह शब्द गढ़ा भी नहीं था.
और सबसे अहम बात- रसगुल्ला सिरप से बाहर आते ही सड़ना शुरू हो जाता है, जबकि गोंद पाक समय के साथ और निखरता है.
मिठाई का आर्किटेक्चर है घेवर...
अगर संदेश एक स्केच है, तो घेवर एक कैथेड्रल है. घेवर बनाना इंजीनियरिंग है. ठंडे बैटर को तय ऊंचाई से खौलते घी में डालना, सही तापमान पर हनीकॉम्ब जैसी संरचना बनाना- यह सालों की साधना मांगता है.
यह तकनीकी परिष्कार किसी भी यूरोपीय पेस्ट्री को टक्कर देता है. इसीलिए घेवर पर राजस्थान का एकाधिकार है. कोलकाता के पास ऐसा कोई स्ट्रक्चरल कमाल नहीं.
और भुजिया क्रांति...
मिठाई राजधानी की बात भुजिया के बिना अधूरी है. 1877 में बीकानेर के महाराजा डूंगर सिंह ने पहली बार बीकानेरी भुजिया बनवाई. यह सिर्फ स्नैक नहीं था, यह क्रांति थी.
मूंगफली या बेसन से नहीं, बल्कि मोठ दाल से बना यह स्नैक, जो सिर्फ बीकानेर और जोधपुर की मिट्टी में उगती है... अपने स्वाद और बनावट के कारण कहीं और दोहराया ही नहीं जा सकता.
जब कोलकाता रसगुल्ला-संदेश-मिष्टी दोई में उलझा रहा, बीकानेर ने ग्लोबल स्नैकिंग कैटेगरी बना दी.
दुनिया में किस ब्रांड की धमक?
अगर अमेरिका या लंदन में कोई भारतीय मिठाई चाहता है तो वो कोलकाता की दुकान नहीं खोजता. वो हल्दीराम या बीकानेरी ब्रांड उठाता है. ये दोनों बीकानेर के फड़ बाजार से निकले. वैक्यूम पैकिंग, टिन, जिप पाउच... सब यहीं से आया. बीकानेर बंगाली मिठाइयों का भी बेहतर एंबेसडर बन गया.
बीकानेर क्यों जीता?
अंतर सोच का है. संरक्षण बनाम परिवर्तन. बंगाली हलवाई परंपरा बचाते रहे. बीकानेर ने परंपरा को इंडस्ट्री बना दिया. रेगिस्तान ने मजबूर किया और उसी मजबूरी ने साम्राज्य खड़ा कर दिया.
आखिरी बात...
कोलकाता के पास गंगा है, उपजाऊ जमीन है, दूध की भरमार है. बीकानेर के पास सिर्फ रेत, गर्मी और थोड़ी मीठी जमीन है. और फिर भी- बीकानेर ने साम्राज्य बनाया. कोलकाता मिट्टी के घड़े में रह गया.
कोलकाता मीठे सपनों का शहर हो सकता है, लेकिन मिठाई की हकीकत का राजा बीकानेर है.