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म्यांमार, बांग्लादेश और अब वेनेजुएला... क्या है तख्तापलट का 'नोबेल' कनेक्शन!

नोबेल शांति पुरस्कार के इतिहास का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि महात्मा गांधी को यह सम्मान कभी नहीं मिला. गांधी को पांच बार 1937, 1938, 1939, 1947 और 1948 में नोबेल के लिए नामांकित किया गया, लेकिन उन्हें कभी पुरस्कार नहीं मिला.

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वेनेजुएला में घुसकर अमेरिकी सैनिकों  ने राष्ट्रपति को अगवा किया (Photo: ITG)
वेनेजुएला में घुसकर अमेरिकी सैनिकों ने राष्ट्रपति को अगवा किया (Photo: ITG)

साल 1958 में साहित्य का नोबेल एक रूसी कवि बोरिस पास्तरनाक को दिया गया था. ये पुरस्कार उन्हें उनके मशहूर उपन्यास Doctor Zhivago के लिए मिला जिसमें उन्होंने सोवियत संघ के क्रूर शासन का जिक्र किया था. आलम ये हुआ कि  सोवियत संघ ने इस किताब पर बैन लगा दिया. लेकिन इस उपन्यास को तस्करी के जरिए इटली ले जाया गया और फिर उसे वहां प्रकाशित कराया गया. जब पास्तरनाक को नोबेल मिला तो सोवियत संघ ने उन पर दबाव डाला कि वह यह पुरस्कार स्वीकार न करें. मजबूर होकर पास्तरनाक को नोबेल ठुकराना पड़ा. 

लेकिन वो दौर शीत युद्ध का था. लिहाजा अमेरिका ने इसका इस्तेमाल किया. अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA ने चोरी छिपे इसे प्रिंट कराया और सोवियत संघ के इलाकों में उसे बंटवाया. ताकि उसके खिलाफ माहौल बनाया जा सके. धीरे-धीरे यह नोबेल साहित्य से आगे बढ़कर शीत युद्ध की राजनीति का हिस्सा बन चुका था. यह पहला बड़ा संकेत था कि नोबेल कभी-कभी विचारधारात्मक संघर्ष में हथियार की तरह इस्तेमाल हो सकता है.

आज इस 68 साल पुराने उदाहरण की चर्चा इसलिए प्रासंगिक हो जाती है क्योंकि हाल के वर्षों में भी कुछ मिलते-जुलते पैटर्न दिखाई देते हैं. पहले म्यांमार फिर बांग्लादेश और अब वेनुजुएला इसका ताज़ा उदाहरण है. लंबे समय से अमेरिकी दबाव, प्रतिबंधों और सत्ता संघर्ष से जूझ रहे वेनुजुएला में विपक्ष की प्रमुख नेता मारिया कोरिना मचाडो को वर्ष 2025 में नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया. मचाडो को लोकतंत्र और स्वतंत्रता की आवाज़ के तौर पर वैश्विक मंचों पर लगातार आगे बढ़ाया गया. अब इसका नतीजा ये हुआ कि शनिवार को वेनेजुएला में अमेरिका ने राष्ट्रपति को ही बंदी बना लिया.

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हालांकि, यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा कि नोबेल पुरस्कार के कारण ही वेनुजुएला में संकट पैदा हुआ. लेकिन यह भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि नोबेल से मिलने वाली नैतिक वैधता किसी नेता को अंतरराष्ट्रीय समर्थन का मजबूत आधार देती है, जिसे पश्चिमी देश अपने रणनीतिक हितों के अनुरूप इस्तेमाल करते हैं. 

म्यांमार में भी दिखा यही पैटर्न

यही पैटर्न म्यांमार में भी देखने को मिला. 1991 में आंग सान सू ची को नोबेल शांति पुरस्कार मिला और वह सैन्य शासन के खिलाफ लोकतंत्र की वैश्विक प्रतीक बना दी गईं. पश्चिमी देशों ने उन्हें नैतिक ताकत दी, प्रतिबंध लगाए गए और म्यांमार पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ा. बाद में म्यांमार में तख्तापलट हुआ. लेकिन जब सू ची सत्ता में आईं और रोहिंग्या संकट पर उनकी भूमिका सवालों के घेरे में आई, तब वही पश्चिमी समर्थन असहज हो गया. 

बांग्लादेश में भी वही कहानी

बांग्लादेश का मामला थोड़ा अलग है, लेकिन संकेत वही देता है. मुहम्मद यूनुस को 2006 में माइक्रोक्रेडिट के लिए नोबेल शांति पुरस्कार मिला. यह पुरस्कार सामाजिक कार्यों के लिए था, न कि राजनीति के लिए. लेकिन बाद में जब उनका टकराव बांग्लादेश की सरकार से हुआ, तब नोबेल विजेता होना उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक “नैतिक विकल्प” के रूप में पेश करने का आधार बना. 

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यूनुस का नोबेल से राजनीति का सफर इसलिए भी चर्चा का विषय रहा क्योंकि जब तक बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार थी तब तक वह अमेरिका के निशाने पर थीं. अमेरिका और बांग्लादेश के बीच टकराव आम थे. शेख हसीना के तख्तापलट में अमेरिका की भूमिका पर सवाल खड़े होते रहे हैं. वहीं, यूनुस को बदलाव का चेहरा बनाकर पेश किया गया. लेकिन अब बांग्लादेश की हकीकत सभी के सामने है.


नोबल का विवाद कोई नया नहीं है

इन 3 देशों के उदाहरण से इस कनेक्शन को संयोग मानकर खारिज इसलिए भी नहीं किया जा सकता है क्योंकि नोबेल को अमेरिका सरीखे देशों का टूल की तरह इस्तेमाल करने का इतिहास बहुत पुराना है. इतिहास में कई ऐसे नाम हैं जिनके नोबेल पुरस्कार पर आज भी बहस होती है.

वियतनाम युद्ध के दौरान हेनरी किसिंजर और ले डुक थो को जब नोबेल दिया गया तो भी खूब कंट्रोवर्सी हुई. इसे सीधा-सीधा प्रोपेगेंडा बताया गया. आलम ये रहा कि इन्हें नोबेल देने पर चयन समिति के सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया. ले डुक थो ने पुरस्कार लेने से ही इनकार कर दिया. 

यही हाल बराक ओबामा को राष्ट्रपति बनने के कुछ ही महीनों बाद मिले नोबेल के बाद भी हुआ. लेकिन ओबामा का कार्यकाल बताता है कि उनके रहते दुनिया में कितनी शांति आई. अबी अहमद को शांति का नोबेल मिलने के बाद ही इथियोपिया गृहयुद्ध में डूब गया. ऐसे ही कई उदाहरणों का एक लंबा इतिहास है.

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गांधी को नजरअंदाज करने से बड़ा उदाहरण भला क्या है?

नोबेल शांति पुरस्कार के इतिहास का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि महात्मा गांधी को यह सम्मान कभी नहीं मिला. गांधी को पांच बार 1937, 1938, 1939, 1947 और 1948 में नोबेल के लिए नामांकित किया गया, लेकिन उन्हें कभी पुरस्कार नहीं मिला. ऐसे में इतिहास बताता है कि अंतरराष्ट्रीय सम्मान के जरिए भी बड़े देश अपने हित साधते हैं और उसे अपने प्रभुत्व को बनाए रखने और अपने एजेंडे को साधने के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं.

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