मध्यप्रदेश की राजनीति में एक बार फिर से 'माई का लाल' बयान सुर्खियों में है. अबकी बार यह बयान पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने एख कार्यक्रम के दौरान दिया है जिसके बाद सवर्ण समाज में नाराजगी है.
भोपाल की लोधी पंचायत में पूर्व सीएम उमा भारती ने आरक्षण की वकालत करते हुए एक ऐसा बयान दिया है जिसने फिर से सूबे की सियासत को गरमा दिया है.
उमा भारती ने मंगलवार को हुई लोधी पंचायत में कहा कि तब तक प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और चीफ जस्टिस के बच्चे गरीबों के बच्चों के साथ एक ही स्कूल में ना पढ़ने लगे तब तक कोई माई का लाल आरक्षण छीन नहीं सकता.
उमा भारती के इस बयान को उनकी संभावित सियासी वापसी के संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है. लंबे समय से सक्रिय राजनीति से दूरी के बावजूद, उनके हालिया तेवर यह इशारा देते हैं कि वे फिर से चुनावी और संगठनात्मक राजनीति में अपनी भूमिका तलाश रही हैं. लेकिन उनके इस बयान ने सवर्ण कर्मचारियों को नाराज कर दिया है.
सवर्णों में उबाल
मध्यप्रदेश ब्राह्मण अधिकारी कर्मचारी संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष अशोक पांडे का कहना है कि उमा भारती को यह बयान वापस लेना चाहिए नहीं तो कर्मचारी आंदोलन को मजबूर हो जाएंगे. देखें VIDEO:-
2018 का इतिहास दोहराने का डर
कर्मचारी संगठनों का यह गुस्सा सत्तारूढ़ दल के लिए इसलिए चिंता की वजह बन सकता है क्योंकि इसी तरह के एक बयान ने साल 2018 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को खासा नुकसान किया था और उसकी सरकार चली गई थी. तब तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक कार्यक्रम के दौरान यही कहा था कि 'कोई माई का लाल आरक्षण खत्म नहीं कर सकता'.
अब पूरे 8 साल बाद यही बयान उमा भारती ने दिया है. हालांकि, मध्य प्रदेश की सियासत को नजदीक से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार रविंद्र जैन का कहना है कि उमा भारती का यह बयान एक सोची-समझी रणनीति है, क्योंकि उनके पास वर्तमान में सरकार या संगठन में कोई पद नहीं है और समय-समय पर उन्होंने चुनाव लड़ने की इच्छा भी जताई है, इसलिए उनका बयान सुर्खियों में बने रहने से ज्यादा कुछ नहीं है. देखें VIDEO:-
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उमा भारती का यह रुख साफ करता है कि वो सक्रिय राजनीति में लौटने की है लेकिन चुनौती यह है कि पार्टी का मौजूदा पावर स्ट्रक्चर उन्हें कितनी अहमियत देता है.