जनसुनवाई एक ऐसा मंच है, जहां आम जनता अपनी उम्मीदों और समस्याओं के साथ प्रशासन के सामने पहुंचती है. लेकिन जब इन्हीं उम्मीदों को लापरवाही से संभाला जाए, तो सवाल सिर्फ व्यवस्था पर नहीं, संवेदनशीलता पर भी उठता है. ऐसा ही एक भावुक और सोचने पर मजबूर कर देने वाला दृश्य उस समय सामने आया, जब केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मंच से ही कलेक्टर साकेत मालवीय को फटकार लगा दी.
मामला मध्य प्रदेश के अशोक नगर जनपद पंचायत में आयोजित जनसुनवाई कार्यक्रम के बाद का है. कार्यक्रम समाप्त होने के बाद जब जनता द्वारा दिए गए आवेदनों को समेटा जा रहा था, तब कलेक्टर साकेत मालवीय उन्हें एक थैले में रख रहे थे. लेकिन ये आवेदन बेतरतीब और अव्यवस्थित तरीके से रखे जा रहे थे. यह दृश्य जैसे ही सिंधिया की नजर में आया, वे खुद को रोक नहीं पाए.
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सिंधिया ने सबके सामने ही कलेक्टर को फटकार लगाते हुए कहा कि—“ये कागज नहीं हैं, ये लोगों की उम्मीदें हैं… हमारे लिए सोने के समान हैं.” उनके इस वाक्य ने वहां मौजूद हर व्यक्ति को सोचने पर मजबूर कर दिया. यह सिर्फ नाराजगी नहीं थी, बल्कि प्रशासन को उसकी जिम्मेदारी का एहसास कराने की एक सख्त कोशिश थी.
सिंधिया बोले, ये आवेदन सिर्फ फाइलों का हिस्सा नहीं, बल्कि किसी की पीड़ा हैं
सिंधिया ने आगे कहा कि जिस भरोसे के साथ लोग अपनी समस्याएं लेकर आते हैं, उसी गंभीरता से उन पर काम होना चाहिए. आवेदन सिर्फ फाइलों का हिस्सा नहीं, बल्कि किसी की पीड़ा, संघर्ष और उम्मीद की कहानी होते हैं. उन्हें यूं ही लापरवाही से रखना, उन भावनाओं को नजरअंदाज करना है.
मंत्री की इस फटकार के बाद माहौल बदल गया. कलेक्टर ने तुरंत सभी आवेदनों को व्यवस्थित किया और उन्हें सही तरीके से संजोया. लेकिन यह घटना एक बड़ा संदेश छोड़ गई. प्रशासनिक जिम्मेदारी सिर्फ काम करने तक सीमित नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और सम्मान के साथ उसे निभाना भी उतना ही जरूरी है.