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कहानी | चची के इश्क़ में | स्टोरीबॉक्स विद जमशेद कमर सिद्दीक़ी

चचा छक्कन कभी-कभार कोई काम अपने ज़िम्मे क्या ले लेते हैं घर भर को तिगनी का नाच नचा देते हैं । 'आ बे लौंडे, जा बे लौंडे, ये कीजो, वो दीजो', घर बाज़ार एक हो जाता है। दूर क्यों जाओ, परसों का ज़िक्र है, दुकान से तस्वीर का फ्रेम लग कर आया। तस्वीर दीवानख़ाने में रख दी गई, कल शाम कहीं चची की नज़र उस पर पड़ी, बोलीं, 'छुट्टन के अब्बा, तस्वीर कब से रखी हुई है, ख़ैर से बच्चों का घर ठहरा, कहीं टूट-फूट गई तो बैठे बिठाए रुपये दो रुपये का धक्का लग जाएगा, कौन टांगेगा इस को?' चचा बोले, 'और कौन टांगेगा, मैं ख़ुद टांगूंगा, कौन सा ऐसा बड़ा काम है, रहने दो, मैं अभी सब कुछ ख़ुद ही किए लेता हूँ।' बस साहब, इतना कहने के साथ ही चचा शेरवानी उतार तस्वीर टांगने के लिए खड़े हो गए। और समझ लीजिए आ गयी घर भर की शामत - सुनिए इम्तियाज़ अली ताज की लिखी कहानी - "चचा छक्कन ने तस्वीर टांगी..."

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कहानी - चचा छक्कन ने तस्वीर टांगी
राइटर - सैय्यद इम्तियाज़ अली ताज

 

चचा छक्कन कभी-कभार कोई काम अपने ज़िम्मे क्या ले लेते हैं घर भर को तिगनी का नाच नचा देते हैं । 'आ बे लौंडे, जा बे लौंडे, ये कीजो, वो दीजो', घर बाज़ार एक हो जाता है। दूर क्यों जाओ, परसों परले रोज़ का ज़िक्र है, दुकान से तस्वीर का फ्रेम लग कर आया। इस वक़्त तो दीवानख़ाने में रख दी गई, कल शाम कहीं चची की नज़र उस पर पड़ी, बोलीं, 'छुट्टन के अब्बा तस्वीर कब से रखी हुई है, ख़ैर से बच्चों का घर ठहरा, कहीं टूट-फूट गई तो बैठे बिठाए रुपये दो रुपये का धक्का लग जाएगा, कौन टांगेगा इस को?' 

'टांगता और कौन, मैं ख़ुद टांगूंगा, कौन सी ऐसा बड़ा काम है, रहने दो, मैं अभी सब कुछ ख़ुद ही किए लेता हूँ।' 

कहने के साथ ही शेरवानी उतार चचा टांगने के लिए खड़े हो गए। इमामी से कहा, 'बीवी से दो आने लेकर कीलें ले आ। उधर वो दरवाज़े से निकला इधर मोदे से कहा मोदे! मोदे! इमामी के पीछे जा। कहियो तीन तीन इंच की हों कीलें। भाग कर जा लीजो उसे रास्ते में ही।' 

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लीजिए तस्वीर टांगने की दाग़ बेल पड़ गई और अब आई घर भर की शामत। नन्हे को पुकारा, 'ओ नन्हे, जाना ज़रा मेरा हथौड़ा ले आना। बन्नू! जाओ अपने बस्ते में से लकड़ी की तख़्ती निकाल लाओ और सीढ़ी की ज़रूरत भी तो होगी हमको। अरे भई लल्लू! ज़रा तुम जा कर किसी से कह देते। सीढ़ी यहां आकर लगा दे और देखना वो लकड़ी के तख़्ते वाली कुर्सी भी लेते आते तो ख़ूब होता।' 

छुट्टन बेटे! चाय पी ली तुमने? ज़रा जाना तो अपने इन पड़ोसी मीर बाक़िर अली के घर। कहना अब्बा ने सलाम कहा है और पूछा है आपकी टांग अब कैसी है और कहियो, वो जो है न आपके पास, किया नाम है उसका, ए लो भूल गया, पलवल था कि टलवल, अल्लाह जाने किया था। ख़ैर वो कुछ ही था। तो यूं कह दीजो कि वो जो आपके पास आला है न जिससे मालूम होता है कि चीज़ सीधी टंगी है या नहीं, वो ज़रा दे दीजिए। तस्वीर टांगनी है। जाइयो मेरे बेटे, पर देखना सलाम ज़रूर करना और टांग का पूछना न भूल जाना, अच्छा? ...ये तुम कहाँ चल दिए लल्लू? कहा है न, ज़रा यहीं ठहरे रहो। सीढ़ी पर रोशनी कौन दिखाएगा हमको? 

आ गया इमामी? ले आया कीलें? मोदा मिल गया था? तीन-तीन इंच ही की हैं न? बस-बस बहुत ठीक है। ए लो सुतली मंगवाने का तो ख़्याल ही नहीं रहा। अब क्या करूँ? जाना मेरे भाई जल्दी से। हवा की तरह जा और देखियो बस गज़ सवा गज़ हो सुतली। न बहुत मोटी हो न पतली। कह देना तस्वीर टांगने को चाहिए। ले आया? ओ छुट्टन! छुट्टन! कहाँ गया? छुट्टन मियां! ... इस वक़्त सबको अपने अपने काम की सूझी है, यूं नहीं कि आकर ज़रा हाथ बटाएं। यहां आओ। तुम कुर्सी पर चढ़ कर मुझे तस्वीर पकड़ाना। 

लीजिए साहिब ख़ुदा-ख़ुदा कर के तस्वीर टांगने का वक़्त आया, मगर होनी शुदनी, चचा उसे उठा कर ज़रा वज़न कर रहे थे कि हाथ से छूट गई। गिर कर शीशा चूर-चूर हो गया। हई है! कह कर सब एक दूसरे का मुँह तकने लगे। चचा ने कुछ घबराई नज़रों से किरचों का मुआ'इना शुरू कर दिया। वक़्त की बात उंगली में शीशा चुभ गया। ख़ून निकल आया साहब। 

तस्वीर को भूल अपना रूमाल तलाश करने लगे। रूमाल कहाँ से मिले? रूमाल था शेरवानी की जेब में। शेरवानी उतार कर न जाने कहाँ रखी थी। अब जनाब घर भर ने तस्वीर टांगने का सामान तो ताक़ पर रखा और शेरवानी की ढूंढय्या शुरु हो गई। चचा मियां कमरे में नाचते फिर रहे हैं। कभी इससे टक्कर खाते हैं कभी उससे। बड़बड़ा भी रहे है सारे घर में किसी को इतनी फिक्र नहीं कि मेरी शेरवानी ढूंढ निकाले। उम्र-भर ऐसे निकम्मों से पाला न पड़ा था और क्या झूठ कहता हूँ कुछ? छे-छे आदमी हैं और एक शेरवानी नहीं ढूंढ सकते जो अभी पाँच मिनट भी तो नहीं हुए मैंने उतार कर रखी है भई। 

इतने में आप किसी जगह से बैठे-बैठे उठते हैं और देखते हैं कि शेरवानी पर ही बैठे हुए थे। अब पुकार-पुकार कर कह रहे हैं अरे भई रहने देना। मिल गई शेरवानी ढूंढ ली हमने। तुमको तो आँखों के सामने बैल भी खड़ा हो तो नज़र नहीं आता। 

आधे घंटे तक उंगली बंधती बँधाती रही। नया शीशा मंगवा कर चौखटे में जड़ा और तमाम क़िस्से तय करने पर दो घंटे बाद फिर तस्वीर टांगने का मरहला दरपेश हुआ। औज़ार आए, सीढ़ी आई, चौकी आई, शम्मा लाई गई। चचा जान सीढ़ी पर चढ़ रहे हैं और घर भर कील कांटे से लैस खड़ा है। दो आदमियों ने सीढ़ी पकड़ी तो चचा जान ने उस पर क़दम रखा। ऊपर पहुंचे। एक ने कुर्सी पर चढ़ कर कीलें बढ़ाईं। एक क़बूल कर ली,  दूसरे ने हथौड़ा ऊपर पहुंचाया, सँभाला ही था कि कील हाथ से छूट कर नीचे गिर पड़ी। खिसियानी आवाज़ में बोले, 'ए लो, अब कमबख़्त कीलें छूट कर गिर पड़ी, देखना कहाँ गई?' 

अब जनाब सब के सब घुटनों के बल टटोल-टटोल कर कील तलाश कर रहे हैं और चचा मियां सीढ़ी पर खड़े हो कर मुसलसल बड़बड़ा रहे हैं। मिली? अरे कम बख़्तो ढूंडी? अब तक तो मैं सौ मर्तबा तलाश कर लेता। अब मैं रात-भर सीढ़ी पर खड़ा खड़ा सूखा करूँगा? नहीं मिलती तो दूसरी ही दे दो अंधो! 

ये सुनकर सबकी जान में जान आती है तो पहली कील ही मिल जाती है। अब कील चचा जान के हाथ में पहुंचाते हैं तो मा'लूम होता है कि इस हथौड़ा ग़ायब हो चुका है। ये हथौड़ा कहाँ चला गया? कहाँ रखा था मैंने? लाहौल वला क़ुव्वत। उल्लू की तरह आँखें फाड़े मेरा मुँह क्या तक रहे हो? सात आदमी और किसी को मा'लूम नहीं हथौड़ा मैंने कहाँ रख दिया? 

बड़ी मुसीबतों से हथौड़े का सुराग़ निकाला और कील गड़ने की नौबत आई। अब आप ये भूल बैठे हैं कि मापने के बाद मेख़ गाड़ने को दीवार पर निशाना किस जगह किया था। सब बारी-बारी कुर्सी पर चढ़ कर कोशिश कर रहे हैं कि शायद निशान नज़र आ जाये। हर एक को अलग-अलग जगह निशान दिखाई देता है। चचा सबको बारी-बारी उल्लू, गधा कह कह कर कुर्सी से उतर जाने का हुक्म दे रहे हैं। 

आख़िर फिर फीता लिया और कोने से तस्वीर टांगने की जगह को दुबारा नापना शुरू किया। साथ वाली तस्वीर कोने से पैंतीस इंच के फ़ासले पर लगी हुई थी। बारह और बारह के इंच और? बच्चों को ज़बानी हिसाब का सवाल मिला। ब-आवाज़-ए-बुलंद हल करना शुरू किया और जवाब निकाला तो किसी का कुछ था और किसी का कुछ। एक ने दूसरे को ग़लत बताया। इसी तू तू, मैं-मैं में सब भूल बैठे कि असल सवाल क्या था। नए सिरे से माप लेने की ज़रूरत पड़ गई। 

अब चचा फीते से नहीं मापते। सुतली से मापने का इरादा रखते हैं। सीढ़ी पर पैंतालीस दर्जे का ज़ाविया बना कर सुतली का सिरा कोने तक पहुंचाने की फ़िक्र में हैं कि सुतली हाथ से छूट जाती है। आप लपक कर पकड़ना चाहते हैँ कि इसी कोशिश में ज़मीन पर धड़ाम से आ गिरे। लीजिए साहब कोने में सितार रखा था। उसके तमाम तार चचा जान के बोझ से यकलख़्त झनझना कर टुकड़े टुकड़े हो गए।  

अब चचा जान की ज़बान से जो मंझे हुए अलफ़ाज़ निकलते, सुनने के क़ाबिल थे मगर चची ने रोका दिया बोलीं, अपनी उम्र का नहीं तो इन बच्चों का ही ख़्याल करो। 

बहुत दुशवारी के बाद चचा जान फिर से कील गाड़ने की जगह तय करते हैं। बाएं हाथ से उस जगह मेख़ रखते हैं और दाएं हाथ से हथौड़ा सँभालते हैं। पहली ही चोट जो पड़ती है तो सीधी हाथ के अंगूठे पर। सी-सी करते हुए हथौड़ा छोड़ दिया तो वो नीचे आकर गिरा किसी के पांव पर, हाय-हाय, ओफ़्फ़ो और मार डाला शुरू हो गया। 

चची जल भुन कर कहती हैं यूं कील गाड़ना हो करे तो मुझे आठ रोज़ पहले ख़बर कर दिया करो। मैं बच्चों को लेकर मैके चली जाया करूँ और नहीं तो। 

चचा ने नादिम हो कर जवाब दिया, ये औरत ज़ात भी बात का बतंगड़ ही बना लेती है। अरे ऐसा हुआ क्या जिस पर ये ता'ने दिए जा रहे हैं? भला साहिब-ए-कान हुए। आइन्दा हम किसी काम में दख़ल न दिया करेंगे।

अब नए सिरे के कोशिश शुरू हुई। कील पर दूसरी चोट जो पड़ी तो इस जगह का पलस्तर नरम था, पूरी की पूरी मेख़ और आधा हथौड़ा दीवार में। चचा अचानक कील गड़ जाने से इस ज़ोर से दीवार से टकराए कि नाक ग़ैरत वाली होती तो पिचक कर रह जाती। 

 

(पूरी कहानी सुनें स्टोरीबॉक्स में। आजतक रेडियो के अलावा Spotify, Apple podcast, Google podcast, Jio-Saavn समेत सभी ऑडियो मोबाइल ऐप्स पर।  सुनने के लिए सर्च करें - स्टोरीबॉक्स विद जमशेद क़मर सिद्दीक़ी) 

 

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