कहानी - धीरजगंज का मुशायरा
राइटर - मुश्ताक अहमद यूसुफ़ी
उस गांव का नाम धीरजगंज था.... वहां जो आखिरी मुशायरा था, बड़ा यादगार था। वो मुशायरा ऐसा हुआ कि उसके बाद अब तक ना हो पाया.... उस मुशायरे में 18 बाहर के शायर, 33 लोकल और आसपास के शोहरा शिरकत के लिए बुलाए गए, और कुछ बिन बुलाए भी आ गए। बाहर से आने वालों में कुछ तो ऐसे थे जो इस लालच में आए थे कि चलिए मुशायरे की फीस मिले या ना मिले, गांव है कुछ नहीं तो सब्जियां, फसल के मेवे, पांच छह मुर्गियों का झाबा ... इतना तो मुशायरे के ऑर्गनाइज़र चलते वक्त साथ कर ही देंगे। हकीम एहसान उल्लाह तस्लीम मूलगंज की तवाइफ़ों के खास हकीम भी थे और उनके लिए गाने भी लिखते थे। तवायफें उन्हें गज़ल लिखने की फरमाइश करतीं तो ये लिखकर देते, बहुत महीन आदमी थे। अपने हुनर के इतने मासटर की किसी तवाइफ़ के पैर भारी होते तो उसके लिए छोटी बहर में आसान सी गज़ल कहते ताकि ठुमका ना लगाना पड़े। (बाकी की कहानी नीचे लिखी है लेकिन अगर इसी कहानी को आप जमशेद क़मर सिद्दीक़ी से सुनना चाहते हैं तो नीचे दिए SPOTIFY या APPLE PODCAST के लिंक पर क्लिक करें)
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तो साहब मुशायरा शुरु हुआ.... मुशायरे के तंबू में एक हुड़दंग मची थी। उम्मीद के उलट आस पास के गांवों से पता नहीं कहां कहां से इतने लोग आ गए कि बैठने के लिए दरियां कम पड़ गयीं और पानी का इंतज़ाम भी फेल हो गया। उस ज़माने में बिजली नहीं थी तो पेट्रोमैक्स जिसे पंचलाइट कहा जाता था वो तंबुओं के किनारों पर लटकाई गयीं। ज़्यादा भीड़ आने की एक वजह ये भी थी कि सुनने में आया कि मौलवी मज्जन के दुश्मनों ने यह अवाह उड़ा दी थी महफिल के इख्तताम पर लड्डु और खजूरों भी बाटें जाएंगे और मुर्गियों की खतरनाक बीमारी 'रानी-खेत' की दवा की पुड़िया भी तकसीम होंगी। गांव खेड़े के सब लोग मुशायरे में चले आए। एक देहाती अपनी 101 बीमार मुर्गियां झाबे में डाल के लेके आया था। उसकी मुर्गियां इतनी बीमार थीं कि लगता नहीं थी कि पूरा मुशायरा सुन पाएंगी। सुबह तक बचने की आस नहीं थी। एक दूसरा काश्तकार अपनी जवान भैंस को नहला दहलाकर धुलाकर बड़ी उम्मीदों से लेकर लाया था। असल में उस भैंस के बछड़े ही बछड़े होते थे... बछिया नहीं होती थी... उसे किसी ने बताया था कि मुशायरे में तवाइफों वाले हकीम एहसान उल्ला तस्लीम भी आ रहे हैं। असल में हकीम एहसानुल्ला तस्लीम साहब जिनके बारे में मैंने पहले आपको बताया कि तवाइफों के खास हकीम थे, उनके लिए गाने भी लिखते थे... वो बड़े काबिल हकीम थे... वो रंगीन मिज़ाज लोगों का भी इलाज करते थे और फकत कारूरा देखकर नब्स पर उंगली रखते ही निशानानदेही कर देते कि बीमारी के जरासीम किस कोठे के हैं। अच्छा वो देहाती अपनी भैंस लेकर क्यों आया था ... वो इसलिए क्योंकि हकीम साहब में एक और सलाहियत थी। बताते हैं... देखिए ये तो समझ में आने वाली बात है कि किसी तवायफ़ के यहां लड़का पैदा हो जाए तो वहां रोना पीटना मच जाता है। हकीम एहसान उल्ला तस्लीम तस्लीम के पास एक खानदानी आज़माया हुआ नुस्खा था ... कि शर्तिया लड़की पैदा होती थी। वो पीसकर बनाया गया एक नुस्खा मांगने वालों को पान में डालकर खिलाया जाता था। नुस्खे के सौ फीसदी कामयाब होने का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि कानपुर में किसी की ज़ाती बीवी के यहां भी लड़की पैदा होती तो हकीम साहब के सर हो जाती कि हो ना हो तुम उन्हीं का पान खाकर आए थे। तो वो बेचारा गरीब किसान अपनी भैंस के लिए वही पान लेने मुशायरे में आया था।
तो भाई साहब मुशायरे में ज़्यादातर लोग ऐसे थे जिन्होंने इससे कभी मुशायरा भी नहीं देखा और शायर भी नहीं। कुछ लोग तो ये देखने आए थे कि शायर कैसे होते हैं... हमी लोग की तरह होते हैं या कुछ इंसान से अलग दिखते हैं। तो साहब भीड़ खचाखच भरी... मुशायरा शुरु हुआ कोई रात के 12 बजे। चारों तरफ सामईन का तूती बोल रही थी। पीछे कोनों में कुछ लोग हाथापाई भी करने लगे थे और हूटिंग इस कदर थी कि गाली सुनाई नहीं पड़ रही थी। कादिर बाराबंकवी स्टेज पर आए... शेर पढ़ा तो वो हूंटिग शुरु हो गयी कि लोगों ने तंबू सर पर उठा लिया। वो ग़रीब आजिज़ आकर कहने लगा "हजरात सुनिए तो... अरे शेर ही तो पढ़ा है, कोई गाली तो नहीं दी..." आलम ये था साहब कि मुशायरे के शोर से सहम कर गांव की सरहद पर गीदड़ों तक ने बोलना बंद कर दिया था।
इसी दौरान एक साहब बिछी हुई चांदनी पर घुटनों के बल चलते मुशायरा के सदर के पास पहुंचे। उन्हें दरख्वास्त की, कि देखिए साहब मैं एक बहुत गरीब गरीबो आदमी हूं। शायरी सुनाना चाहता हूं... मुझे भी अपना सुनाने की इजाजत दी जाए। सदर साहब को उस पर रहम आ गया। इजाज़त दे दी... ये साहब जो अभी तक घुटने के बल बैठे थे... स्टेज पर चढ़े। उन्होंने खड़े होकर हाजरीन को दाएं बाएं और सामने घूम कर तीन दफा आदाब किया। उनकी क्रीम रंग की शेरवानी इतनी लंबी थी कि दावे से नहीं कहा जा सकता था कि उन्होंने नीचे पाजामा पहन रखा है या नहीं। अपनी बयाज़ यानि वो डायरी जिसमें शेर लिखे जाते हैं... वो उठाई और बोले, "हाजरीन, मैं एक बहुत खास वजह से गैर तरह गज़ल पढ़ने की इजाजत चाहता हूं" गैर-तरह यानि वो ग़ज़ल जो किसी तयशुदा, मशहूर मीटर या क़ाफ़िया-रदीफ़ के हिसाब से नहीं लिखी गयी... आज़ाद उसूलों पर नई तरह से लिखी पर नहीं लिखी गई हो। लोगों को लगा कि ये कोई बड़ा इंकलाबी शायर आया है मार्केट में। कोई बड़ा आलिम शायर है जो नई तरह की शायरी कर रहा है क्योंकि वो पुराने वाले शायरों को एक नई राह दिखाना चाहता है। ये कोई बड़ा उस्ताद शायर है... लेकिन जैसे ही उन्होंने गज़ल पढ़ी.... इतनी घटिया... कि लोगों ने उन पर जूते चप्पल औऱ बीमार मुर्गियो के अंडे फेंकने शुरु कर दिये... जो वो हकीम साहब को दिखाने लाए थे। फिर उन साहब ने सदर ए मुशायरा को बताया कि "दरअसल हमको रदीफ़ काफिया में लिखना नहीं आता... हम तो पहली बार कुछ लिखें है और आज ही अपना नाम साग़र जालौनवी रखे है"
बहरहाल मुशायरा आगे चला लैंपो में तेल 15 मिनट पहले खत्म हो चुका था। कुछ पंचलाइटों में वक्त पर हवा नहीं भरी थी। वो फुस करके बुझ गए। सागर जालौनवी के एतराज के बाद किसी शरारती ने बाकी लैंपों के मेंटल हिला दिये जिसकी वजह से अंधेरा हो गया। मेंटल वो सफेद रंग का एक जाली सा टुकड़ा होता था जो लैंपो पर लगाया जाता था, अगर आपको याद हो... तो साहब ऐसा घुप अंधेरा कि हाथ को शायर नहीं सुझ नहीं दे रहा था। लिहाज़ा बेचारे बेकसूर सुनने के लिए आए गांव वाले पिट रहे थे। इतने में किसी ने सजा लगाई। भाइयों भाइयों अरे बचो भागो। वो तवायफों वाले हकीम साहब की लिए लाई गयी भैंस रस्सी तुड़ा कर भाग गयी। ये सुनते ही घमसान की भगदड़ पड़ी। अंधेरी रात में काली भैंस तो किसी को दिखलाई नहीं दी। लेकिन लाठियों से तैनात डरे हुए दहशतदा देहाती सामईन ने एक दूसरे को भैंस समझकर खूब धुनाई की। लेकिन ये आज तक समझ में ना आया कि चुराने वालों ने ऐसे घुप अंधेरे में चुन-चुन के नए जूते ही कैसे उठाए। और साहब बात सिर्फ जूतों की नहीं, हर वो चीज़ चुरा ली गयी जो चुराई जा सकती थी... सागर जालौनवी की दुगने साइज की शेरवानी जिसके नीचे कुर्ता या बनियान नहीं था। एक दरी, तीन बिछाने वाली चांदियां, पीछे लगा मुशायरे का बैनर, सदर ए मुशायरे का मखमली गांव तकिया। एक पटवारी के गले में लटकी हुई चांदी का लॉकेट, ख्वाजा कमरुद्दीन की जेब में पड़े हुए 8 रुपये। उनका इत्र में बसा हुआ रेशमी रुमाल और पड़ोसी की बीवी के नाम महकता हुआ खत। और यहां तक तो गनीमत थी... हद ये कि कोई गुस्ताख उनकी चूड़ीदार पाजामे का रेशमी इजारबंद जो घुटने के बीच लटक रहा था, एक ही झटके में कोई खींच कर ले गया। यानि जिसका जिस चीज पर हाथ पड़ा उसे उठा के उतार के नोच के फाड़ के उखाड़ के ले गया। फकत एक चीज ऐसी थी जिसको किसी ने हाथ नहीं लगाया। शायर हजरात जहां-जहां अपनी शेरों लिखने की डायरियां यानि बयाज़ जिस जगह छोड़कर भागे थे वो दूसरे दिन तक भी वहीं पड़ी रही। जब मुशायरे में मारपीट शुरु हो गयी तो कुछ देहातियों ने ये समझकर कि शायद मुशायरे में ऐसा ही होता है, ये उसका कोई अदाब है.. उन्होंने भी मारपीट और लूटखसोट में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया और उन्हें इतना पसंद आया कि इस मुशायरे के बहुत दिन बाद तक वो बड़ी बेचैनी से पूछते रहे -“ऐ सायर साहब.... ऊ मुसैहरा बहुत मजेदार रहा... ई अगला मुसैहरा कब होगा?”
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