कहानी - दा ब्लू कॉमरेड
लेखक - अनुराग अनंत
वो जनवरी का महीना था. क़त्ल के लिए एकदम मुफीद महीना. कुहासे में एक हाथ की दूरी पर खड़ा आदमी पेट में खंज़र घोंप दे और आप उसका चेहरा भी न देख सकें. रात में शीतलहर चलती थी और सुबह फुटपाथ पर पलने वाले गरीब बच्चे और उनके माँ-बाप ईश्वर को प्यारे हो जाया करते थे. दिल्ली का दिल पत्थर था और आँख बंज़र. न दिल पसीजता था और ना आँख रोती थी. मैं एक चिड़िया थी जो उत्तर प्रदेश के इलाहबाद से उड़ कर दिल्ली के एक बड़े विश्वविद्यालय की मुंडेर पर आ कर बैठ गई थी. यहाँ पढ़ने वाले लड़के-लड़कियां दुनिया बदलने के लिए ज़मीन के भीतर सुरंग खोदने से लेकर आसमान में सुराख़ करने तक सब काम कर जाना चाहते थे. इनकी हवा में लहराती हुई मुट्ठियाँ देख कर कवि ने कहा था “हीलेले झकझोर दुनिया....” और एक उदास सी शाम हॉस्टल के कत्थई अँधेरे में डूबे अपने कमरे में फांसी लगा ली थी. दुनिया को झकझोरने का सपना देखने वालों के हिस्से मौत लिखने का दस्तूर बहुत पुरना था और कवि इस दस्तूर का अपवाद नहीं हो सका था.
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कवि के अधूरे सपने का सारथि, इस कहानी का नायक उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले से है. भारत का एकमात्र जि़ला जो चार राज्यों - मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और बिहार से घिरा हुआ है. शहरों की सच्चाई, समझ और शिक्षा उसके गाँव पहुँचते पहुँचते कोहनियों के बल रेंगने लगती थी. उसके गाँव में क़ानून की किताब सर के बल खड़ी थी. व्यवस्था के ज़िस्म में काँटों से सिवाय कुछ नहीं था. वो जब अपने बारे में बताने लगता तो तीसरी चौथी लाइन में ही कह देता था- “मेरी जिंदगी में गन्दगी की मात्रा कुछ ज़्यादा ही है, इसलिए मेरे खुरदुरे हाथ आपके मन का मखमल मैला कर सकते हैं. आपको अपने ख्याल की ख़ूबसूरती बचानी है तो मुझसे बातें मत करिए. मेरे यहाँ सब कुछ ख़ूबसूरत नहीं है”
मैं उसकी इसी बात पर मर मिटी थी. वैसे यूनिवर्सिटी की कमोबेश सभी लडकियाँ उसकी किसी ना किसी बात पर मरती थीं. हमनें उसे टुकड़ों में बाँट लिया था. जैसे उसके होंठ हर्षिता को पसंद थे. नताशा उसकी हाथों की उभरी हुई नसों पर जान देती थी. बबली उसके बालों की दीवानी थी. वो जब अपने घुंघराले बालों में हाथ फेरता था तो हमारी दुनिया डोल जाती थी. वो बातें करते वक़्त जब ख्यालों में खो जाता तो हम उसकी ख़ामोशी में डूबने लगते थे.
मैंने उसे पहली बार एडमिन ब्लाक पर एक धरने में देखा था. लम्बे घुंघराले बाल, अच्छा-ख़ासा कद, गठी हुई काठी, हाथ में हंसिए का टैटू, नीली जींस, आसमानी कुर्ता और लाल गमछा पहने हुए था वो. शरीर को ख़ास तरीके से थोडा सा झुका कर आसमान में मुट्ठी लहराकर वो नारा लगा रहा था-
मैं ख़ुद को उससे बात किए बिना नहीं रोक सकी. मैं उसका इंतज़ार करती रही. शाम को जब वो धरने से फ्री हुआ. मैं उसके पीछे दौड़ते हुए पहुँची. मैंने हिचकिचाते हुए कहा-
-क्या मैं आपसे बात कर सकती हूँ ?
-आप मुझसे बात क्यों करना चाहती हैं?. उसने सवाल के जवाब में सवाल किया.
-पता नहीं, बस करने का मन है. मैंने उत्तर दिया.
-ये एक ख़ूबसूरत और मासूम वजह है, कहते हुए वो खिलखिला कर हँस पड़ा. हम वहीँ पेड़ के नीचे बेंच पर बैठ गए.
तब मेरे माथे पर अदृश्य आँख नहीं उगी थी. पर आज जब मैं उसकी कहानी कह रही हूँ, मेरे पास वो अदृश्य आँख है. मैं देख पा रही हूँ जब मैंने उससे उसका नाम पूछा था. तब उसकी स्मृति में उसके गाँव का दक्खिन टोला उभर आया था. उसका अपना मोहल्ला. अधनंगे पुरुषों और नंगे बच्चों का झुण्ड एक सुआर के पीछे दौड़ा जा रहा था. सूअर ऐसे चीख़ रही थी कि आत्मा में छेद हो जाए. उसके पिता ने खूब दारु पी थी. और वो अपनी पत्नी और उसकी माँ को बेतहाशा पीट रहा था. उसकी छोटी बहन माँ से लिपट कर रो रही थी. बीच बीच में ख़ुद भी पिट जाया करती थी. छोटी बहन से थोड़ी सी बड़ी बहन खाना बना रही थी. वो इस मारपीट के दृश्य की इतनी आदी हो गई थी कि उसके लिए उसके माँ-बाप और बहन अदृश्य हो गए थे. उसके लिए ये सब कुछ इतना सामान्य था कि उसके सामने “कुछ नहीं” हो रहा था. वो एक धुन में बंधी हुई खाना बनाए जा रही थी. वो ठीक उसी समय वहां से उठा और जिधर सूअर काटने की आवाज़ आ रही थी उधर निकल गया. उसकी उम्र उस समय बारह (12) साल थी. उसने अब तक कई बार सूअर को कटते और अपनी माँ को पिटते देखा था. उसकी उम्र से आप उसकी सबसे छोटी बहन और उससे थोड़ी सी बड़ी बहन की उम्र का अंदाज़ा लगा सकते हैं. ये दृश्य जो आप अभी देख रहे हैं. मेरे बात करने के दौरान उसकी स्मृतियों में तैर रहे थे.
मैंने पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?”
-खेतराम मुसहर
-इसका क्या मतलब होता है ?
-मेरे नाम का कोई मतलब नहीं है. मैं अपने काम से अपने नाम को मतलब देना चाहता हूँ.
मेरी तीसरी आँख देख रही है.मई-जून की चिलचिलाती धूप में एक गर्भवती औरत गेंहूं कट रही है. गेहूं की बालियाँ सुर्ख लाल हैं. औरत के पेट में दर्द होता है और वो रेंग कर खेत के भीतर चली जाती है. गेहूं की कमर तक की पकी हुई बालियों के बीच दर्द से कराहती हुई औरत रोती-तड़पती एक बच्चे को जन्म देकर बेहोश हो जाती है. बच्चा गेहूं की बालियों के बीच खून में लिथड़ा हुआ पड़ा है. औरत बेहोश है और बच्चा रो रहा है. औरत एक घंटे बाद बेहोशी से उठती है और जिस हंसिये से गेहूं काट रही थी उसी से अपने बच्चे की नाल काट देती है. अब आप देखिए वो औरत सर पर गेहूं का बोझ रखे. एक हाथ से बोझ संभालती और दूसरे हाथ में अपने नवजात बच्चे को उठाए घर वापस आ रही है. गेहूं के बोझ में हंसिया धंसी हुई है और बच्चा औरत की सूखी हुई छाती में समाया हुआ है
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