कहानी - दिल आज शायर है
राइटर - जमशेद क़मर सिद्दीक़ी
शहर के किनारे एक कब्रिस्तान था... पर वो आम कब्रिस्तान जैसा नहीं था.... यहां कब्रों के किनारों पर फूल को गुच्छे थे, अंदरुनी रास्तों पर दोनों तरफ हरयाली थी, साफ सफाई थी... एक और खास बात थी इस कब्रिस्तान की... और वो ये कि यहां रात के वक्त एक खूबसूरत आवाज़ में गज़ल गूंजती थी...रात के दूसरे पहर में अंधेरा गहरा चुका था। चांद की हल्की-हल्की रौशनी में कच्ची-पक्की कब्रें दिखाई देती थी। और ताज़ी ताज़ी बनी कब्रों की मिट्टी बहकर आसपास उगी घास के किनारे चांदी की तरह जम जाती थी... खुशनुमा हवा के ठंडे झोंके में एक आवाज़ सरसराती हुई सुनाई देती थी.... वो कहती थी.... (बाकी की कहानी नीचे पढ़ सकते हैं 'Read More' पर क्लिक करके. लेकिन अगर आप इसी कहानी को अपने फोन पर सुनना चाहते हैं तो ठीक नीचे दिए SPOTIFY या APPLE PODCAST लिंक पर क्लिक करें')
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ज़िंदगी से एक दिन मौसम ख़फ़ा हो जाएँगे
रंग-ए-गुल और बू-ए-गुल दोनों हवा हो जाएँगे
आँख से आँसू निकल जाएँगे और टहनी से फूल
वक़्त बदलेगा तो सब क़ैदी रिहा हो जाएँगे
फूल से ख़ुश्बू बिछड़ जाएगी सूरज से किरन
साल से दिन वक़्त से लम्हे जुदा हो जाएँगे
ये आवाज़ थी कामिल की। कामिल, जो इस क़ब्रिस्तान में कब्रें खोदने का काम करता था, तब से जबसे होश संभाला। ये तो उसे ठीक से याद नहीं था कि पहली कब्र उसने कब खोदी थी लेकिन धुंधला सा याद था कि अब्बा उसे किस तरह कब्र खोदना सिखाते थे। उनके इंतकाल के बाद अब जब वो पैंतीस का हो गया, तो काम में इतना माहिर था कि बिना नाप लिए भी वो कब्र खोदता तो नाप बराबर निकलती थी – आठ फीट लंबी, तीन फीट चौड़ी और पांच फीट गहरी। क़ब्रिस्तान के अंदर ही टीन और बांस से बना उसका छोटा सा कमरा था, जिसके एक ताक पर एक चराग टिमटिमाटा रहता था। उसे शायरी का शौक था, अच्छे शेर कहता था... लेकिन उसने अपना ये शौक सिर्फ क़ब्रिस्तान की हदों तक ही महदूद रखा था। उसे ज़िंदों को शेर सुनाने में कोई दिलचस्पी नहीं थी, उसकी महफ़िल तो तब जमती थी जब पूरा शहर नींद की कई करवटें ले चुका होता था। वो क़ब्रिस्तान की एक नीली रंग की कंगूरों वाली कब्र पर टेक लगाता था, ये कब्र उसके बैठने की जगह जैसी थी... उसी नीले कंगूरों वाली कब्र पर टेक लगाता था ... और उसी पर अपनी डायरी टिकाता और दूर-दूर तक फैली कब्रों में, ज़मानों से सो रहे लोगों को अपनी शायरी सुनाता था। ये उसका एक अजीब शौक था....
“चलिए हाज़रीन... आज की महफिल इसी मोड़ पर खत्म करते हैं... आप लोग तो सो ही रहे हैं... हम भी सोते हैं.. खुदा ह़ाफिज़” (उबासी के साथ)
कामिल की रात इसी तरह ख़त्म होती थी, और दिन की शुरुआत किसी की मौत की ख़बर से। उस सुबह भी वो सोकर उठा ही था कि एक जनाज़े के आने की ख़बर उसे मिली... कुछ लोग आए और बोले की कब्र खुदवानी हैं, उन्होंने कामिल को एडवांस दिया और कहा.
“दो घंटे में खुद जाएगी न... अच्छा देखिए, मिट्टी ज़रा सफाई से निकालिएगा” कामिल ने लापरवाही से सर हिला दिया। कुछ वक्त बाद जब चार कंधों और थोड़ी भीड़ के साथ जनाज़ा क़ब्रिस्तान में दाखिल हुआ तो कब्र तैयार थी। मर्द कब्र और जनाज़े के पास खड़े थे और औरतें क़ब्रिस्तान के उस हरी सलाखों वाले गेट पर, फिर वही हुआ जो कामिल रोज़ाना देखता था, लोग रोए, एक-दूसरे को हिम्मत रखने को कहा, मुट्ठी से कब्र में मिट्टी गिराई और लौट गए। कुछ लम्हे बाद, शोर दोबारा खामोशी में बदल गया, सब जा चुके थे लेकिन हां, एक खूबसूरत चेहरा, बादामी दुशाला ओढ़े अब तक गेट पर था। एक चेहरा जो गेट से कब्रिस्तान के अंदर झांकता रहता था, वो आंखे खूबसूरत थी, बहुत खूबसूरत। वौ कौन थी, पता नहीं। कामिल ने अबतक उसे नहीं देखा था।
बहरहाल, दिन गुज़रा और रात का चांद फिर से आसिफी क़ब्रिस्तान के आसमान पर हाज़िरी लगाने आ गया। चांदनी दूरतक फैली थी जिससे अंधेरा धुंधला रहा था। कामिल आज भी उसी नीले कंगूरों वाली कब्र पर अपनी डायरी रखकर, उसी कब्र से टेक लगाए, कब्रों में सोए लोगों को शायरी सुना रहा था। कल से आजतक में दो नए सुनने वाले महफ़िल में बढ़ गए थे। यानि दो नई कब्रें.... तो उसने कहा,
“जो लोग मौत को ज़ालिम करार देते हैं... मुलायज़ा फर्माइये... पीछे वालों आवाज़ आ रही है न...”
“जो लोग मौत को ज़ालिम करार देते हैं - खुदा मिलाए उन्हें ज़िंदगी के मारों से”
कामिल को शायरी और कब्र खोदने की सलाहियत दोनों अपने अब्बा से विरासत में मिली थी।
वो भी एक मशहूर शायर थे हालांकि उनकी पूरी ज़िंदगी में उन्हें किसी ने कभी किसी बड़ी अदबी महफिल में नहीं देखा... उन्हीं से कामिल ने शायरी भी सीखी और कब्र खोदना भी। जब उनका इंतकाल हुआ तो उके बाद कामिल ने कब्रिस्तान में कब्र खोदने की ज़िम्मेदारी उठा ली और क्योंकि शायरी उसके खून में थी... तो वो खाली वक्त में शायरी की किताबें पढ़ते हुए कुछ कुछ शेर कहने लगा... और कब्रों को सुनाते-सुनाते उसके शेर बेहतर होते गए।
बहरहाल, क़ब्रिस्तान के दो गेट थे, एक बाहर जिसे बड़ा वाला गेट कहते थे, उसके किनारे, चौकीदार स्टूल पर बैठा अखबार पढ़ता रहता था। बड़े गेट से सौ-डेढ़ सौ मीटर तक दोनों तरफ हरियाली थी और फिर एक हरी सलीखों वाला छोटा गेट, जहां से क़ब्रिस्तान शुरु होता था। औरतों को इस हरी सलीखों वाले छोटे गेट के आगे आने की इजाज़त नहीं थी। उसी गेट के पीछे कामिल को कई दिनों से वो बड़ी-बड़ी आंखों और बादामी दुशाला ओढ़े हुए एक चेहरा देखता रहता।
“सुनिए...” एक शाम जब वो कब्र खोद रहा था तो आवाज़ से वो चौंक गया। पलट कर देखा तो गेट पर वही लड़की थी। खूबसूरत आंखें वाली जो उस हरे गेट से टिकी कामिल को देखा करती थी... नाज़ुक चेहरा, पतली नाक, गालों पर हल्का मेकअप भी था।
“जी आप ही से कह रही हूं...”
कामिल फावड़ा किनारे रखकर पतलून के मुड़े हुए पायचे नीचे करके उसके पास पहुंचा। वो किसी अमीर घर की लग रही थी...
“जी फर्माइये” उसने हाथ झाड़ते हुए कहा तो वो बोली – “ये.. रात के वक्त यहां से.. आ.. शायरी की आवाज़ आती है, कौन पढ़ता है?”
कामिल बेरुखी से “पता नहीं, मुझे नहीं मालूम” कहते हुए वापस जाने लगा।
- “ सुनिये तो... मैं भी शायरी की कद्रदान हूं। मेरे अब्बा शायर थे... उनका नाम आपने शायद सुना होगा... मिर्ज़ा वकार जमाली...” ये नाम सुनते ही वो ठहर गया।
इस नाम में कुछ था... कि उसकी कसी हुई मुट्ठियों कांपने लगीं और आंखों के डोरे सुर्ख हो गए। वो पलटा और आहिस्ता कदमों से उसकी तरफ बढ़ते हुए इतने करीब आ गया कि वो डरकर कुछ कदम पीछे हट गई – कामिल बोला... “मिर्ज़ा वकार जमाली... तुम उनकी बेटी हो?” उसने हां में सर हिलाया
- “वही मिर्ज़ा जिसके लिए हम कबर खोदने वाले इस समाज की गंदगी हैं?” लड़की का चेहरा संजीदा हो गया, “वही मिर्ज़ा जो कब्र खोदने वालों के बगल में बैठना अपनी शान के खिलाफ मानते थे.... माफ कीजिए...आपने वालिद शायर नहीं थे... क्योंकि शायरी इंसान करते हैं... और वो इंसानों की बराबरी मे यकीन नहीं रखते थे... तुम्हें तो मालूम भी नहीं है कि उन्होंने... “
कामिल उसे गौर से देखने लगा.... और उसे याद आने लगा वही पुराना वक्त जब उसकी उम्र कोई 12-15 साल रही होगी... उसके वालिद साहब जिनकी शायरी सभी लोग पसंद करते थे... उन्हें पहली बार शहर के बड़े मुशायरे में शिरकत के लिए बुलाया गया था। कामिल भी खुश था। मुशायरे के दिन उसने पहली बार अपनी बाबा को स्टेज पर देखा था... वहां हज़ारों की भीड़ थी। मंच पर बैठे कामिल के वालिद साहब उसे देख कर मुस्कुरा रहे थे... लेकिन तभी मंच पर एक रसूखदार शायर आए, मिर्ज़ा वकार जमाली। महंगे कपड़े, हाथ में कीमती छड़ी, उन्होंने कामिल के बाबा को देखा और फिर कुछ कानाफूसी होने लगी.... उन्होंने माइक ऑफ करके ऑर्गनाइज़र्स से सख्त लहजे में जो कहा वो कामिल ने साफ सुना क्योंकि वो सबसे आगे बैठा था... बोले, “आप लोगों को कुछ शर्म लिहाज़ कुछ है या नहीं, सब को बराबर कर दिया आपने... मुझे एक कब्र खोदने वाले के बराबर में बैठा रहे हैं... ये मेरी तौहीन है... इन्हें स्टेज से हटाइये वरना मैं वापस जा रहा हूं”
अब क्योंकि मिर्ज़ा वकार जमाली ही मुशायरे के फाइनेंसर थे... लिहाज़ा फौरन कामिल के वालिद साहब को स्टेज से उतर जाने के लिए कहा गया। हज़ारों की भीड़ के सामने.... और वो ज़िलल्त कामिल को आज भी याद थी। वालिद साहब के इंतकाल के इतने साल बाद भी।
कामिल उन चुभती हुई यादों से बाहर आया... तो सामने वही मोहतरमा खड़ी थीं, जो बता रही थीं कि वो मिर्ज़ा जमाली की बेटी हैं। बोलीं.
कामिल चलने लगा था लेकिन फिर वो ठहर गया। उसने पलटकर कहा, “महविश, जिस तरह तुम इस दरवाज़े के इस तरफ नहीं आ सकती, मेरी शायरी दरवाज़े के उस तरफ नहीं जा सकती।“ कहते हुए वो वापस उस आधी खुदी हुई कब्र के करीब पहुंचा और फावड़े से मिट्टी उछालने लगा।
उस रात क़ब्रिस्तान में ऐसी खामोशी थी, जैसी पहले कभी नहीं हुई। कामिल आज भी उसी नीले कंगूरों वाली कब्र पर टेक लगाए अपनी डायरी लेकर बैठा था लेकिन आज उसने कोई शेर नहीं सुनाया। न जाने क्यों उसे लगने लगा था कि क़ब्रिस्तान की सात सौ बयालीस कब्रों के अलावा कोई और भी है जो उसकी शायरी सुन रहा है... और इसकी उसे आदत नहीं थी।
महविश का चेहरा उसकी आंखों में घूम रहा था, वो पसोपेश में था। उस वाकिये के बाद भी कई बार उसने महविश को उसी गेट के पास देखा। वो हर दूसरे-तीसरे दिन हरी सलाखों वाले गेट के उस तरफ, आंखों में आंसू लिए खड़ी रहती जैसे कह रही हो.. “अब्बू की गलती की सज़ा मुझे मत दो कामिल”
कामिल उसे देखकर नज़र अंदाज़ करने की कोशिश करता, हालांकि वो नाकाम हो जाता था उसकी नज़र खुद गेट की तरफ़ बार-बार चली जाती। कामिल को लगा था कि कुछ दिन का जोश है, ये लड़की महविश कुछ दिन बाद खुद आना छोड़ देगी लेकिन वो गलत था... छ महीने हो गए पर महविश हर दूसरे तीसरे दिन कामिल को गेट पर दिखती थी।
एक दोपहर कामिल को गुस्सा आ गया। वो तेज़ कदमों से गेट पर खड़ी महविश के पास पहुंचकर चिल्लाया - “आखिर क्या चाहिए तुमको... चाहती क्या हो...” महविश ने जवाब दिया, “अब तो रात को भी आपकी महफिल नहीं सजती, शायरी सुनना चाहती हूं बस।“
कामिल के मन में गुस्सा तो बहुत था लेकिन महविश के लिए आहिस्ता-आहिस्ता उसका गुस्सा पिघलने लगा। किसी की गलती की सज़ा किसी और को क्यों मिले। थोड़ी बहसा-बहसी के बाद आखिरकार वो मान गया। उस रोज़ मग़रिब की नमाज़ के बाद गेट के इस तरफ, नीम के पेड़ की टेक लगाकर कामिल अपनी डायरी लेकर बैठा था और उस तरफ लकड़ी के मुड्ढे पर दोनों हथेलियों से चेहरा रोके महविश। वो शेर पढ़ता
“लाई है किस मक़ाम पे ये ज़िंदगी मुझे
महसूस हो रही है ख़ुद अपनी कमी मुझे”
ये सिलसिला कई महीनों तक चलता रहा, रोज़ाना शाम को मग़रिब की अज़ान के बाद वो दोनों वहीं मिलते और फिज़ा में कामिल के शेर गूंजते रहते। एक शाम महविश ने कहा
महीनों बीत गए थे, लेकिन महविश फिर कभी उस हरी सलाखों वाले गेट पर नहीं दिखी। कामिल हर जनाज़े को दफ़नाने के बाद एक नज़र उस तरफ करता लेकिन वो चेहरा उसे फिर कभी नहीं दिखा।
कुछ हफ्तों के बाद वो फिर से रात को कब्रिस्तान में उसी नीले कंगूरों वाली कब्र से टेक लगाकर बैठा, जैसे पहले बैठता था... और उसने अपनी गज़ल पढ़ी “ज़िंदगी इक सवाल है जिस का जवाब मौत है” उसे लगा था कि बस यही एक तरीका है जिससे वो अपनी पुरानी दुनिया में लौट पाएगा...
“हां तो अर्ज़ किया है, ज़िंदगी एक सवाल है जिसका जवाब मौत है,
मौत भी इक सवाल है जिसका जवाब कुछ भी नहीं”
शेर पढ़ने के बाद कामिल ने मुस्कुराकर सर उठाया... महविश के साथ बिताए गए छोटे से वक्त में उसे दाद और वाह-वाह की आदत जो हो गई थी। लेकिन कब्रें दाद नहीं देतीं। दूर तक सिर्फ सन्नाटा था। उसने झुंझलाकर फिर शेर पढ़ा और फिर सर उठाया लेकिन क़ब्रिस्तान के सन्नाटे में कोई नहीं था जो कहता “वाह, बहुत खूब...”
उसने झुंझलाकर डायरी एक तरफ फेंक दी और उसी नीली कब्र पर मायूस होकर झुक गया। इसके बाद, कुछ दिन बहुत उदासी में कटे, उसने लिखना छोड़ दिया.. वो दिन और रात महविश को याद करता था, उसकी बातें, उसकी शायरी की समझ, उसकी वाह-वाह.. सब याद आता था। ये भी याद आता था कि उसने कहा था कि कामिल अपनी गज़लों की वीडियो बना किसी रिसाले में, किसी अखबरात में छपने के लिए भेजो।
कुछ दिन और उदासी में काटने के बाद उसने कब्रिस्तान के बड़े वाले गेट के पास बैठे चौकीदार से अखबार मांगा... और पूरा अखबार खंगाल डाला.. फिर नीचे दिये पते पर अपनी एक गज़ल भेज भी दी। उसे लग रहा था कि वो महविश के कहे को पूरा कर रहा है।
बहरहाल, दिन गुज़रते रहे, रातें कटती रहीं, लोग मरते रहे, कब्रें बनती रही.. लेकिन इस बीच तन्हाई की एक भी रात ऐसी नहीं गुज़री जब कामिल की आंखों में महविश का अक्स ना झिलमिलाया हो।
दिन और रात के चक्कर लगते रहे। और फिर एक खास सुबह आई। देखने में वो कामिल के लिए आम सुबह जैसी ही थी। रोज़ जैसी, क्योंकि आंख खुलते ही किसी की मौत की ख़बर मिली थी कामिल को
“हां आप दो बजे तक मैय्यद ले आइये... कब्र तैयार मिलेगी...”
एडवांस का पैसा कमीज़ की जेब में रखते हुए कामिल ने सामने खड़े शख्स से कहा.. और तभी चौंक कर देखा तो बड़े गेट वाला चौकीदार उसकी तरफ बदहवास भागता चला आ रहा था। कामिल अपनी आंखें छोटी करके ग़ौर से उन्हें देख रहा था, वो तकरीबन समझ गया था कि किसी की दुआओं की तासीर असर दिखाने वाली हैं।
“ये देखो ये तमाम खत क़ब्रिस्तान के पते पर आए हैं, तुम्हारे लिए... देखो” उन्होंने खाकी रंग के कई पोस्टकार्ड उसकी तरफ बढ़ा दिए। ये खुशी की मंज़िल थी जिसका उसने तसव्वुर भी नहीं किया था, समझ नहीं आ रहा था कि खुदा का शुक्र अदा करे या या उस महविश का जिसने उसे ऐसा करने को कहा था। वो तारीफ में आए खतों को चूमने लगा, उन्हें सीने से लगाकर कब्रों के बीच पगडंडियों पर दौड़ने लगा और उसने तय किया कि वो महविश हयात से एक बार तो ज़रूर मिलेगा, शुक्रिया कहने के लिए।
अगले ही दिन वो, बर्लिंगटन रोड पर चौराहे से तीसरी वाली बड़ी हवेली के ठीक सामने खड़ा था, वो आलीशान हवेली जिसपर पत्थर की नक्काशी थी, बड़ा सा गेट था जिसे गाड़ियां के अंदर-बाहर होने पर दो लाल वर्दी पहने सिपाही खोलते थे।
“वो... आ.. महविश...”
कामिल को जैसे बिजली का ज़ोरदार झटका लगा था। उस चौकीदार के लफ्ज़ देरतक कामिल के कानों में गूंजते रहे। “क्या?” उसका सर चकराने लगा... जैसे किसी ने उसके जिस्म से सारा खून निकाल लिया था। वो मेज़ की टेक लेकर खड़ा हो गया। और महविश से सारी मुलाकातें किसी तेज़ रफ्तार ट्रेन की तरह उसकी आंखों के सामने से गुज़रने लगी। उसका गला सूखने लगा था। जब उसे बताया गया कि महविश को उसी ‘आसिफी क़ब्रिस्तान’ में ही दफ्नाया गया था जहां वो रहता है। थोड़ी देर बाद वो लड़खड़ाते और बदहवास कदमों से क़ब्रिस्तान लौटा और तमाम कब्रों से सूखे पत्ते हटाकर उनपर लगा, नाम वाला पत्थर पढ़ने लगा। उसकी सांसे फूल रही थी।
वो पागलों की तरह हर कब्र के पत्थर पढ़े जा रहा था... बदहवास सा कामिल अचानक उसी नीली कंगूरों वाली कब्र के सामने ठहर गया जिसपर अपनी किताब रखकर और टेक लगाकर वो क़ब्रिस्तान में शायरी करता था। उस कब्र के पत्थर पर लिखा था – “महविश हयात”
तो यानि इतने सालों से वो महविश की कब्र से टेक लगाकर ही कब्रों के शायरी सुना रहा था... कामिल के हाथ से वो खत फिसले और उसी नीले कंगूरों वाली कब्र पर बिखर गए। हवा के झोंके से पत्तों की सरसराहट बढ़ गई थी। आज क़ब्रिस्तान की खामोशी नई-नई सी लग रही थी।
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