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कहानी : पाज़ेब | स्टोरीबॉक्स विद जमशेद कमर सिद्दीक़ी

“शाज़िया, तुझे एक बात बताऊं?” स्कूल में मेरी दोस्त प्रज्ञा ने एक दिन इंटरवेल में खाना खाते हुए पूछा। “हां, क्या हुआ” मैंने लापरवाही से पूछा तो बोली, “देख बुरा मत मानना लेकिन... आशू बता रहा था कि उसने तेरी मम्मी और तेरे ट्यूशन वाले सर को सेक्टर पंद्रह वाले कैफ़े में देखा” मैं एक मिनट के लिए रुकी फिर मुस्कुराते हुए बोली, “हां मुझे पता है.. तो?” वो झेंप गई, बोली, “तो कुछ नहीं, मैं तो बस बता रही थी” हालांकि वो हैरानी से मेरा चेहरा देखती रही जिस पर कोई शर्म या झिझक नहीं थी - सुनिए स्टोरीबॉक्स की नई कहानी 'पाज़ेब'

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Pazeb
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उन दिनों शामें इसी तरह आती थीं... अलसाई खामोश और बोझिल। गली में ऊंच-नीच खेलते बच्चे, किसी फेरी वाले की आवाज़ और गली के मुहाने पर महमूद हलवाई की दुकान पर बजते ख़ुदा-गवाह के गानों की आवाज़। इन तमाम आवाज़ों में एक आवाज़ थी जिसकी आहट मुझे होती, तो मैं घर के किसी कोने में होती... उठकर अपना स्कूल बैग उठाने चल देती थी। क्योंकि मैं जानती थी कि ये आवाज़ अयाज़ सर के स्कूटर की है। जो अभी-अभी दरवाज़ें पर आकर रुका है। और ठीक चौदह सेकेंड के बाद, न एक सेकेंड इधर ना उधर... आवाज़ आएगी "शाज़िया...." 

 

इसी कहानी को ऑडियो में यहां सुनें - 


अयाज़ सर, वक्त के इतने पाबंद थे कि आप उन्हें देखकर अपनी घड़ी का वक्त मिला सकते थे। ख़ैर, उनकी आवाज़ का जवाब मैं “आ रही हूं सर” कहकर देती फिर मम्मी की तरफ देखकर कहती “मम्मी, सर आ गए। मैं जा रही हूं पढ़ने” फिर बैग टांग कर मैं बाहरी कमरे की तरफ चल देती। किचन में दर्जनों टिफिन पैक कर रहीं मेरी मम्मी - ताहिरा मुझे देखकर मुस्कुरा देतीं। घर में सिर्फ मैं और मेरी मम्मी, ताहिरा - हम दो लोग ही थे। पूरे दिन की गूंजती हुई ख़ामोशियां शाम साढ़े पांच बजे अयाज़ सर के आने से टूट जातीं। तब लगता जैसे घर गुलज़ार हो गया। घर, ज़िंदा आवाज़ों से रौशन हो उठता था। वरना तो पूरे दिन मैं स्कूल के बाद अपने कमरे में और मम्मी अपनी टिफिन सर्विस की वजह से किचेन में कभी राजमा बना रही होतीं, कभी दाल-चावल। चेकदार कमीज़ और ढीली पैंट पहने हुए अयाज़ सर चाबी घुमाते हुए अंदर आते और सोफ़े पर बैठ जाते। बालों में हलकी सफेदी, थोड़ा सा निकला हुआ पेट, चमकती आंखे और होठों पर हमेशा सजी रहने वाली मुस्कुराहट। 


“स्लालेकुम कुम सर” मैं मेज़ पर बैग रखते हुए कहती तो वो कहते, “हम्म... वालेकुम सलाम... तो अलजेब्रा प्रैकिटस की थी? बुक निकालो ज़रा... देखूं” अयाज़ सर पिछले तीन सालों से मुझे ट्यूशन पढ़ा रहे थे। पिछले साल, दसवीं के बोर्ड इक्ज़ैम में मेरी फर्स्ट डिवीज़न कभी न आती अगर सर न होते। इंग्लिश और मैथ्स, मैं दोनों में कमज़ोर थी लेकिन सर ने मेरी बहुत तैयारी करवाई। कई बार तो मुझे पढ़ाते-पढ़ाते इतना लेट हो जाता था कि अपनी कोचिंग क्लासेज़ मिस कर देते थे वो।
“शाज़िया, मम्मी से कहो एक चाय और पिला दें ज़रा” वो शरारत वाला चेहरा बनाकर कहते तो मैं आवाज़ लगाती.. “मम्मी एक कप चाय... सर के लिए” और थोड़ी देर बाद मम्मी ट्रे में कप और कुछ नमकीन लिए हुए कमरे में दाखिल होतीं। और यही वो पल होता जिसका मुझे हमेशा इंतज़ार रहता था। क्योंकि इसी वक्त मैं अयाज़ सर और मम्मी की आंखों में वो रंग देखती थी... जो दुनिया का सबसे ख़ूबसरत रंग है। 
मम्मी हाथ में ट्रे लिये हुए कमरे में दाखिल होतीं तो अयाज़ सर के बर्ताव में अजीब सी हड़बड़ाहट दिखाई देती थी। एक-दूसरे के सामने आते ही, दोनों के निगाहें अजीब तरह से घबराहट में मुब्तिला लगतीं। जैसे... जैसे दोनों की कोई चोरी पकड़ ली गयी हो। 
“चाय... आ...चाय बहुत आ...अच्छी बनाई है आपने” अयाज़ सर मम्मी की तरफ देखते हुए कहते तो वो मुस्कुराकर कहतीं – “कैसे पता, अभी तो पी भी नहीं आपने”


भई हम तो चाय का शक्ल देखकर बता देते हैं, कि वो है कैसी” सर कहते तो मम्मी शर्माती हुई अंदर चली जातीं। 
हां, मैं मुझे पता था कि कि पिछले सात-आठ महीने से मेरी मम्मी और अयाज़ सर के बीच एक रिश्ता सांस ले रहा था। एक ऐसे रिश्ते का नाज़ुक धागा जिसके दो सिरे, दो ऐसे लोगों ने थाम रखे थे जिन्हें एक दूसरे की ज़रूरत थी।
पिछले सात महीनों में मैंने मम्मी के बर्ताव में एक ख़ास क़िस्म का बदलाव देखा था। वो अब खुश रहने लगीं थी। मुस्कुराती थीं। नौ साल पहले सउदी में काम करने वाले मेरे पापा की मौत के बाद, ये शायद पहली बार था जब मैंने मम्मी को आइने के सामने खड़ा होकर अपने इक्का-दुक्का सफेद बालों को तोड़ते हुए देखा था।


खुशिय़ां बगल वाली पटरी पर तेज़ रफ्तार गुज़रती ट्रेन की तरह होती हैं। एक शोर के साथ, जिस्म में थर्थराहट पैदा करती, धड़धड़ाती हुई निकल जाती हैं। लेकिन ग़म... ग़म तो दूर नदी में आहिस्ता-आहिस्ता पानी पर खिसकती नाव की तरह होता है। उसे आंखों से ओझल होने में वक्त लगता है। मम्मी को भी पापा के जाने के ग़म से उबरने में नौ साल लगे।

इन नौ सालों में मैंने मम्मी को कभी खुल कर हंसते हुए नहीं देखा। ईद-बकरीद या किसी भी त्यौहार पर अपने लिए कोई नया कपड़ा खरीदते नहीं देखा। दादिहाल से तो ख़ैर पापा के जाने के बाद हमारा रिश्ता खत्म सा हो गया था। कभी-कबार फ़रीदा फूफी के अलावा कोई आता-जाता भी नहीं था। लेकिन कभी वहां से किसी शादी का कार्ड आता भी, तो भी मम्मी नहीं जातीं। श्रृंगार दान पर धूल जमी रहती। वो दिन भर रसोई में रहतीं और रात को दूसरी तरफ करवट लेकर उदास लेटी रहतीं। अक्सर सुबह मैंने उनकी तकिया के नीचे सउदी अरब से पापा के भेजे हुए पुराने खतों को पाया था। लेकिन ज़िंदगी अब नई करवटें ले रही थीं। स्कूल से लौटने के बाद जब मैं मम्मी की हेल्प करते हुए दर्जनों टिफिन बॉक्सेज़ पर कस्टमर के नाम वाले स्टीकर चिपका रही होती थी, तो महसूस करती थी कि वो पहले से ज़्यादा खुशदिल हैं। मैंने पहली बार मम्मी को खाना बनाते हुए गुनगुनाते हुआ सुना था। हालांकि आवाज़ इतनी हलकी होती थी कि पता नहीं चलता था कि क्या गा रही हैं। लेकिन खुश लगती थीं। कुछ महीनों से मम्मी ने टिफ़िन बॉक्स के एक हिस्से में मीठा रखना भी शुरु कर दिया था। 


“शाज़िया, तुझे एक बात बताऊं?” स्कूल में मेरी दोस्त प्रज्ञा ने एक दिन इंटरवेल में खाना खाते हुए मुझसे कहा। “हां, क्या हुआ” मैंने लापरवाही से कहा तो बोली, “देख बुरा मत मानना लेकिन... लेकिन आशू बता रहा था कि उसने तेरी मम्मी और तेरे ट्यूशन वाले सर को सेक्टर पंद्रह वाले कैफ़े में देखा” मैं एक मिनट के लिए रुकी फिर मुस्कुराते हुए बोली, “हां मुझे पता है.. तो?”  प्रज्ञा झेंपते हुए बोली, “तो कुछ नहीं, मैं तो बस बता रही थी” वो हैरानी से मेरा चेहरा देखती रही जिस पर कोई शर्म या झिझक नहीं थी। बल्कि खुशी थी। मैं तो चाहती थी कि मम्मी अपने अतीत से लिपटकर रोना छोड़कर, ज़िंदगी में आगे बढ़े। 

उसी शाम घर आकर मैंने जब किसी काम से, बेड के मम्मी वाले साइड का ड्रॉर खोला तो वहां एक नई पाज़ेब रखी थी। तोहफे वाले चमकीले कागज़ में लिपटी हुई चांदी की पाज़ेब, जिस पर एक नीला नग चमक रहा था। मैंने उसे अपने हाथ में लेकर देखा, वो बारीक काम वाली खूबसूरत पाज़ेब दो ज़िंदगियों की नई शुरुआत की गवाही दे रही थी। मैंने तकिया उठाकर देखा, वहां पापा के पुराने ख़त अब नहीं थे। कहीं पहुंचने के लिए कहीं से निकलना ज़रूरी होती है और मैं खुश थी कि मम्मी अपने गुज़रे हुए कल से निकल रही थीं।

इतवार की दोपहर जब मैं नुक्कड़ वाली परचून की दुकान से घर का कुछ सामान लेकर लौट रही थी तो बारिश होने लगी। मैं भीगी हुई घर पहुंची तो देखा घर पर फ़रीदा फूफी बैठी थीं। 
“स्लालेकुम फूफ़ी”
“वालेकुम सलाम। तुम तो भीग गईं पूरी... जाओ बाल पोंछ लो बेटा”
उन्होंने कहा तो मैंने हां में सर हिलाते हुए मम्मी की तरफ़ देखा। मम्मी के चेहरे पर रुआंसापन झलक रहा था। मैं तौलिया लेकर दूसरे कमरे में जाने लगीं। तभी मैंने फ़रीदा ख़ाला की दबी-दबी सी आवाज़ सुनी “नहीं, मैं कुछ ग़लत कह रही हूं तो बताओ? अच्छा थोड़ी लगता है ये सब। घर में दो-दो औरत-ज़ात, और अकेले घर में मर्द रोज़ाना अंदर आए। क्या कहेंगे लोग। लोगों के मुंह तो बंद नहीं कर सकते न। अरे कोई लड़की ढूंढ लो पढ़ाने वाली.. क्या परेशानी है।” दीवार की आढ़ लेकर खड़ी मैं भीगे हुए बालों को पोंछ रही थी लेकिन मेरी आंखे नम हुई जा रही थीं। फूफी आगे बोली, “कल को कोई ऊंच नीच हो गयी तो यही तो कहा जाएगा न कि आदमी रोज़ घर में आता था, बेवा औरत ने फंसा लिया... क्यों बिलावजह किसी को मौका दो। सुन रही हो कि नई? भाई नई रहा तो क्या, हमारा-तुम्हारा तो कोई रिश्ता है। तुम्हारी बदनामी होगी तो हमारी भी तो होगी.. दुनिया का भी तो सोचना पड़ता है”

 

(पूरी कहानी सुनें 'स्टोरीबॉक्स' पर) 
 

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