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कहानी | अ नेमलेस डॉग (एक बेनाम कुत्ता) | स्टोरीबॉक्स विद जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

कोई नहीं जानता था कि उस कुत्ते का नाम क्या था और वो वहां कब से आया था? काले रंग का वो कुत्ता मुझे हमेशा ग्राउंड फ्लोर के दरवाज़े की चौखट पर सर टिकाए बैठा रहता था। हर आहट पर उसके कान खड़े हो जाते थे पर अब वो बीमार हो गया था और एक रोज़ उसकी आंखें बंद होने लगीं... और तब मैंने उसे उसके नाम से पुकारा... शायद 8 साल में पहली बार किसी ने उसे उसके नाम से पुकारा था। उसने आंख खोली और फिर आहिस्ता से बंद कर लीं - सुनिए स्टोरीबॉक्स की खास कहानी 'अ नेमलेस डॉग' जमशेद कमर सिद्दीक़ी से

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Storybox with Jamshed Qamar
Storybox with Jamshed Qamar

कहानी - आ नेमलेस डॉग
जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

 

रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे... उस रात मुझे दफ्तर से घर लौटने में देर हो गयी थी। दिन भर की थकन मेरे चेहरे पर दिख रही थी... सर्दी लगभग खत्म हो गयी थी इसलिए पसीना भी था। मैं नोएडा की जिस सोसाइटी अपार्टमेंट में दो हफ्ते पहले अपनी पत्नी के साथ शिफ्ट हुआ था, वो कफी बड़ी थी। वहां बहुत सारे टावर्स थे। टॉवर ए, बी, सी, डी... ऐसे करके पूरे ज़ेड तक... हर टॉवर में कई सौ फ्लैट्स थे... इस लिहाज़ से एक काफी घनी आबादी वाली सोसाइटी थी वो। और अच्छी बात ये है कि मुझे पसंद आ रही थी। मैं सोसाइटी के मेन गेट से दाखिल हुआ और फिर अंदर जाने लगा... दोनों तरफ हरियाली वाले रास्ते थे... मैं दूसरे टॉवर्स बीच बनी सड़क से होता हुआ अपने टॉवर के लिए चला जा रहा था। सन्नाटा था, पर जैसे ही मैं O टॉवर के पास से गुज़रा तो टावर के ग्राउंड फ्लोर के दरवाज़े के पास मुझे एक काले रंग का कुत्ता दिखाई दिया।  (बाकी की कहानी पढ़ने के लिए नीचे स्क्रॉल करें। या इसी कहानी को ऑडियो में सुनने के लिए नीचे दिए लिंक्स पर क्लिक करें) 

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(यहां से पढ़ें) कुत्तों को देखकर मैं थोड़ा सतर्क हो ही जाता हूं... और क्योंकि उस सोसाइटी में मैं नया था इसलिए कुत्तों को पहचानता भी नहीं था। मैंने ग़ौर किया कि वो काले रंग का कुत्ता ओ टावर के ग्राउंड फ्लोर के मेन दरवाज़े की चौखट पर सर टिकाए बैठा था। वो काले रंग का अच्छी नस्ल का कुत्ता था... गले में एक पुराना पट्टा था... पर ये ज़ाहिर हो रहा था कि उसके मालिक उसका बिल्कुल ख्याल नहीं रखते... क्योंकि उसकी हालत सड़क के आवारा कुत्तों से भी ज़्यादा खराब थी। उसकी पसलियां पेट के किनारे पर उभरी हुई थीं, वो बीमार लग रहा था, मिट्टी के पपड़ी उसके काले बालों वाली पीठ पर जमी थीं, आंखों में पानी था... उसका एक पैर में भी कोई प्रॉब्लम थी... क्योंकि वो थोड़ा सा मुड़ा हुआ था और ज़मीन पर टिकता नहीं था। इसलिए उसे खड़े होने में दिक्कत भी हो रही थी। वो ग्राउंड फ्लोर के जिस मकान में वो पला हुआ था, उसके लापरवाह मालिक उसे घर में अंदर करना भूल गए थे और उन्होंने दरवाज़ा बंद कर लिया था। मैं सतर्क कदमों से उसके करीब से गुज़रा... तो उसने मेरी तरफ देखा और वो खड़ा होने लगा... मैं फौरन भांप गया कि अब वो अक्रामक होने लगा था... मैं घबरा गया... और मैंने जल्दी से इधर-उधर देखा और पास में पड़ा एक पत्थर अपनी हिफ़ाज़त के लिए उठा लिया... हाथ में कुछ तो होना चाहिए...  पत्थर को पीछे छुपाए हुए मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा।

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तभी कुत्ते ने मेरी तरफ देखा... और अपने अगले पैरों पर पूरा वज़न दिया... जैसा वो झपटने की तैयारी में हो.... मैं कुछ और घबराया ... पर वापस नहीं जा सकता था... इससे उसे लगता कि मैं भाग रहा हूं और वो हमला कर सकता था। मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा बिना उसकी आंखों में देखे... मेरे नज़र उस घर के दरवाज़े पर थी, जिस पर वो कुछ देर पहले सर टिकाए हुए था... ज़ाहिर है वो उसी घर में पला हुआ था पर शायद वो लापरवाह मकान मालिक कुत्ते को अंदर करना भूल गए थे और दरवाज़ा बंद कर लिया था। मुझे उन लोगों पर बड़ा गुस्सा आया... 

कैसे लोग हैं, रात का वक्त है... कुत्ते को बाहर छोड़ रखा है कि आते-जाते लोंगो को काटता फिरे - मैं बड़बड़ाते हए आगे बढ़ा। मैंने हल्के से नज़र घुमा कर देखा तो वो लंगड़ाते हुए मेरे पीछे-पीछे आने लगा था... पत्थर को मैंने कुछ और ताकत से कस लिया... और चाल थोड़ी सी तेज़ कर दी.... कुत्ते ने भी चाल बढ़ाई तो मैं... कुछ और तेज़ हुआ... वो भी लंगड़ाते हुए तेज़ हुआ... और फिर अचानक वो तेज़ी से लपकते हुए मेरे पीछे.... आने लगा... कि तभी मैं रुका और पत्थर कसा हुआ हाथ तानते हुए चिल्लाया.... 

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हट्ट... हट्ट 

मेरी आवाज़ रात की खामोशी में सोसाइटी के टावर्स के बीच गूंज गयी... दिल की धड़कने बढ़ी हुई थीं... पर शुक्र है कि कुत्ता वहीं पर रुक गया था। मैंने पत्थर को जानबूझ के उसकी तरफ उछाला... इस तरह कि उसे न लगे लेकिन उसके पास गिरे... जैसे ही पत्थर गिरा... कुत्ता कुछ डरा... मेरी सांस में सांस आई.... पर गुस्सा अब भी आ रहा था... उसके मालिक पर.... पता नहीं कैसे लोग हैं.... और जब इन्हें कुत्ते को पालने की तमीज़ नहीं है, तो सोसाइटी इन्हें पालने की इजाज़त कैसे दे देती है... वो काले रंग का कुत्ता मेरी तरफ देखता रहा... और फिर पलट कर वापस उसी ग्राउंड फ्लोर वाले घर की तरफ चला गया और घर की चौखट के पास बैठ गया।  ये पहला वाकिया था जब मैंने उस कुत्ते को देखा था... उस हाइ राइज़ सोसाइटी में दो हफ्ते पहले ही आया था मैं... पर उस रात के बाद... मैं जब भी दफ्तर से लौटता तो वो काले रंग का कुत्ता मुझे उसी घर के बाहर बैठा दिखाई देता था। कभी जब छुट्टी के दिन किसी काम से दोपहर के वक्त गुज़रता तब भी वो कुत्ता मुझे उसे टावर ओ के ग्राउंड फ्लोर के आस-पास दिखाई देता। कुत्तों से मुझे कभी कोई वैसी उनसियत नहीं रही, जैसा कुछ लोगों को होती है... जो उन्हें उठा कर चूमना शुरु कर देते हैं... या उनके साथ खेलते हैं... हालांकि ऐसा भी नहीं कि मुझे कुत्तों से कोई नफरत हो... मुझे लगता है कि सेफटी ज़्यादा ज़रूरी है... 
जब भी मैं उस रास्ते से निकलता था... वो कभी मुझे बच्चों के पीछे लंगड़ा कर दौड़ता हुआ दिखता था... कभी अपने दरवाज़े के सामने लगी घास में बैठा हुआ, कभी जब कोई कबूतर उस घास पर आकर बैठता तो ये लंगड़ाता हुआ उस कबूतर पर झपटने के लिए दौड़ता पर कबूतर उड़ जाता तो ये सर उठाकर उसे नाउम्मीदी से उड़ता हुआदेखता रहता। 

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बहरहाल, वक्त गुज़रता रहा और उस सोसाइटी में मुझे अच्छा खासा वक्त हो गया था... अब मैं वहां की दरो दीवार पहचानने लगा था।  रात के वक्त उधर से गुज़रते हुए मुझे वो कुत्ता टावर ओ के नीचे बैठा दिखता था... अपने घर के दरवाज़े के ठीक सामने बैठे हुए... उसका नाम मुझे नहीं पता था, बल्कि कोई नहीं जानता था.... लोगों उसे बस ओ टावर का काला कुत्ता ही कहते थे। हालांकि अब मुझे उससे उतना डर नहीं लगता था... हालांकि अब भी मैं सतर्क रहता था क्योंकि जानवर तो आखिर जानवर है... उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। पर हां, इतने दिनों में मुझे ये बात पता चल गयी थी कि उस कुत्ते के मालिक उसे घर के अंदर नहीं आने देते... क्योंकि वो हमेशा दरवाज़े के आसपास ही दिखाई देता था... ग्राउंड फ्लोर पर घर था तो सामने अच्छी खासी जगह थी... शायद इसीलिए उन लोगों ने इसे बाहर ही छोड़ रखा था। बड़े अजीब लोग थे.... खुद आराम से अंदर सोते थे और उस कुत्ते को बाहर छोड़ देते थे कि वो लोगों पर झपटता फिरे... और लोग घबराकर तिरछे-तिरछे निकलते रहें... कई बार मन हुआ कि उस घर पर जाकर दस्तक दूं और कहूं कि भई ये तो सोसइटी रुल्स के खिलाफ है, आप कैसे अपने कुत्ते को बाहर छोड़ सकते हैं। पर कभी इतनी फुर्सत हुई नहीं। बस ओ टावर के नीचे से गुज़रते वक्त जैसे ही उससे सामना होता था... वो मेरी तरफ देखता और लंगड़ाते हुए आगे आने की कोशिश करता और मैं, मैं थोड़ा सा चौकन्ना सा वहां से निकल जाता था। दिन और महीने जैसे-जैसे गुज़रते गए वो कुत्ता और कमज़ोर हो गया था। 

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कुछ महीनों के बाद जब मेरी नज़र गयी तो वो मुश्किल से चल पाता था, लेकिन कोई ओ टावर के उस घर के सामने से निकलता तो वो अब भी पहरेदारी में चौकन्ना हो जाता था। कभी उस दरवाज़े की तरफ कोई देख भी ले तो मुश्किल से ही सही पर भौंकने लगता था... चलने में उसे दिक्कत होने लगी थी। एक रोज़ मुझे वकई उसके मालिक पर बहुत गुस्सा आया... और मैंने सोचा कि आज तो मैं पक्का इन लोगों से बात करूंगा। पर कैसे जाऊं दरवाज़े पर तो वो कुत्ता था... और मुझे उससे अब भी डर लगता था। मैंने इरादा बदलकर ये तय किया कि टावर ओ के रिसेप्शन पर बैठे सिक्योरिटी गार्ड से शिकायत करता हूं। मैं दनदनाता हुआ रिसेप्शन पर पहुंचा और काउंटर पर बैठे एक सिक्योरिटी गाऱ् से कहा, 

- ये क्या तमाशा है, ये कुत्ता यहां क्यों बाहर थोड़ रखा है... ये ग्राउंड फ्लोर वाले इसे अपने घर में क्यों नहीं रखते.... 
क्या हुआ सर... सिक्योरिटी गार्ड खड़ा होते हुए बोला
- अरे होना क्या है... ये जो ग्राउंड फ्लोर वाले लोग है... ये आखिर क्यों अपने कुत्ते को अंदर नहीं रखते... रात भर बाहर रहता है, आते जाते लोगों पर भौंकता है... बच्चों के पीछे दौड़ता है... किसी दिन काट लिया तो कौन ज़िम्मेदार होगा... 
- सर वो... हम लोग.. तो देखते रहते हैं
- अरे देखने से क्या होगा भई... बुलाइये उन लोगों को... यही बात हो जाए.... तमाशा बना रखा है.... बुलाइये उन लोगों को... 
- सर वो लोग तो हैं नहीं, 
- उनका नंबर दीजिए... मैं बात करता हूं.... 
गार्ड ने हां में सर हिलाया और रिजस्टर खोल कर नंबर ढूंढकर मुझे एक नंबर दिया। मैंने डायल किया... 

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हैलो... जी मैं.. आपकी सोसइटी से ही बोल रहा हूं... हैलो आवाज़ आ रही है... मैंने बात की... और उनसे उस कुत्ते के बारे में पूछा ... पर उन्होंने जो कहा, वो सुनकर मैं हैरान रह गया... उन्होंने कहा, कि उनके पास कोई कुत्ता नहीं है... अरे लेकिन ये तो आपके घर के बाहर ही बैठा रहता है... मैंने कहा तो वो बोले, हां वो बैठा तो रहता है, पर हमने उसे नहीं पाला है... हम तो खुद परेशान हैं कि वो कहीं और जाता क्यों नहीं, कई बार सोसाइटी में शिकायत की है... वो बोलते हैं कि ठीक है, हम गार्ड्स भेजकर उसे हटवा देते हैं। गार्ड्स डंडा लेकर उसे खदेड़ देते हैं... पर वो कुछ देर बाद फिर आ जाता है। हम तो खुद ही परेशान हैं... 

मैं हैरान था... ये क्या हुआ.. अगर कुत्ता उनका नहीं है... तो वो उस घर की चौखट पर क्यों बैठा रहता है.... मैं रिस्पेशन से बाहर आया तो देखा वो अभी भी 0 टावर के हाइ राइज़ के ग्राउंड फ्लोर के फ्लैट की चौखट पर सर रखे बैठा था। मुझे कुछ समझ नहीं आया ख़ैर मैंने इस बात को यही रहने दिया और मैं घर चला आया. पर मेरे मन में ये बात बैठ गयी थी कि कुछ तो है जो जानने लायक है... पर वक्त ही तो नहीं है आजकल किसी के पास। कुछ दिन और गुज़र गए। मैं उस बीमार कुत्ते जिसकी आंखे तकरीबन बुझ गयीं थी, जो अपनी तीन टांगों से लड़खड़ाते हुए मुश्किल से चलता था... और जो उस टावर ओ के ग्राउंड फ्लोर की तरफ मुंह करके आंखें बंद किये बैठा रहता था... बीच बीच में वो आंख खोलता था जैसे किसी के आने की झूठी उम्मीद पर चौंक गया हो... फिर नाउम्मीदी से आंख बंद कर लेता था। अब दोपहरों में जब उसके सामने वाली घास पर कोई कबूतर आ कर बैठता तो वो पहले की तरह उसकी तरफ झपटता नहीं था... क्योंकि उसके लिए उठना मुश्किल होता था... अब वो उन्हें अपने बेनूर आंखों से एक टक देखता रहता और जब वो उड़ जाते तो गर्दन झुका लेता और पैरों पर रख लेता। कभी कोई आते जाते उसके सामने कोई ब्रेड का टुकड़ा, या थोड़े से चावल डाल जाता तो वो उन्हें बेमन से थोड़ा खाता और फिर मुंह घुमा लेता। 

एक दोपहर जब मैं दफ्तर के काम से किसी और शहर आया था और एक ज़रूरी मीटिंग में था... तो मेरा फोन बजा... मैंने मीटिंग के बीच में कॉल उठाया तो आवाज़ आई... 
साहब हम बोल रहे हैं, राकेश कुमार... वो ओ टावर के सिक्योरिटी गार्ड... आप आए थे न वो... कुत्ते के बारे में पता करने... 
मैंने कहा मैंने कहा चलिए मैं आपको फोन करता हूं.. अभी कहीं बिज़ी हूं... ये कहते हुए मैंने फोन रख दिया और वापस मीटिंग करने लगा। कुछ देर बाद मुझे याद नहीं रहा कि मुझे फोन करना है... अपने रोज़ मर्रा के कामों में इतने मसरूफ थे कि फुर्सत ही कहां थी कि किसी कुत्ते के बारे में पता करें... पर दो रोज़ के बाद, जब मैं होटल के कमरे में आराम कर रहा था... तो फोन में सोसाइटी के वॉट्सऐप ग्रुप में आने वाले कुछ मैसेजेस को देखकर मुझे याद आया कि फोन करना था... मैंने कॉल लॉग्स से पुराना नंबर निकाला और फोन किया... 
हैलो... राकेश जी मैं बोल रहा हूं.... वो उस दिन आपने फोन किया था... वो टावर ओ वाले कुत्ते के बारे में... 
राकेश जी को मैं याद था... बोले नमस्कार साहब, वो हमसे पहले जो गार्ड थे यहां पर तिवारी जी, रिटायर हो गए बेचारे... बहुत लंबी उम्र यहां चौकीदारी की उन्होंने... वो मिल गए थे एक दिन... तो यूं ही बात चली... तो उन्होंने बताई असली बात

राकेश जी ने बताना शुरु किया औऱ जो उन्होंने बताया वो सुनकर मेरा दिल गम की एक गहरी खाई में डूबने लगा। 

उन्होंने बताया कि ये कुत्ता ओ टावर के बेसमेंट वाले घर का ही कुत्ता है... 11 साल पहले जब इसके मालिक ने ये घर खरीदा था... तब ये उनके साथ ही इस घर में आया था। वही वक्त था जब इस सोसाइटी फ्लैट्स का पज़ेशन ओनर्स को मिला था। ये कुत्ता अपने मालिक से बहुत हिला हुआ था और उसी घर में शान से रहता था। उन दिनों ये बहुत तनदुरुस्त और फुर्तीला हुआ करता था। आते जाते लोगों पर लपकता था... मजाल है कि कोई उस ग्राउंड फ्लोर के घर की तरफ आंख उठा कर भी देख ले... इसके मालिक इसके कॉलर बेल्ट का सिरा थामे पूरी सोसाइटी में इसे घुमाते थे... घर के अंदर इसके लिए एक अलग जगह थी... जहां ये आराम से सोता था... इसके मालिक इसकी ऊंची नस्ल को शो आफ करते हुए महमानों से सामने इसे ज़रूर लाते थे। पर एक रोज़ इसके मालिक को किसी दूसरे देश में अच्छी जॉब का ऑफर आ गया... इसे साथ ले जाना मुश्किल था... पर ऑपरचुनिटी मिस भी नहीं कर सकते थे... लिहाज़ा उन्होंने भारी दिल से फैसला किया कि इसे यहीं छोड़कर वो चले जाएंगे... और वो चले गए। इसी यहीं अकेला तन्हा छोड़कर... जाते हुए इस घर में किरायदार रख गए और उनसे कह गए कि भई ये घर के बाहर रहेगा... थोड़ा ख्याल रखिएगा... किरायदारों ने भी हां हूं कर ली... पर फिर साल गुज़रे... फ्लैट किसी और को बेच दिया गया... नए लोग आए... नए लोगों ने नए किराएदार रखे... फिर इतने सालों में कई किराएदार आ कर रहे और चले गए... अब इस घर में जो लोग रहते हैं उन्हें पता भी नहीं कि ये कुत्ता कभी इसी घर में शान से रहता था...जिसकी सूनी चौखट पर सर रखकर वो दरवाज़ा खुलने पर वो अंदर झांकता है... उसे अब भी यकीन है कि एक दिन दरवाज़ा खुलेगा और अंदर से उसके मालिक निकलेंगे... और उसे उसके नाम से पुकारेंगे और अंदर ले जाएंगे... पर दुनिया कि किसी भी ज़बान में ये बात उसे नहीं बताई जा सकती कि ऐसा कभी नहीं होगा... वो कुत्ता जो अब बूढ़ा हो गया है, जिसकी आंखों में धुंध छा गयी है, जो पैर से माज़ूर है, बूढ़ा है... गुज़र चुके ज़माने की सुनहरी यादों को याद करके पूंछ हिलाते हुए... थक कर उसी चौखट पर फिर सर रख देता है... एक और इंतज़ार के लिए... 


जब मुझे उसकी ये हकीकत पता चली तो मन रोने का हुआ... मैंने कुछ नमी अपनी आंखों की कोरों पर उभरने से पहले ही पोंछ ली...  इस पूरी कायनात में, जिसमें जंगल, पेड़, इंसान, जानवर सभी रहते हैं इंसान अपने आपको एहसास का देवता मानता है... किसी के लिए मोहब्बत, किसी के लिए नफरत, हंसना- रोना, आंसू, दर्दमंदी, वफादारी - इन्हीं एहसास से तो इंसान इंसान बनता है... पर कुछ मौके ऐसे आते हैं जब इनकी गवाही इंसान से ज़्यादा जानवर दे देते हैं। ये भी ऐसा ही एक मौका था. मैं उस ओ टावर के कुत्ते को याद करने लगा... उसका चेहरा हमेशा उसी फ्लैट के दरवाज़े की तरफ होता था.. .और जिन दिनों उसकी सेहत आज जितनी खराब नहीं थी... वो उसी फ्लैट के आसपास घूमता था... बच्चों के साथ साथ खेलने की कोशिश करता था... हर आवाज़, हर पर चौंकता था.. पर अब उसकी सेहत... उसका जिस्म बूढ़ा हो गया था और कोई नहीं था जो उसे उसके नाम से पुकारे... क्या नाम होगा उसका ये भी तो नहीं पता... ख़ैर मैंने फैसला किया कि इस बार घर लौटने के बाद मैं उसे जानवरों के अस्पताल ले जाऊंगा और उसके रहने और खाने का कुछ इंतज़ाम कर दूंगा... 

मैं जब सात दिन बाद वापस अपने शहर लौटा... तो अर्ली मॉर्निंग फ्लाइट की वजह से अधूरी नींद में सर दर्द हो रहा था। मैं अपना ट्रॉली बैग घसीटता हुआ... सोसाइटी मेन गेट में दाखिल हुआ... दोनों तरफ के टावर्स के बीच में बनी सड़ पर चलते हुए मैं घर की तरफ तेज़ी से जा रहा था, नज़रें फोन पर थीं। तभी ओ टावर के पास से गुज़रते हुए मुझे कुछ लोग दिखाई दिये... कुछ पांच छ लोग थे... वो उसी जगह पर खड़े थे जहां वो कुत्ता दिखा करता था। मैं पास पहुंचा तो देखा कि आदमी बीच में पड़े उसी कुत्ते को पैर से हिला कर कह रहे थे - सांस तो चल रही है... दूसरे ने कही, हां इसका दम निकल रहा है... बचेगा नहीं.... मैं फुर्ती से उन लोगों के पास पहुंचा... तो देखा कि वो कुत्ता ज़मीन पर औंधा पड़ा था। उसकी ज़बान एक तरफ को निकली थी... और सांस मुश्किल से चल रही थी। वो कुत्ता जिसने अपने मालिक के साथ इसी जगह अच्चे, बुरे और बहुत बुरे... सब दिन देख लिए थे... आज वो इस दुनिया से रुख्सत होने वाला था। मेरे हाथ पैर जैसे जम गए थे... मैंने अपना बैग किनारे रखा और मैं ज़मीन पर घुटना टिकाकर बैठ गया... उसकी आंखें बंद थी... और मुंह एक तरफ से खुला था..जिससे ज़बान एक किनारे से बाहर लटकी थी... आस पास के लोगों की आवाज़ें, परिंदों की चें-चें, पास खेलते बच्चों का शोर... सब उसके कानों में जा रहा था... लेकिन वो सुन पा रहा था या नहीं पता नहीं.... 

उसकी ये हालत देखकर आज पहली बार मैंने उसके काले रुओं को छुआ... उन पर हाथ रखकर सहलाया... मेरे हाथ रखते हैं.. कूं कूं की एक खरखरी आवाज़ सुनाई दी... जैसे वो मुश्किल से कुछ कहना चाह रहा हो... पर मजबूर हो... मैने महसूस किया कि मेरी आंखों के किनारों से कुछ आंसू टपक कर गालों पर लकीर बन गए थे। मैंन अपने आंसू पोंछे और उसके गले में कसा ...वो पट्टा खोल दिया ताकि वो राहत से आखिरी दम ले सके... पट्टा खोलने के बाद मैंने देखा कि उस पट्टे के आगे कुछ लिखा हुआ था... शायद उसका नाम जो ... किसी ज़माने में उसके मालिक ने बड़े शौक से उसके पट्टे पर लिखवाया होगा... हालांकि उस पर इतनी मिट्टी और गर्द थी कि नज़र नहीं आ रहा था... मैंने उस कत्थई पट्टे को अंगूठे से रगड़ा तो नीचे एक नाम दिखाई दिया.... ब्रूनो... 

मैंने आंसुओं से भरी अपनी आंखों से बामु्श्किल आंसू हटाते हुए... भरे हुए गले से कहा... ब्रूनो.... मेरे ये कहते ही... उसके कानों में एक हरकत सी हुई... ये वही नाम था जिससे उसका मालिक उसे पुकारता था... और उसके बाद से अब तक.. इतनी सालों में... किसी ने उसे इस नाम से नहीं पुकारा था। ब्रूनो.... मैंने फिर से कहा... तो उसकी बंद आंखों में एक जुम्बिश सी हुई ... फिर उसने अपनी कांपती हुई आंखे एक पल के लिए खोलीं... और फिर बंद कर लीं.... हमेशा के लिए...

 

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