कॉमेडी कहानी - बहादुर अल्ला दित्ता फ़ायरमैन
- इब्न ए इंशा
एक राइटर कौमी अदब के एडिटर के दफ्तर में दाखिल हुआ। डरते-डरते झिझकते झिझकते एडिटर से कहा .. जी एक अफसाना लाया हूं.. बिल्कुल अलग किस्म का टॉपिक है... आप देखेंगे तो बहुत...
एडिटर ने कहा छोड़ जाइये अफसाना... इसके साथ टिकट लगा हुआ जवाबी टिकट ज़रूर होना चाहिए ... आप को छ महीने के अंदर अंदर अंदर अपनी राय से मुत्तला कर दूंगा। राइटर ने गुज़ारिश करते हुए कहा कि देखिए... गुस्ताखी न हो तो .. अर्ज़ करूं ... कि छोटा सी कहानी है आप अभी सुन लीजिए.. और अपनी राय मुझे बता दीजिए... बस तीन चार मिनट की बात है... आप इजाज़त दें तो ...
एडिटर ने घड़ी देखते हुए कहा... अच्छा ख़ैर पढ़िये... क्या नाम रखा है कहानी का... राइटर बोला... नाम बहुत अलग किस्म का रखा है... कार ए ख़ैर... वैसे... बहादुर अल्लाह दित्ता भी इसका नाम हो सकता है... एडिटर ने कहा... अच्छा अच्छा... ठीक है... पढ़िये...
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राइटर ने पढ़ना शुरु किया... रात के तीन बजे होंगे... हर कोई गहरी नींद के ख़्वाबों में खोया हुआ था। कहीं कोई रौशनी नज़र नहीं आ रही थी। अचानक एक ऊंचे मकान की चौथी मंज़िल से आग की लपटें उठीं। फिर किसी के चिल्लाने की आवाज़ आई... आग - आग - बचाओ - बचाओ... लगता था कि जैसे कोई लापरवाह किराएदार अंगेठी बुझाए बगैर सो गया है। उसकी चिंगारी कपड़ों पर पड़ी... आग भड़क उठी। अब वो शख्स आगे आगे था और आग पीछे-पीछे। दफतन आग बुझाने वाले का इंजन का अलार्म सुनाई दिया।.. फायरमैन अल्ला दित्ता जो मंझली उमर और गठे हुए जिस्म का, बड़ी बड़ी काली मूछों वाला झेलम की तरफ का सादिक सिपाही था... दरवाज़े के सामने रुका... थोड़ी देर सोचता रहा... फिर धड़धड़ाता हुआ कमरे में घुस गया ... और इस हवास फाख्ता शख्स को शोलों में से निकाल लाया... अब उसने शिश बांधकर पानी का करेड़ा दिया और आग बुझ गयी। आग बुझाने के दस्ते का जमादार पीर औलाद बख्श आगे बढ़ा... और बोला... आफरीन ऐ तेरी बहादुरी पर ... डिपार्टमेंट को तुझसे यही उम्मीद थी। उसके बाद मुस्कुराकर बोला.. देखना... तुम्हारी दाहिनी मूंछ जल रही है... बहादुर अल्ला दित्ता भी मुस्कुराया और पानी का एक करेड़ा अपनी मूछों पर दिया... दूर आसमान में सुबह की सुनहरी रौशनी झिलमिला रही थी।
एडिटर ने कहा... अफसाना बुरा नहीं... लेकिन कुछ जगहों पर नज़र करने की ज़रूरत पड़ेगी। ज़रा शुरु से पढ़िये... देखें इसका क्या हो सकता है।
राइटर मे कहा.. सुनिए... - रात के तीन बजे होंगे... हर कोई गहरी नींद के ख़्वाबों में खोया हुआ था। एटिडर ने सर हिलाते हुए कहा - ये नहीं चलेगा... हर कोई का मतलब है... पुलिसवाले भी सो रहे थे। यानि अपनी ड्यूटी से ग़ाफिल थे। ना ना .. ठीक नहीं.... लोग समझेंगे इस मुल्क में... चौकी-पहरे का इंतज़ाम ठीक नहीं... इसे बदलकर यूं कर दीजिए कि रात के तीन बजे होंगे... कोई भी गहरी नींद के ख़्वाबों में नहीं खोया था। राइटर मे हैरान लहजे में कहा... साहब ये कैसे हो सकता है... रात का मंज़र है... ऐसे में लोग सो ही रहे होते हैं।
एडिटर ने कहा... हम्म.. तो फिर ऐसा कीजिए कि यूं लिख लीजिए कि ... हर कोई गहरी नींद के ख़्वाबों में खोया था लेकिन साथ ही होशियार और चौकस भी था। राइटर ने मिनमिनाते हुए कहा - जी क्या फरमाया... सो रहा था और चोकस भी था... एडिटर ने कहा.. हम्म... ये तो बात कुछ बेमतलब सी हो गयी... अच्छा यूं कर सकते हैं कि कुछ लोग नींद के ख़्वाबों में खोए थे और कुछ होशियार और चौकस थे। चलिए.. चलिए... आगे चलिए...
राइटर ने खंखारते हुए कहा - कहीं कोई रौशनी नज़र नहीं आ रही थी। एडिटर ने कहा.. क्या मतलब... क्या आप ये कहना चाहते हैं कि हमारे मुल्क में ऐसे बल्ब बनते हैं जिनके जलने से रौशनी नहीं होती। राइटर ने कहा... नहीं, नहीं ये बात नहीं है... रात में बल्ब बुझा दिए जाते हैं। एडिटर ने कहा, हम्म वो तो है लेकिन सब लोग इतने समझदार नहीं होते कि ये नुक्ता समझ जाएं। बहुत से तो ये समझंगे कि हमारे यहां के बल्ब खराब क्वालिटी के होते हैं, मेरी मानो तो उसे काट ही दो... क्योंकि जब बल्ब जल ही नहीं रहे थे तो उनके ज़िक्र का फायदा क्या?
राइटर ने कसमसाते हुए लहजे में पढ़ा - अचानक एक ऊंचे मकान की चौथी मंज़िल से आग की लपटे उठी ... फिर किसी के चिल्लाने की आवाज़ आई... आग .. आग... बचाओ... बचाओ...
एडिटर ने फिर टोका... तो यानि आप कह रहे हैं कि भगदड़ मच गयी। यानि हम अपने कहानी में इस बात को शोहरत दें कि हमारी आवाम में ज़रा सी बात पर भगदड़ मच जाती है... यानि वो अपना होश खो बैठते... नई साहब ये नहीं चलेगा... ये कौमी अदब का दफ्तर है सुर्ख सवेरा का नहीं। राइटर ने कहा ... जी ये तो महज़ एक कहानी है... एक तख्लीकी कोशिश है ... मैं बस आग का मंज़र बयान कर रहा था। एडिटर ने कहा, आप इसमें मुतमइन मिज़ाज और अपने फ़राइज़ से बाखबर शहरी के बजाए ऐसा किरदार लाते हैं जिसके ज़रा महज़ ज़रा सी बात पर ... या सिर्फ मकान में आग लग जाने से हाथ पैर फूल जाते हैं। मैं आपकी जगह होता तो बचाव बचाव की जगह .. उस किरदार से कुछ ऐसी बात कहलाता जो कौ़मी तकाज़ों के ज़्यादा मुताबिक होती... मसलन - अजी ऐसी आगे बहुत देखी हैं... अभी बुझा देंगे... बल्कि उसको ये कहना चाहिए था कि आग वाग कुछ भी नहीं... तख़रीब-पसंदो का प्रोपोगैंडा है।
राइटर ने मरी हुई आवाज़ में कहा - जी आग तो बहरहाल लगी थी... एडिटर ने कहा - आप आगे चलिए... आखिर इस शख्स को बुरी तरह जलाने की क्या ज़रूरत है। राइटर ने आगे पढ़ते हुए कहा - मालूम होता था कि कोई लापरवाह किराएदार अंगेठी बुझाए बगैर सो गया था। उसकी चिगारी कपड़ों पर पड़ी। आग भड़क उठी। एडिटर कुर्सी से उछल पड़े। ये आपने क्या लिख दिया... कि ये शख्स अंगेठी बुझाए बगैर सो गया। आप हमारे पढ़ने वालों को समाने गलत मिसाल पेश करना चाहते हैं ताकि वो भी ऐसी गफ़लत करें। नहीं नहीं... आप इसमें से अंगेठी का ज़िक्र बिल्कुल हटा दीजिए... आग के ज़िक्र की भी ज़रूरत नहीं रहगी। न रहे बांस, न बजेगी बांसुरी। अच्छा... अब आगे का हिस्सा पढ़ो औऱ बीच का हिस्सा छोड़कर सीधे फायरमैन के किरदार पर आ जाओ...
(To be continued)
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