पांच साल के बाद आज अचानक तुम्हारा फोन आया. हमेशा की तरह तुम ही कहती रहीं. मैं सुनता रहा. मैं शॉक में रहा कि तुम कैसे मुझे यूं ही फोन कर सकती हो. लेकिन तुम्हारी आखिरी बात पर हैरान हूं. तुमने कहा कि अपना ख्याल रखना. सोच रहा हूं कि तुम्हें कुछ याद भी है.
वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो के न याद हो
वही यानी वादा निबाह का तुम्हें याद हो के न याद हो
वो नये गिले वो शिकायतें वो मज़े-मज़े की हिकायतें
वो हर एक बात पे रूठना तुम्हें याद हो के न याद हो
कोई बात ऐसी अगर हुई जो तुम्हारे जी को बुरी लगी
तो बयाँ से पहले ही भूलना तुम्हें याद हो के न याद हो
सुनो ज़िक्र है कई साल का, कोई वादा मुझ से था आप का
वो निबाहने का तो ज़िक्र क्या, तुम्हें याद हो के न याद हो
कभी हम में तुम में भी चाह थी, कभी हम से तुम से भी राह थी
कभी हम भी तुम भी थे आश्ना, तुम्हें याद हो के न याद हो
वो जो लुत्फ़ मुझ पे थे पेश्तर, वो करम के था मेरे हाल पर
मुझे सब है याद ज़रा-ज़रा, तुम्हें याद हो के न याद हो
याद है तम्हें तुम्हारी ही बहन की शादी में क्या हुआ था. सब हमें ही देख रहे थे. सबकी निगाहों में तुम थी. तुम हरकत ही ऐसी कर रही थीं. तुम्हे उस रोज़ किसी का खौफ नहीं था.
कभी बैठे सब में जो रू-ब-रू तो इशारतों ही से गुफ़्तगू
वो बयान शौक़ का बरमला तुम्हें याद हो के न याद हो
और वो रात. याद है तुम्हें..
वो बिगड़ना वस्ल की रात का, वो न मानना किसी बात का
वो नहीं-नहीं की हर आन अदा, तुम्हें याद हो के न याद हो
जिसे आप गिनते थे आशना जिसे आप कहते थे बावफ़ा
मैं वही हूँ "मोमिन"-ए-मुब्तला तुम्हें याद हो के न याद हो
ये मेरी कहानी नहीं है.. ये मशहूर शायर मोमिन खां मोमिन की ग़ज़ल है. मैंने इसके इर्द -गिर्द एक कहानी बना दी. अगर आपको पसंद आयी तो दाद उस्ताद मोमिन को दे दीजिये. और मेरे लिये लाइक का बटन दबा दे. बहुत ज़यादा अच्छी लगे तो दुनिया के सभी आशिकों को शेयर कर दे. शायद कुछ टूटे दिलों के काम आ सके. शुक्रिया.