लखनऊ में हो रहे साहित्य आजतक 2026 के स्टेज -2 पर पहले दिन 'गर्व से कहो हम हिंदू हैं' सत्र का आयोजन हुआ है. इसमें महात्मा गांधी केंद्रीय यूनिवर्सिटी, मोतिहारी के पूर्व वीसी और लेखक प्रो. संजीव कुमार शर्मा और साहित्यकार, लेखक और कवि यतींद्र मिश्र ने इस विषय पर अपनी बातों को गहराई से रखा.
प्रो. संजीव कुमार शर्मा (पूर्व वीसी, महात्मा गांधी केंद्रीय यूनिवर्सिटी, मोतिहारी) ने कहा कि सबसे पहले यह समझने की जरूरत है कि हम हिंदू राष्ट्र या सभ्यता के रूप में आज नहीं आए, हम हजारों वर्षों से थे.ये संपूर्ण भारतीय राजनीतिक आंदोलन हिंदू शब्द केंद्रित रह. यह सिर्फ राजनीतिक क्षेत्र में नहीं बल्कि, कला, संगीत और विद्या के क्षेत्र में भी था. हिंदू शब्द से पहले या किसी को परहेज नहीं था. कम से कम स्वाधीनता आंदोलन तक तो हिंदू शब्द से किसी ने परहेज नहीं किया.
उन्होंने आगे कहा कि हां, आजादी के बाद कुछ लोगों ने इस शब्द से दूरी बनानी शुरू कर दी. दूसरा आप जिस 2014 के बाद के दौर की बात कर रहे हैं. निश्चित रूप से भारतीय समाज में यह अहसास हुआ कि बहुसंख्यक होना कोई अपराध नहीं है. बहुसंख्यक होना हमारे लिए गर्व का विषय भी हो सकता है. यदि हम बहुसंख्यक हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि हम अल्पसंख्यक के विरोध में हैं.
मुख्य बात है कि हमारी कुछ परंपरा है, हमारी कुछ संस्कृति है, हमारी कुछ मान्यताएं हैं, हमारा कुछ इतिहास है. उसकी वजह से हमारा एक धर्म है और ये यह सिर्फ हमारी पूजा पद्धति से नहीं जुड़ा है. यह हमारी पहचान है, हमारी अस्मिता है. इसलिए अस्मिता के रूप में हिंदू को पहचानना इस दौर में शुरू हुआ और वो भी सिर्फ धार्मिक विश्वासों तक सीमित नहीं रहा, वो अब हमारे सभी कार्यों में दिखाई देने लगा. यह अपने आप में एक सुखद संकेत भी है.
पहले हम उसे सिर्फ हिंदू धर्म के कर्म कांडों तक सीमित रखे हुए थे, तो वो परिवारों में सिर्फ बड़े और प्रौढ़ लोगों तक सीमित रहता था. अब समाज के, जीवन के सभी वर्गों में यह भाव, ये स्वीकृति ये मान्यता दिखाई दे रही है कि हां, हम हिंदू हैं. हिंदू होना इस रूप में निश्चित रूप से राजनीतिक वातावरण की अनुकूलता का परिणाम भी है, लेकिन मूल रूप में यह एक मात्र कारण मुझे नहीं लगता है.
पहले हिंदू आत्मबोध को सामाजिक स्वीकार्यता मिली है
उन्होंने कहा कि हिंदू होने का आत्मबोध जो दिखाई दे रहा है, जो पहले नहीं दिखता था. यह बदलाव जो हुआ है यह स्थायी है. यह सिर्फ राजनीतिक कारणों से नहीं है. अब से पहले या 2014 से पहले ये जुड़ा हुआ था कि यदि हम हिंदू कहेंगे, तो इससे खतरा पैदा हो जाएगा. क्योंकि ऐसा करने से एक वर्ग नाराज हो जाएगा. इसलिए हम हिंदू अस्मिता के बारे में खुलकर बात नहीं कर पाते थे.
इसके साथ ही हमने कुछ राजनीतिक और सामाजिक संगठनों को चिह्नित कर लिया था जो हिंदू की बात करते थे. ऐसे में अगर कोई भी हिंदू संस्कृति से जुड़ी कुछ भी बात करता था तो उसे हमें संघ से जुड़ा हुआ या भाजपा से जुड़ा हुआ मानकर किनारा कर देते थे और अपराधी बता देते थे. हिंदू होने का अर्थ रूढ़िवादी होना, विकास विरोधी होना, स्त्री विरोधी होना जैसा दृष्टिकोण बना दिया गया था. लेकिन, 2014 के बाद से बदलाव आया. लोगों में साहस आया, क्योंकि पहले पहले लोगों में हिंदूत्व को स्वीकारने का साहस भी नहीं था. हाल के वर्षों में हिंदू अस्मिता पर बात करने और हिंदूत्व बोध को एक राजनीतिक संरक्षण तो मिला ही. साथ ही समाज में भी इसे स्वीकार्यता मिली.
अंत में उन्होंने कहा कि बहुत सालों तक अखबारों में, न्यूज में, साहित्य के मंच पर, सार्वजनिक मंच पर या सोशल मीडिया एक वर्ग बिलकुल मौन था. अब उसे आवाज मिल गई है. सोशल मीडिया पर भी लोग दुर्गा सप्तशती पर बात करने लगे हैं, चाहे लोग कितना भी ट्रोल करें.
हिंदू संस्कृति पर बात करना अब पिछड़ेपन का परिचायक नहीं..
वहीं यतींद्र मिश्रा (कवि और लेखक) ने इस सत्र में संजीव शर्मा के बातों से सहमति जताते हुए कहा हिंदू होना और गर्व से कहो हम हिंदू हैं, इस चीज को मैं दूसरे दृष्टिकोण से देखता हूं. अपने संघर्ष के दौर की बात करता हूं. जब मैंने लिखना शुरू किया और मेरे लेखक बनने का शुरुआती दौर था. जब मैं वाराणसी के संस्कृत के प्रकांड विद्वानों जैसे विद्या निवास जी के सान्निध्य में था. उस वक्त जब मैं किसी मौलिक ग्रंथ की बात करता था या किसी आध्यात्मिक ग्रंथ की बात करता था, जैसे कि उस वक्त एक उज्जवल नील मणि एक ग्रंथ, जिसे भक्ति का सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है. वो पढ़ रहा था. मैं पूरबिया आदमी था. तब दिल्ली मुंबई जैसे शहरों में मुझसे कोई पूछता था तो मैं बता देता था कि मैं ये ग्रंथ पढ़ रहा हूं. तब लोग मुझे ऐसी नजरों से देखते थे, जैसे मैंने कोई अजूबा हूं और कौन सा गंदा काम कर रहा हूं.
तब मुझे ये बात समझ में आई कि अपनी मन की बात कहनी ही नहीं हैं मुझे. क्योंकि, जब आप संस्कृत, हिंदी, भारतीय संस्कृति जैसी चीजों की बात करते हैं तो आप दक्षिण पंथी है. मतलब एक डिमार्केशन लाइन थी कि अगर आप प्रोग्रेसिव हैं तो इन सब चीजों पर मिट्टी डाल दीजिए और मेरा मन बहुत उलझता था उस वक्त. क्योंकि मुझे गीत गोविंद भी पढ़ना था, मुझे इंडियन क्लासिकल डांस फॉर्म्स भी पढ़ना था. तब किसी डॉक्टर ने तो नहीं कहा था कि बेटा तुझे लेखक ही बनना है. लेकिन 2014 आते-आते बहुत बातें हुई, जिसमें एक योगदान राजनीति का भी है, जो राष्ट्रवादी सोच के साथ आगे बढ़ती है.
उन्होंने आगे कहा कि इसमें एक चीज बहुत मजेदार लगती है, जिसका जियोपॉलिटिकल और सोसियोपॉलिटिकल एनालिसिस होनी चाहिए, कि मेरे जैसे तमाम लोग जो किसी से उलझते नहीं हैं, लड़ते नहीं हैं, सोशल मीडिया पर कोई कुछ कह भी गया तो चुप लगा जाते हैं. ऐसी तमाम सारी आवाजों को एक मंच मिल गया कि ये भी सही है. आप जब बहुत सारी चीजें हमें बताते हो तो हम भी तो कह सकते हैं कि मीराबाई भी बहुत महान थीं.
प्रोग्रेसिव होने का मतलब वामपंथी होना नहीं है....
एक मजेदार घटना बताता हूं, जब मैंने लता जी पर एक किताब लिखी तब मुझे एक सोलो लेक्चर और बच्चे के साथ इंट्रेक्शन के लिए बुलाया. वहां कई सारे यूनिवर्सिटी के बच्चे थे. मैं किसी संस्थान का नाम नहीं लूंगा. जब मैंने अपनी बातें कहनी शुरू की तो एक लड़की खड़ी हुई और कहने लगीं कि लता जी तो मोदी जी और अटल जी का समर्थन करती हैं. तब मेरे मुंह से अचानक निकल गया कि वो उनका निजी मामला है कि वो राजनीतिक रूप में किसी के साथ भी खड़ी हो सकती हैं, समर्थन कर सकती हैं. मेरा सारा फोकस इस बात पर था कि मैं लता जी के बारे में बात करूं कि वो कितनी महान पार्श्व गायिका हैं और कैसे वो इतनी बड़ी बनीं, उनकी क्या प्रतिभा है, उनका क्या संघर्ष है और कैसे वो भारत की आवाज बनीं. तब उसने कहा वो सब तो ठीक है सर, लेकिन वो हैं तो दक्षिणपंथी. तब मुझे गुस्सा आया, तब मैंने मंच से कहा कि ये किसने कहा कि महानता सिर्फ वामपंथ की चेरी है. दक्षिणपंथी होना क्या कम अच्छा होना है या कम बेहतर इंसान होना है. ये तो कोई बात नहीं है.
मेरा कहना है कि वो आवाजें जो परंपरा, संस्कृति, प्राच्य ज्ञान को पढ़ती थीं और सब कुछ भारतीय ढंग से करती थीं. ढंकी छिपी रहती थीं और चुप रहती थीं. उन्हें एक मंच मिल गया, एक आवाज मिल गई. दिल्ली के बड़े क्लब और फोरम में हिंदी में बात करना एक अपराध माना जाता था. अब आप चढ़कर बात कर सकते हैं. ये बात तो अच्छी है. हर चीज का राजनीतिक करण करके जेनरलाइज किया जाए. मैं इसके पक्ष में नहीं हूं.
हिंदूत्व कह कर या हिंदूत्व की बात करके एक पूरा वर्ग हमें खारिज करता है. यह ठीक नहीं है. आप हिंदू हैं, आप जैन है या आप बौद्ध है या आप इस्लाम से ताल्लुक रखते हैं तो हर धर्म का सम्मान है. मेरे बारे में बहुत लोग कहते हैं कि आपने राम मंदिर और अयोध्या के बारे में बहुत लिखा है तो मेरा कहना है कि मैंने जो लिखा है पहले उसे पढ़िए. मैंने फैजाबाद में शिया के मुहर्रम का जो डिपिक्शन मैंने किया है, वैसा किसी इस्लामिक विद्वान ने भी नहीं लिखा होगा.
मेरे एक मित्र हैं इकबाल रिजवी उन्होंने मेरे एक दोस्त के माध्यम से मेरे बारे में कहा कि कौन हैं ये जनाब जो शिया मुहर्रम के बारे में इतना अच्छा लिखा है तो मैं ये कहना चाहता हूं कि जो लोग हिंदू और हिंदूत्व को लेकर ट्रोल करते हैं उन्हें पहले पढ़ना चाहिए. क्योंकि उन्हें सिर्फ इतना पता है कि अच्छा ये अयोध्या से आते हैं, इन्होंने हिंदू धर्म से जुड़ी ये किताब लिख दी यानी ये हिंदूत्व से जुड़े हैं. भाई मैं हिंदू हूं मुझे कहा गया कि आपका सेशन 15 को है, तो मैंने कह दिया कि मैं नहीं आ सकता क्योंकि उस दिन शिवरात्रि है और मैं उस दिन शिव अभिषेक करता हूं.
साहित्य की दुनिया में हम जानते हैं कि वो बहुत अच्छा लिखते हैं और विद्वान है. साथ ही वो वामपंथी विचारधारा के हैं और गलती से अगर उस शख्स के हाथ में कलावा बंधा हुआ दिख जाए तो सोशल मीडिया पर वो तस्वीर ट्रोल होने लगती है. ये किस संविधान में लिखा है कि विचारों से प्रगतिशील व्यक्ति गायत्री मंत्र नहीं पढ़ सकता, हवन नहीं कर सकता.