नफासत-नजाकत और तहजीब की धरती लखनऊ पर शनिवार को गुलाबी रंग तब और फबने लगा, जब यहां मंच से काव्य की सुगंध बहने लगी. मौका था साहित्य आजतक लखनऊ-2026 का. इसके ढाई अक्षर प्रेम के सेशन में कवि अनामिका अंबर, कवि सुदीप भोला, डॉ. भावना तिवारी, कवि विनोद श्रीवास्तव, कवि विष्णु सक्सेना ने शिरकत की.
कवियों ने अपनी कविताओं से श्रोताओं को प्रेम, विरह, व्यंग्य और समकालीन समाज की सच्चाइयों से रूबरू कराया. मंच पर वरिष्ठ और युवा कवियों ने अपनी रचनाओं से माहौल को भावनात्मक और मंथन के लिए मजबूर करने वाला बना दिया.
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सबसे पहले मंच पर आए विष्णु सक्सेना, उनकी प्रेम और संवेदना से भरी कविताओं ने श्रोताओं को भावुक कर दिया.
प्यास बुझ जाए तो शबनम खरीद सकता हूं,
जख्म मिल जाए तो मरहम खरीद सकता
ये मानता हूं मैं दौलत नहीं कमा पाया...
मगर तुम्हारा हर एक गम खरीद सकता हूं.
इसके बाद उन्होंने रिश्तों में बदलाव की पीड़ा को इन पंक्तियों में व्यक्त किया—
सोचता था कि मैं तुम गिरके संभल जाओगे
रौशनी बनके अंधेरे को निगल जाओगे
ना तो मौसम थे, न हालात न तारीख दिन
किस पता था कि तुम ऐसे बदल जाओगे
तन्हाई और यादों की कसक भी उनकी कविता में साफ झलकी—
याद वो है आए जो तन्हाई में
तेरी याद आए तो मेले में अकेला कर दे
और फिर उन्होंने प्रेम की प्रतीकात्मकता को इन पंक्तियों में उकेरा—
कल मुझे राह में चांद मेरा मिला
दूधिया दूधिया ये बदन हो गया
थोड़ा उसने कहा- थोड़ा मैने कहा
हलका हलका सा दोनों का मन हो गया
फिर अचानक ही ठंडी हवाए चली
जो कि पानी बरसने का संकेत था
कितनी बारिश हुई कुछ पता न चला
इतना तन झुलसा हुआ ये रेत था
कौन था बरसा था और कौन भीगा था बहुत
प्यास बरसों का आचमन हो गया....
इसके बाद मंच संभाला सुदीप भोला ने, उन्होंने समकालीन सामाजिक परिस्थितियों पर तीखा व्यंग्य करते हुए खूब तालियां बटोरीं.
जंतर मंतर जादू टोने
ये सब उसके खेल खिलौने
और बदलते सामाजिक परिवेश पर कटाक्ष करते हुए कहा—
ये देश वीरांगनाओं के बजाय रीलंगनाओं का बन गया
सोशल मीडिया और बदलती पीढ़ी पर उनकी लंबी कविता ने श्रोताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया—
पापा ने हैप्पी बर्थ डे पर,
मोबाइल दिलवाया था.
आनलाइन हो गयी पढ़ाई,
किश्तों पर दिलवाया था.
पढ़ो बेटियों, पढ़ो बेटियों,
उनने मन में ठाना था.
दुनिया कर लेगी मुट्ठी में,
उन्होंने मन में ठाना था.
उसी मोबाइल से वो लड़की,
इन्स्टाग्राम चलाती है.
पढ़ती नहीं पढ़ाती है,
दिन भर रील बनाती है.
पापा ने हैप्पी...
वो पापा की परी आजकल,
इतनी ज्यादा सोशल है.
बेपरदा घर को कर डाला,
जैसे कोई होटल है.
वो शहजादी पाकर आजादी,
आसमान में झूल गयी.
इतनी ज्यादा बोल्ड हो गयी
कि संस्कार ही भूल गयी.
हाथों से दिल कभी बनाती,
टैटू कभी दिखाती है.
किसी आइटम गर्ल के जैसा,
ठुमके खूब लगाती है.
कार्यक्रम के आखिर में अनामिका अंबर ने प्रेम के शुद्ध और समर्पित रूप को अपनी रचना में अभिव्यक्त किया—
मैं तेरे नाम हो जाऊं तू मेरे नाम हो जाए
मैं तेरा दाम हो जाऊं तू मेरा दाम हो जाए
न राधा सा न मीरा सा विरह मंज़ूर है मुझको
बनूं मैं रुक्मणी तेरी तू मेरा श्याम हो जाए
‘ढाई अक्षर प्रेम के’ सत्र ने यह साबित कर दिया कि प्रेम केवल भावना नहीं, बल्कि जीवन का मूल तत्व है कभी करुणा, कभी समर्पण, तो कभी सामाजिक चेतावनी के रूप में. साहित्य आजतक-2026 का यह कवि सम्मेलन लखनऊ की सांस्कृतिक विरासत के अनुरूप भावनाओं और विचारों की समृद्ध शाम बन गया.
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