लमही हिंदी की साहित्य की महत्त्वपूर्ण पत्रिका है. आज जब लिखित शब्द पर 'संकट' मंडराते हुए दिख रहे हैं, ऐसे में किसी भी लघु पत्रिका का प्रकाशन एक कठिन कार्य है. युवा लेखक विपिन शर्मा ने इस पत्रिका को लेकर यह समीक्षा साहित्य आजतक के लिए लिखी है. उनका मत है कि संपादक विजय राय अपने निज प्रयासों से लमही को जिंदा किए हुए हैं. हिंदी समाज अपनी साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को लेकर उदासीन है. एक कंनिग चुप्पी पूरे परिवेश पर तारी है. खैर यह सब स्थितियां हर कालखंड में कम अथवा ज्यादा रही है और रहेंगी भी. मगर परिवर्तन की कोई भी मुहिम इन स्थितियों पर फ़र्क अवश्य डालेगी.
‘लमही’ ने इसी उम्मीद के साथ एक सार्थक यात्रा तय की है. सुदीर्घ प्रोजेक्ट के तहत हिंदी कहानी की विचार यात्रा को समझने का प्रयास ‘लमही’ ने किया है. लमही समग्रता में हिंदी कहानी की विकास यात्रा की मुकम्मल तस्वीर पाठक के सामने प्रस्तुत करने का काम कर रही है. अप्रैल-सितम्बर 2019 अंक ‘हमारा कथा समयः एक’ के नाम से आकर पाठकों के बीच चर्चित हुआ था. यह स्त्री कथाकारों के रचनात्मक अवदान पर केंद्रित था, जिसकी चर्चा हिंदी पट्टी से बाहर भी रही.
यह एक ईमानदार टिप्पणी है, हिंदी कहानी की विकास यात्रा को समझने के लिए. लमही की कथा समय-2 का संपादकीय प्रस्थान बिंदु है उस जनपद में प्रवेश करने का जहां किस्सागोई की दुनिया को ईमानदारी और बेहद इत्मीनान के साथ समझा गया है. महत्त्वपूर्ण कहानीकार जो हिंदी कहानी के निज मुहावरे गढ़ते हैं, वह सब लमही के इस अंक में शामिल हैं. पत्रिका की शुरूआत वैभव सिंह के लेख ‘विचारधारा कहानी और समकालीनता’ से होती है.
यह लेख इसलिए भी पढ़ा जाना चाहिए कि यह वैचारिक पूर्वाग्रहों-विचारधारा के दायरों में कैद आलोचना दृष्टि पर भी सवाल खड़ा करता है. इस लेख में कहानी के ब्यौरे बेशक कम हों, मगर यह कहानी के अंतः यात्रा को समझने के लिये मुकम्मल औजार प्रदान करता है. नामवर सिंह, वाल्टर बेंजामिन आदि की दृष्टि से पाठक वाकिफ़ होता है. मुझे तो वाल्टर बेंजामिन के इस कथन ने गहरे तक प्रभावित किया. ‘कलाएं केवल आलोचनाओं को पैदा नहीं करती हैं, बल्कि स्वयं आलोचना कर्म की तरह होती हैं,’ कहानी के संदर्भ में भी यह बात सत्य है.
लमही कथा समय-2 में ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह, रवींद्र कालिया, नीलकांत, हिमांशु जोशी, वल्लभ डोभाल, विद्यासागर नौटियाल, हरियाल त्यागी, हृदयेश, सुर्दशन नारंग, पानू खोलिया जैसे कहानीकारों पर आलेख हैं. यहां पर समग्रता और निष्पक्षता मिलेगी, कहानीकारों के चयन में भी. पीढ़ियों के आधार पर चीजों का विश्लेषण नहीं है, बल्कि एक परंपरा उभरती हुई दिखाई देती है.
‘कहानी’ को तमाम-आंदोलनों, प्रचलित मुहावरों से निथारकर ‘कहानी’ को बचाये रखने, डिस्कस करने की ईमानदार कोशिश भी इन लेखों से प्रकट होती हैं. कुछ ऐेसे कहानीकारों से हम इस अंक में परिचित होते हैं, जिन्हें वर्तमान में विस्मृत कर दिया गया है. रामनरायण शुक्ल, योगेश गुप्त, रघुनन्दन तिवारी, पानू खोलिया आदि. इन कहानीकारों पर हिंदी के आलोचकों ने एक कैलकुलेटिड चुप्पी साधे रखी. पानू खोलिया पर शंभू गुप्त ने लिखा है ‘धुंध के पार उजास’. शंभू गुप्त पानू खोलिया का विश्लेषण करते हुए एक रिमॉर्क छोड़ते हैं. ‘पानू जी कहानी लिखते नहीं रचते हैं’. उनका मानना है कि कहानी बहुत धैर्य तसल्ली से लिखी जाती है. वहां जल्दबाजी घातक है (धुन्ध के पार उजास, शंभू गुप्त, लमही)। रामनरायण शुक्ल पर रामनिहाल गुंजन ने लिखा है. यह भी एक महत्त्वपूर्ण लेख है.
हिंदी कहानी ने एक लंबी यात्रा तय की है. देश की एक मुकम्मल तस्वीर भी कहानी के माध्यम से उभरी है. गुलेरी, प्रसाद, प्रेमचंद से लेकर आज तक के कहानीकारों ने जिंदगी के कई शेडस दिखाए हैं. अज्ञेय, मोहन राकेश की अपनी दुनिया है, कहानी की संरचना को लेकर भी अपनी मान्यताएं. हिंदी कहानी में विभिन्न आंदोलन भी खड़े हुए कहानी, अकहानी, नयी कहानी, समकालीन कहानी, संचेतन कहानी आदि-आदि. ‘लमही’ ने समकालीन कहानी की यात्रा को पेश करने का प्रयास किया है.
योगेश गुप्त पर हिंदी के महत्त्वपूर्ण कहानीकार महेश दर्पण ने लिखा है, ‘बेहतर जिंदगी की अपेक्षा में रची गई कहानियाँ’, ‘योगेश गुप्त के हिस्से में एक जगह पर टिकना नहीं आया. सहारनपुर से दिल्ली फिर भी ‘गरवीली गरीबी’ से अंतहीन रिश्ता. महेश दर्पण की टिप्पणी ‘प्रेस का जीवन योगेश जी ने बहुत करीब से देखा है. इसमें उन्हें महसूस हुआ कि आदमी मशीनी जिंदगी का स्पेयर पार्ट है. वहां काम का पूरा होना अनिवार्य सच है और कामगार की सुरक्षा बहुत पीछे है.’ (महेश दर्पण योगेश गुप्त की कहानियों पर टिप्पणी लमही पृ॰ 85).
लमही के इस अंक में रवीन्द्र कालिया, हृदयेश, शानी, शंकर, असगर बजाहत, मंजूर एहतेशाम, स्वयं प्रकाश, संजीव, शिव मूर्ति, हरिपाल त्यागी प्रियवंद, एसआर हरनोट आदि महत्त्वपूर्ण कहानीकारों पर आलेख हिंदी कहानी में आ रहे परिवर्तनों को भी डीकोड करते हैं. शंकर पर ‘बाजारवाद और साम्प्रदायिकता का अस्मिता आख्यान’ नाम से कहानीकार एवं आलोचक प्रज्ञा ने लिखा है.
‘कथाकार शंकर की कहानियां यदि एक और सामंतवाद, पूँजीवाद, भूमंडलीय दुनिया और सांप्रदायिकता के क्रूर पंजों की शिनाख्त करती हैं, तो दूसरी ओर ये कहानियां वर्ग चेतना की धार को भी परखती चलती है. (लमही अक्टूबर-दिसम्बर 2019 पृ. 110). पंकज बिष्ट की कहानी पर प्रमोद कुमार तिवारी का लेख ‘कहानी के शिल्प में नहीं’ पंकज बिष्ट की किस्सागोई और कहन को नये तरीके से पकड़ता है. ‘पंकज बिष्ट की कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये कहानी, कहानी नहीं लगती. न उठान में, न अंत में, इनका शिल्प इन्हें कुछ और बना देता है. कुछ ऐसा कि कहानी होकर भी ये कहानी के ढांचे से निकलती प्रतीत होती हैं. (लमही अक्टूबर-दिसम्बरः 2019 पृ॰ 112).
विगत शती का अंतिम दशक कई तरह की राजनीतिक-सामाजिक एवं सांस्कृतिक उथल-पुथल से युक्त रहा है. सोवियत संघ के विघटन ने एक स्वप्न का अंत किया. अर्थशास्त्रियों एवं राजनीति विज्ञानियों ने कहा ‘पूंजीवाद अपने नवीन रूप में लौट रहा था’. आभासी संसार वास्तविक दुनिया पर भारी थी, ऐसे में स्वयं प्रकाश जैसे कथाकारों ने इस पेचीदगी को बहुत बारीकी से पकड़ा. आलोचक अरविंद कुमार ने ‘किस्सागोई के बीच आजादी और अस्मिता बोध के नये मुहावरों की तलाश' नामक अपने लेख में स्वयं प्रकाश के कथारस को उनकी कहानियों के विश्लेषण के मार्फत पाठक तक पहुंचाया है.